आचार्य श्री सन्मति सागर का 11वां समाधि दिवस मनाया

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आचार्य सुंदर सागर महाराज ने प्रवचन में बताए उनके जीवन के प्रसंग

बांसवाड़ा । आचार्य श्री सुंदर सागर महाराज ससंघ ने अपने दीक्षा गुरु आचार्य श्री सन्मति सागर महाराज का 11वां समाधि दिवस शुक्रवार को दिगम्बर जैन आदिनाथ मन्दिर मोहन कॉलोनी में मनाया। प्रात: जिनेन्द्र भगवान और आचार्य श्री सन्मति सागर महाराज की प्रतिमा का पंचामृत अभिषेक किया। इसके बाद प्रवचन में आचार्यश्री के जीवन की महत्वपूर्ण प्रसंग श्रावकों को बताए। आचार्य श्री सन्मति सागर महाराज ने 1988 में बांसवाडा में आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में चातुर्मास किया था । व्रती और त्यागी आचार्यश्री ने इस दौरान पर्युषण में 10 उपवास और तीन अष्ठानिका पर्व में 8-8 उपवास किए ।

आचार्यश्री सन्मति सागर यूं बढ़े मोक्ष की राह पर

आचार्य श्री सन्मति सागर महाराज में 1956 में बेलगंज आगरा में आचार्य श्री महावीरकीर्ति से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लेकर अपना पहला कदम संयम की ओर बढ़ाया। इस समय 18 वर्ष की आयु थी। मुनि बनने की प्रेरणा गणिनी आर्यिका विजयमति माताजी की रही।उन्होंने बहुत सम्बल दिया और आगम का अध्ययन भी करवाया । उन्होंने मुनि अवस्था का पहला चातुर्मास बाराबंकी में किया । आचार्य श्री का जन्म का नाम ओमप्रकाश जैन उनके माता पिता का नाम श्री प्यारे लाल- श्रीमती जयमाला देवी था । आचार्य श्री जन्म 1938 में एटा (उत्तर प्रदेश) के पास फफोतु में पद्मवाती पुरवाल गोत्र में हुआ। इसी गोत्र में 7 वीं शताब्दी में आचार्य पूज्यपादस्वामी ,मुनिब्रह्मगुलाल,आचार्य सुर्धम सागर का जन्म भी हुआ। 1956 में आचार्य विमल सागर महाराज से ब्रह्मचर्य व्रत लिया । श्रावण शुक्ल अष्टमी सन् 1961 में क्षुल्लक दीक्षा मेरठ, कार्तिक शुक्ल 12 सन 1962 में मुनि दीक्षा सम्मेद शिखर में बाहुबली भगावान की प्रतिमा के नीचे। आचार्य/उपाध्यक्ष पद आचार्य महावीरकीर्ति स्वामी ने 3 जनवरी 1972 को मेहसाणा (गुजरात) में दिया। समाधि मरण 24 दिसम्बर 2010 तिनगेवाडी (गांधी नगर, कोल्हापुर) में हुआ । अंतिम संस्कार उदग़ांव कुंजवन में हुआ ।

मुनि दर्शन से मनाही पर छोड़ी नौकरी

आचार्य श्री साकरोली में मलेरिया विभाग में नौकरी करते थे।वे उस समय आचार्य श्री विमल सागर महाराज के दर्शन करने गए। वापस आने पर उनके अधिकारी ने पूछा कि कहां गए थे। साधु दर्शन की बात बताने पर अधिकारी ने कहा कि यही करना है तो नौकरी छोड़ दो। बस इसी बात से उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी बाद में अन्य काम करने लग गए । गृहस्थ अवस्था मे दो बार सगाई हुए पर शादी नही हो पाई । पहली सगाई जहां हुई वह लड़की बीमार हो गई तो शादी टल गई। दूसरी लडक़ी के परिवार ने 500 रुपए की मांग की , इससे उन्होंने शादी से इंकार कर दिया ।

आचार्य पद के निर्णय का अधिकार विजयमति माताजी को

आचार्य श्री सुंदर सागर महाराज ने आचार्य श्री सन्मति सागर महाराज के जीवन पर प्रकाश डालते हुए संघ के साधुओं को बताया कि 1998 में ही उन्होंने 12 वर्ष की समाधि का मन बना लिया था यह बात एक पत्र से ज्ञात होती है उस पत्र में लिखा था कि अगर मेरी समाधि के बाद अगर विजय मति माता जी की समाधि होती है तो मेरा आचार्य पद किसे देना है उसका निर्णय गणिनी आर्यिका विजयमति माता जी करेंगी ।

11 को आचार्य पद और 80 को मुनि दीक्षा

आचार्य श्री ने अपने हाथों से मुनि सुविधि सागर , मुनि हेम सागर , मुनि सुंदर सागर, मुनि सुनील सागर, मुनि सूर्य सागर इन पांच मुनिराजों पर आचार्य पद के संस्कार किए । इसके अलावा 6 मुनि की आचार्य पद की घोषणा की कुल 11 आचार्य पद दिए । आचार्य श्री ने 80 मुनि दीक्षा,30 आर्यिका दीक्षा, 7 ऐलक दीक्षाया,10 क्षुल्लक दीक्षा,15 क्षुल्लिका दीक्षा प्रदान की है ।

ऐसी थी त्याग की महिमा

आचार्य श्री ने 1960 में शुद्रजल का त्याग कर दिया । सन् 1976 कोलकाता में अजीव अन्न का त्याग कर दिया । शिखर जी मे 1973 चातुर्मास के समय मात्र मूंग की दाल का पानी लिया और 27 किमी पहाड़ की चार महीने में 108 वंदना की । 1974 में रांची के चातुर्मास के समय पानी का त्याग कर मात्र नारियल का पानी लिया ।1995 में दिल्ली में चातुर्मास के समय 1 महीने तक 1 उपवास एक आहार , दूसरी महीने में 2उपवास एक आहार इस प्रकार चार उपवास एक आहार किया। गुजरात के दाहोद में 1982 में सिंहनिष्क्रिय व्रत किया । 1998 में सम्मेदशिखर की वंदना के बाद आहार में दूध का आजीवन त्याग कर दिया इसके पहले उनका घी, तेल, नमक, शक्कर का त्याग कर छह रस के त्यागी हो गए । मन्नुका, बादाम को छोड़ सभी ड्राईफ्रूट का त्याग कर दिया । 2003 में गन्ने के रस त्याग कर दिया और मात्र मट्ठा और पानी लेने का नियम किया ।

कुछ और विशेष बातें…

• छोटे पाटे पर अधिक सोते थे ।
• रात्रि 8बजे सो जाते और रात्रि 11 उठकर साधना करते थे ।
• जिसको जो बोल दिया उसका वह काम हो जाता था ।
• इतनी साधना के बाद प्रचार प्रसार से दूर रहते थे ।
• साधु को उसके नियम व्रत से च्युत होने उसे वापस उसमें स्थिर करते थे ।

 

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