24 वर्ष बाद आस्था का उमड़ेगा सैलाब, देशभर में जैन धर्म की फैलेगी प्रभावना

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  • आचार्य वर्धमान सागर का सात साल बाद राजस्थान में प्रवेश
  • प्रदेश से शुरू से ही रहा है गहरा नाता
  • महावीर जी में नवंबर में होगा महामस्तकाभिषेक

अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज 

जयपुर । करौली स्थित विख्यात जैन तीर्थ महावीर जी मंदिर में 23 साल बाद नवंबर में महामस्तकाभिषेक समारोह होगा। इसके लिए जुलाई के दूसरे सप्ताह में वहां दिगंबर जैन संत आचार्य वर्धमान सागर ससंघ (26 पिच्छी) का प्रवेश होगा। यहां उनके सान्निध्य में 1000 साल से अधिक प्राचीन प्रतिमा का करीब 24 साल बाद महामस्तकाभिषेक होगा। इसके लिए हाल ही 72 वर्षीय आचार्य ने कोटा स्थित भवानी मंडी के रास्ते राजस्थान में प्रवेश किया। करीब सात वर्ष बाद यह पहला मौका है कि जब आचार्य का प्रदेश में आगमन हुआ है। वहीं, मध्यप्रदेश में जन्मे आचार्य वर्धमान सागर का राजस्थान से गहरा नाता रहा है। जैन धर्म की प्रभावना और भगवान महावीर के संदेशों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने सबसे ज्यादा चातुर्मास प्रवास भी राजस्थान की धरा पर किए।

वहीं, श्रवणबेलगोला में महामस्तकाभिषेक के लिए आचार्य को दो बार निमंत्रण देने धर्मस्थल से डॉ.डी वीरेंद्र हेगड़े एवं महामस्तकाभिषेक कमेटी के पदाधिकारी राजस्थान आए। चारूकीर्ति भट्टारक के मार्गदर्शन में आचार्य को निमंत्रण राजस्थान में दिया। इसके बाद आचार्य पद विहार कर कर्नाटक स्थित श्रवणबेलगोला ​के लिए विहार किया।
16 चातुर्मास मुनि अवस्था में करने के बाद 13 चातुर्मास आचार्य पद में किए। इसके अलावा आचार्य वर्धमान सागर का वर्ष 2022 में 30वां चातुर्मास भी राजस्थान में होगा। साथ ही 89 दीक्षाओं में से 22 दीक्षा आचार्य ने राजस्थान में दी हैं। वहीं, 25वां आचार्य पदारोहण किशनगढ़ में हुआ। साथ ही आचार्य के जयपुर में भी दो चातुर्मास प्रवास हो चुके हैं।
17 साल की उम्र से संयम पथ पर अग्रसर
महज 17 साल की उम्र में संयम के मार्ग पर चलने का मन बनाने के साथ ही आचार्य ने वर्ष 1968 में बांसवाड़ा के बागीदौरा में आचार्य विमल सागर से आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया। आचार्य शिवसागर के सान्निध्य में डूंगरपुर के भीमपुर में गृह त्याग कर संघ में प्रवेश किया। 19 साल की उम्र में 21 मई 1969 को आगरा रोड स्थित खानियां जी में मुनि वर्धमान सागर ने नेत्रदृष्टि जाने के बाद यहां 72 घंटे तक भगवान चन्द्रप्रभु की मूर्ति के पास शांति भक्ति का पाठ किया करने से दृष्टि वापस आ गई। 1990 को पारसोला, राजस्थान में आचार्य शांतिसागर की परम्परा का आचार्य पद मिला, साथ ही पंचमपट्टाधीश बने।
  • 12 राज्यों में विहार कर चुके आचार्य अब तक 89 बार दीक्षा दे चुके हैं
  • 32 मुनि, 33 आर्यिका, 1 एलक, 13 क्षुल्लक, 10 क्षुल्लिका
  • 53 में से 29 चातुर्मास राजस्थान की धरा पर किए

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