चाहिए मन की शांति तो कीजिए यह काम

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दमोह। कहा जाता है कि संसार के सारे सुख और मान-सम्मान बड़े ही पुण्य कर्म से मिलते हैं। पुण्य कार्य सबको करना चाहिए। इसीलिए लोग तीर्थ स्थान और शास्त्रों का अध्यन करते हैं और ईश्वर की आराधना करते हैं। मन पवित्र होना चाहिए। शास्त्रों का अध्यन करने और गुरु की सेवा से मन को शांति मिलती है।

इस तरह प्राप्त करें मन की शांति

पूजन, भक्ति और गुणगान के साथ तीर्थं स्थलों पर जाकर आराधना करने से मन को शांति मिलती है। अपने गुरु की सेवा करना, सुख-दुख में साथ देना और उनकी साधना में सहयोगी बनना यह सब आराधना है। संसारी काम के साथ यह सब करने वाले लोग ही सम्यग्दृष्टि होते हैं । यह सत्य है कि सम्यग्दृष्टि व्यक्ति कभी भी किसी प्रकार के दुखों से दुखी नहीं होता है।

आचार्य समन्तभ्रद स्वामी ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार में कहा है…
देवेन्द्रचक्रमहिमानममेयमानम्, राजेन्द्रचक्रमवनीन्द्रशिरोऽर्चनीयम् ।
धर्मेन्द्रचक्रमधरीकृतसर्वलोकं,
लवा शिवं च जिनभक्तिरुपैति भव्यः ॥41।।

यानी- ईश्वर की भक्ति से सम्यग्दृष्टि पुरुष अपरिमित पूजा अथवा ज्ञान को इन्द्रसमूह की महिमा को राजाओं के मस्तक से पूजनीय चक्रवर्ती के चक्र रत्न को और समस्त लोक को नीचा करने वाले तीर्थंकर के धर्मचक्र को प्राप्तकर मोक्ष को प्राप्त होता है।

आपको बता दें कि जिनेन्द्र भगवान में सातिशय अनुराग को रखने वाला भव्य सम्यग्दृष्टि जीव, स्वर्ग के इन्द्र समूह की उस महिमा को प्राप्त होता है, जिसका मान-प्रभाव अथवा ज्ञान अपरिमित होता है। बताया गया है कि राजेन्द्रचक्र चक्रवर्ती के सुदर्शन नामक उस चक्ररत्न को हासिल करता है जो कि अपनी-अपनी पृथ्वी के अधिपति मुकुटबद्ध राजाओं के द्वारा पूजनीय होता है। ऐसा ही व्यक्ति मोक्ष की तरफ जाता है।

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