बीसवीं सदी के प्रथम आचार्य श्री शान्तिसागर जी का 150वां अवतरण दिवस आज

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  • साधु जीवन के 40 वर्षों में 9938 उपवास किए

न्यूज सौजन्य – राजेश पंचोलिया, इंदौर,
अभिषेक लुहाड़िया, रामगंजमंडी

जयपुर । बीसवीं सदी के प्रथम आचार्य चारित्र चक्रवर्ती प्रातः स्मरणीय आचार्य श्री शान्तिसागर जी महामुनि का कल 25 जुलाई को 150वां अवतरण दिवस है। उनके 150वें जन्मवर्ष 2022 पर कोटिशः नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु-

डेढ़ सौ वर्ष पूर्व 25 जुलाई 1872 का एक अविस्मरणीय दिवस है। भोज ग्राम के भीमगोड़ा जी पाटिल और श्रीमती सत्यवती जी के 1008 श्री वासु पूज्य भगवान के गर्भ कल्याणक दिवस आषाढ़ कृष्णा 6 विक्रम संवत 1929 को एक महामना का जन्म हुआ। बालक का नाम सात गोंडा जी रखा गया। आपसे बड़े 2 भाई, एक भाई छोटा तथा एक बहन भी थी। बचपन से ही उनमें धार्मिक संस्कार रहे। 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने बिस्तर का त्याग कर दिया था।

1937 में चारित्र चक्रवर्ती पद

आपने 18 वर्ष की अल्पायु में ही श्री सिद्ध सागर जी से आजीवन ब्रह्मचर्य रहने का व्रत लिया। 25 वर्ष की उम्र में जूते- चप्पल का त्याग कर दिया। 32 वर्ष की उम्र में सम्मेद शिखर जी की यात्रा की। घी और तेल का आजीवन त्याग कर दिया।
शिखर जी की यात्रा के बाद 32 वर्ष की उम्र में ही एक समय भोजन का नियम ले लिया। सन् 1915 में आपने उत्तर ग्राम में क्षुल्लक दीक्षा श्री देवेंद्र कीर्ति जी स्वामी से ली। आपने गिरनार यात्रा 1918 में 1008 श्री नेमिनाथ भगवान की 5वीं टोंक पर स्वयम ने ऐलक दीक्षा ली। 1920 यरनाल (कर्नाटक) में आपने मुनि दीक्षा ग्रहण की। आपको 1924 में आचार्य पद दिया गया। 1925 में श्री श्रवण बेलगोला महामस्तकाभिषेक के बाद गुरुणा गुरु की उपाधि दी गई। आपने दीक्षा गुरु श्री देवेंद्र कीर्ति जी को पुनः मुनि दीक्षा दी, इसलिए भी गुरुणा गुरु कहा जाता है। सन् 1937 में आपको चारित्र चक्रवर्ती पद दिया गया।

जिनवाणी संरक्षण
आपकी प्रेरणा से धवल जय धवल टीका वाले षटखंडागम महाबंध कषाय पाहुड ग्रन्थ त्रय को 50 मन तांबे के पात्र पर 2664 पत्रों पर अंकित कराया यह ग्रंथ आज भी फलटण में सुशोभित है। आपने नाम अनुरूप शांति के सागर बनकर उपसर्ग सहन किए। आपने अपने साधु जीवन के 40 वर्षों में 9938 उपवास किए।

88 दीक्षाएं दीं
आपने 26 मुनि दीक्षा, प्रथम मुनि शिष्य श्री वीरसागरजी, 4 आर्यिका दीक्षा प्रथम आर्यिका चन्द्रमती जी, 16 ऐलक दीक्षा प्रथम ऐलक श्री पारीस सागर जी, 28 क्षुल्लकदीक्षा प्रथम क्षुल्लक श्री नेमकीर्ति जी, 14 क्षुल्लिका दीक्षा प्रथम क्षुल्लिका शांति मति जी। आपने कुल 88 दीक्षाएं दीं। आपके बड़े भाई ने भी आपसे मुनि दीक्षा लेकर मुनि श्री वर्द्धमान सागर जी बने।

आपने 9938 उपवास किए जो इस प्रकार हैं-
1234 चारित्र शुद्धि, 720 तीस चौबीसी, 468 कर्म दहन 3 बार, 270 सिंह निष्क्रीडित, 256 सोलह कारण 16 बार,36 श्रुत पंचमी 20 विहर मान, 20 तीर्थंकर, 10 दशलक्षण 8 सिद्ध भगवान के, 8 अष्टान्हिका, 200 गणधर 1452 में 200, 48 3 बार 16 दिन समेत 9838 उपवास किए।

विधर्मियों के मंदिर प्रवेश के विरोध में 1105 दिन तक अनाज का त्याग किया। 8 वर्षों तक श्रावकों ने केवल दूध, चावल, पानी दिया। 8 दिन तक आहार में पानी ही नहीं दिया। ललितपुर चातुर्मास में सन् 1929 में सभी रसों का आजीवन त्याग किया। 24 अक्टूम्बर 1951 में गजपंथा जी में 12 वर्ष की नियम सल्लेखना ली और 26 अगस्त 1955 को लिखित पत्र से मुनि श्री वीर सागर जी को आचार्य पद दिया। 36 दिन की सल्लेखना में 18 सितम्बर 1955 को आपकी उत्कृष्ट समाधि हुई।

वर्तमान में आपकी मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परम्परा में पंचम पट्टा धीश पद को वर्ष 1990 से वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी सुशोभित कर वर्ष 2021 का चातुर्मास कोथली में किया है। अब गुरुदेव का श्री महावीर जी अतिशय क्षेत्र राजस्थान में 24 वर्ष बाद आयोजित 1008 श्रीमहावीरस्वामी के महामस्तकाभिषेक के लिए श्री महावीर जी अतिशय क्षेत्र राजस्थान में विराजित हैं। 18 जुलाई 2022 को चातुर्मास कलश स्थापना ससंघ की है।

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