अहमदाबाद के अम्बालाल जैन बने अनुश्रमण सागर

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बांसवाड़ा/ लोहारिया।
अहमदाबाद के अम्बालाल जैन ने आचार्य अनुभव सागर महाराज से क्षुल्लक दीक्षा ली और क्षुल्लकअनुश्रमण सागर बन गए। इस इतिहास का साक्षी लोहारिया दिगम्बर जैन समाज बना।
समाज के अध्यक्ष अशोक जैन ने बताया कि क्षुल्लक दीक्षा संस्कार से पहले दीक्षार्थी अम्बालाल जैन को समाज के लोगो ने हल्दी लगाकर मंगलस्नान करवाया। मंगलस्नान के बाद जिनेन्द्र भगवान का पंचामृत अभिषेक ,गणधर वलय विधान किया गया। सभा मे दीक्षार्थी अम्बालाल ने आचार्य श्री को श्रीफल भेंट कर दीक्षा के लिए निवेदन किया। अम्बालाल की गृहस्थ की बेटी दीपिका जैन,नीलम जैन ने चौकपूर्ण किया जिस पर दीक्षार्थी अम्बालाल जैन बैठे उसके बाद आचार्य श्री अनुभव सागर महाराज ने क्षुल्लक दीक्षा के संस्कार किए। दीक्षा महोत्सव के लिए आचार्य श्री सुंदर सागर महाराज का आशीर्वाद परतापुर से लेकर संघ के त्यागी आए। मुनि अनुसरण सागर ,उषा दीदी ने गणधर वलय विधान की सम्पूर्ण क्रिया करवाई। धर्म सभा को मुनि अनुचरण सागर और मुनि अनुसरण सागर ने भी संबोधित किया । आभार प्रदर्शन समाज के अध्यक्ष अशोक जैन महामंत्री राजमल जैन ने किया ।
आज हुआ संस्कार जन्म
अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने बताया कि गृहस्थ से संन्यास की और कदम बढ़ाते अम्बालाल जैन के गर्भ और जन्म के साथ जितने रिश्ते बने उन्हें छोड़कर आज से उनका संस्कार जन्म हुआ है । पहले मां ने गर्भ से जन्म दिया और आज आचार्य अनुभव सागर महाराज ने संस्कार से जन्म दिया है। आज से अम्बालाल का नया नाम, नए रिश्ते हो गए हैं। अब तक मोह के रिश्ते थे आप धर्म से रिश्ते जुड़ेंगे और साधना की ओर निरंतर कदम बढ़ते रहेंगे। अब से हर एक आचरण कर्म निर्जरा का कारण होगा।

इन्हें मिला सौभाग्य

दीक्षार्थी के धर्म के माता-पिता बनने का सौभाग्य चिमनलाल जैन को मिला । क्षुल्लक दीक्षा संस्कार के बाद संयम का उपकरण जयेश -नीलम जैन अहमदाबाद ,कमण्डल दीक्षित जैन अहमदाबाद,शास्त्र भेंट विनोद कुमार महावीर जैन उदयपुर , पात्र पारसमल जैन उदयपुर,वस्त्र राहुल-दीपिका जैन उदयपुर ,जापमाला चिमनलाल बोहरा भेंट की । दीक्षा से पूर्व गोदभराई परिवार और समाज द्वारा की गई ।

11 प्रतिमाओं के संस्कार किए
दर्शन , व्रत , सामायिक , प्रोषधोपवास ,सचित्तत्याग , रात्रिभोजन त्याग , ब्रह्मचर्य ,आरंभ त्याग ,परिग्रह त्याग , अनुमति त्याग ,उद्दिष्ट त्याग।
आचार्य अनुभव सागर महाराज का प्रवचन

दौड़ने का नाम है संसार, गति धीमी कर लेने का नाम है दीक्षा…और रुकना है मुक्ति

संसार का प्रत्येक प्राणी सुख चाहता है। इच्छा और आशाओं का गर्त इतना गहरा और विशाल है कि संपूर्ण विश्व के पदार्थ भी इसमें समा जायें तो भी मनुष्य को वे कम ही पड़ने वाले हैं और खास बात यह है, कि जिनके पास कम हो वे तो कदाचित सुखी हो जाते हैं, परन्तु जिन्हें कम लगता है उनके सुख की कोई संभावना ही नहीं। अपेक्षाओं और कमियों को पूरा करने की चाह में संसारी प्राणी निरंतर तन-मन से दौड़ता रहता है। इच्छाओं की इसी दौड़ का नाम संसार है। मुक्ति की प्राप्ति का मार्ग वही है जहां इच्छाओं की पूर्ति की दौड़ से संभलकर हम अपनी गति को धीमा कर लें। संसार, शरीर और भोगों की क्षणभंगुरता का अहसास मुमुक्षु को इतना जागृत कर देता है कि वह संसार में जरूर रहता है परंतु संसार उसमें नहीं रह जाता अर्थात् संसार का राग उसके मन से धुल जाता है।
दीक्षार्थी को संबोधित करते हुये गुरूदेव ने कहा कि अपने बालों को उखाड़ फेंकना बहुत आसान है किन्तु अपने हृदय से अपने वालों के राग को उखाड़ फेंकना बहुत कठिन है। मार्ग कठिन जरूर है परंतु वैराग्य की दृढ़ता कांटे, कंकर अनुकूल-प्रतिकूल का भय मिटा देती है और जिसका भय मिट गया उसे किसी भी परिस्थिति में घबराहट नहीं होती।


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