अक्षय तृतीया : अक्षय तृतीया से शुरू हुयी थी जैन परम्परा में दान की शुरूवात – डॉ. सुनील जैन ‘संचय’, ललितपुर

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भारतीय संस्कृति में पर्व, त्याहारों और व्रतों का अपना एक अलग महत्व है। ये हमें हमारी सांस्कृतिक परंपरा से जहां जोड़ते हैं वहीं हमारे आत्मकल्याण में भी कार्यकारी होते हैं। वैशाख शुक्ला तृतीया को अक्षय तृतीया पर्व मनाया जाता है। इस दिन जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ ) ने राजा श्रेयांस के यहां इक्षु रस का आहार लिया था, जिस दिन तीर्थंकर ऋषभदेव का आहार हुआ था । उस दिन वैशाख शुक्ला तृतीया थी। उस दिन राजा श्रेयांस के यहां भोजन, अक्षीण (कभी खत्म न होने वाला ) हो गया था। अतः आज भी श्रद्धालु इसे अक्षय तृतीया कहते हैं। जैन परम्परा के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन ही दान की परंपरा की शुरूवात हुयी थी। जैन परंपरा में इस पर्व का बड़ा महत्व है। इसी कारण इसे विशेष श्रद्धाभाव से मनाया जाता है। जैनधर्म में दान का प्रवर्तन इसी तिथि से माना जाता है, क्योंकि इससे पूर्व दान की विधि किसी को मालूम नहीं थी। अतः अक्षय तृतीया के इस पावन पर्व को देश भर के जैन श्रद्धालु हर्षोल्लास व अपूर्व श्रद्धा भक्ति से मनाते हैं। इस दिन श्रद्धालुजन व्रत-उपवास रखते हैं । विशेष पूजा अर्चना करते हैं तथा दानादि प्रमुख रूप से देते हैं। इस दिन हस्तिनापुर में भी विशाल आयोजन किये जाने की परंपरा है । इस दिन व्रत, उपवास रखकर इस पर्व के प्रति अपनी प्रगाढ आस्था दिखाते हैं। कोविड के चलते सभी धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम लगभग बंद हैं। ऐसे में अक्षय तृतीया पर्व की पूजा-पाठ व्रत, अनुष्ठान आदि घर पर करें।

जैन शास्त्रों में बताया गया है कि अक्षय तृतीया के पावन दिन दान करने से बहुत अधिक महत्व होता है। दान करने का फल कई गुना अधिक मिलता है। इस पर्व पर हमें हमें अपनी उदारता दिखाने का अच्छा अवसर मिला है। पूरा देश कोरोना महामारी से संघर्ष कर रहा है तो ऐसे में हमें दिल खोलकर दान देना चाहिए। अपने आस-पड़ोस के जरूरतमंद की मदद के लिए आगे आएं, सही मायनों में अक्षय तृतीया जैसे पर्व को सार्थकता प्रदान करने का इससे अच्छा कोई दूसरा अवसर हो नहीं सकता। किसी भूखे को भोजन, कपड़े , दवाई, आक्सीजन की उपलब्धता आदि की सहायता कर मददगार बनें। आप जिस गांव, शहर, मुहल्ला, बस्ती में रहते हैं वहां वहां जरूरतमंद तक अपनी मदद जरूर पहुंचाएं ताकि इस संकटकाल में किसी को कोई परेशानी न हो। जैन परंपरा में अक्षय तृतीया दान प्रवर्तक पर्व के रूप में जाना जाता है तो इस बार ‘जियो और जीने दो’ को सार्थक करते हुए जररूतमंदों की सहायता कर दान पर्व को सार्थकता प्रदान करें।

देश कोरोना की दूसरी लहर से जूझ रहा है ऐसे में इस बार अक्षय तृतीया का पर्व दान पर्व के रूप में ऐसा मनाएं कि हम अपने जरूरतमंद भाइयों के मददगार बनें । उन पर आई इस विपदा में हम अपने कर्तव्य का निर्वाहन करें।

डॉ. सुनील जैन ‘संचय’, ललितपुर

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