अद्भुत थी तेइसवें तीर्थंकर भगवान श्री पार्श्वनाथ जी की शोभा

label_importantआलेख

जैन धर्म के तेइसवें तीर्थंकर भगवान श्री पार्श्वनाथ जी का 4 अगस्त को मोक्ष कल्याणक है। भगवान पार्श्वनाथ का समय ईसा पूर्व नवीं शताब्दी एवं भगवान महावीर से दो सौ पचास वर्ष पहले का माना गया है। उनका जन्म उग्र वंश काशी (वाराणसी) नरेश अश्वसेनजी (विश्वसेन) की महारानी ब्राह्मी(वामा) देवी के यहां पौष माह के कृष्ण पक्ष की 11 को मध्यरात्रि में विशाखा नक्षत्र में हुआ था। उस समय वाराणसी में जैनों की संख्या बहुत ज्यादा थी। जिनालय रत्नबिम्बों से शोभायमान थे और प्रजाजन दया-दर्म का पालन करती थी। इनके शरीर का वर्ण नीला था जबकि इनका चिह्न सर्प है। इनके यक्ष का नाम मातंग था और इनके यक्षिणी का नाम पद्मावती देवी था। जैन धर्मावलम्बियों के अनुसार भगवान श्री पार्श्वनाथ जी के गणधरों की कुल संख्या 10 थी, जिनमें स्वयंभू इनके प्रथम गणधर थे। इनके मुख्य श्रोता का नाम महासेन था ।

भगवान पार्श्वनाथ जी ने पौष कृष्ण पक्ष एकादशी को काशी में दीक्षा की प्राप्ति की थी। दीक्षा प्राप्ति के 2 दिन बाद खीर से इन्होंने प्रथम पारण किया था। भगवान श्री पार्श्वनाथ जी 30 साल की अवस्था में सांसारिक मोहमाया और गृह का त्यागकर संन्यासी हो गए थे और दीक्षा प्राप्ति के बाद 83 दिन तक कठोर तपस्या करने के बाद 84वें दिन चैत्र कृष्ण पक्ष चतुर्थी को बनारस में ही घातकी वृक्ष के नीचे इन्होंने कैवल्यज्ञान को प्राप्त किया था।

भगवान श्री पार्श्वनाथ जी ने ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् 70 वर्षों तक देश-देशान्तर में विचरण किया, धर्म का प्रचार-प्रसार किया और लोगों को सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने का सन्देश दिया। भगवान पार्श्वनाथ जी के जीवन से कई प्रेरक किस्से बेह्द प्रसिद्ध हैं-यथा

उनका प्रारंभिक जीवन राजकुमार के रूप में व्यतीत हुआ। एक दिन पार्श्व ने अपने महल से देखा कि पुरवासी पूजा की सामग्री लिए एक ओर जा रहे हैं। वह वहां गए तो उन्होंने देखा कि एक तपस्वी जहाँ पंचाग्नि जला रहा है और अग्नि में एक सर्प का जोड़ा मर रहा है। तब पार्श्व ने कहा— ‘दयाहीन’ धर्म किसी काम का नहीं’।

 

मोक्ष प्राप्ति
अंत में अपना निर्वाणकाल समीप जानकर वह श्री सम्मेद शिखरजी (पारसनाथ की पहाड़ी, जो झारखंड में है) पर चले गए। 100 वर्ष की आयु पूर्णकर यहीं पर श्रावण शुक्ला सप्तमी को उन्हें मोक्ष की प्राप्ती हुई। यह जगह आजकल हजारीबाग के दक्षिण-पूर्व 448 फीट ऊंचे पहाड़ के रूप में स्थित है। यह जैन धर्म का महान तीर्थ है।

भगवान पार्श्वनाथ की लोकव्यापकता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आज भी सभी तीर्थंकरों की मूर्तियों और चिह्नों में पार्श्वनाथ का चिह्न सबसे ज्यादा है। आज भी पार्श्वनाथ की कई चमत्कारिक मूर्तियाँ देश भर में विराजित है जिनकी गाथा आज भी पुराने लोग सुनाते हैं। ऐसा माना जाता है कि महात्मा बुद्ध के अधिकांश पूर्वज भी पार्श्वनाथ धर्म के अनुयायी थे।

(लेखक के अपने विचार है )

Related Posts

Menu