भोजन में शुद्धता का जैनाचार – सीए आदीश कु जैन

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आज कोरोना के चलते खान पान और शुद्धता की चर्चा जोरों पर है। अच्छे स्वास्थ और बीमारियों से बचने के लिए वनस्पति आधारित और शाकाहारी भोजन का महत्व सारा विश्व समझ रहा है, और कुछ जाने माने रेस्टोरेंट भी अब वनस्पति आधारित और शाकाहारी भोजन परोसने लगे हैं। लेकिन इसके साथ साथ खानपान में शुद्धता अर्थात हाइजीन का भी अपना विशेष महत्व है। जैनाचार में खानपान की शुद्धता (हाइजीन) की भी सटीक वैज्ञानिक व्याख्या है। जैन रसोई में सोला का भोजन शब्द प्रयोग किया जाता है, ये न तो केवल नाम है और न ही कोई रूढ़िवादी परम्परा है। इसमें शुद्धता के ठोस वैज्ञानिक आधार हैं। शुद्धता के दृष्टिकोण से सोला के भोजन की विशुद्ध भोजन व्यवस्था समझना भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

सोला का अर्थ है सोलह और ये शुद्धता के सोलह नियम हैं । भोजन की पूर्ण शुद्धता के लिए ये नियम इस प्रकार हैं :

भोजन निर्माण प्रक्रिया के सोलह नियम चार वर्गों में विभाजित हैं ।

1. द्रव्य शुद्धि

2. क्षेत्र शुद्धि

3. काल शुद्धि

4. भाव शुद्धि

इन चारों वर्गों में चार चार नियम हैं, इस प्रकार कुल सोलह नियम हैं।

1. द्रव्य शुद्धि

  • अन्न शुद्धि – खाद्य सामग्री सड़ी गली घुनी एवं अभक्ष्य न हो ।
  • जल शुद्धि – जल जीवानी (छाना) किया हुआ और प्रासुक (कुनकुना) हो ।
  • अग्नि शुद्धि – ईंधन देखकर (जीवादि न हों) शोध कर उपयोग किया गया हो ।
  • कर्त्ता शुद्धि – भोजन बनाने वाला स्वस्थ हो, स्नान करके, धुले शुद्ध वस्त्र पहने हों , नाखून बडे न हों , अंगुली वगैरह कट जाने पर खून का स्पर्श खाद्य वस्तु से न हो , गर्मी में पसीने का स्पर्श न हो जिससे पसीना खाद्य वस्तु में ना गिरे । 

2. क्षेत्र शुद्धि – 

  • प्रकाश शुद्धि – रसोई में समुचित सूर्य का प्रकाश रहता हो ।
  • वायु शुद्धि – रसोई में शुद्ध हवा का संचार हो ।
  • स्थान शुद्धि – रसोई लोगों के आवागमन का सार्वजनिक स्थान न हो एवं अंधेरे वाला स्थान न हो ।
  • दुर्गंध शुद्धि – हिंसादि कार्य न होता हो और गंदगी से दूर हो।

 3. काल शुद्धि – 

  • ग्रहण काल – चंद्र ग्रहण, सूर्य ग्रहण के काल में भोजन न बनाया जाय ।
  • शोक काल – शोक दुःख अथवा मरण के समय भोजन न बनाया जाय । 
  • रात्रि काल – रात्रि के समय भोजन नहीं बनाना चाहिए ।
  • प्रभावना काल – धर्म प्रभावना अर्थात् उत्सव काल के समय भोजन नहीं बनाना चाहिए ।

4. भाव शुद्धि

  • वात्सल्य भाव – पात्र और धर्म के प्रति वात्सल्य होना चाहिए ।
  • करुणा भाव – सब जीवों एवं पात्र के ऊपर दया का भाव रखना चाहिए ।
  • विनय भाव – पात्र के प्रति विनय का भाव होना चाहिए ।
  • दान भाव – दान करने का भाव रहना चाहिए । 

इन सोलह नियमों में हाइजीन की कई बातों की वैज्ञानिकता तो लोगों की समझ में आ जाती हैं, लेकिन उनकी तार्किक सोच केवल द्रव्य शुद्धि और क्षेत्र शुद्धि तक ही सीमित रह जाती है। जबकि पूर्ण शुद्धता के लिए काल शुद्धि और भाव शुद्धि भी उतने ही जरूरी हैं। काल शुद्धि का वैज्ञानिक आधार बॉडी क्लॉक और खाद्य पदार्थों की काल के अनुसार बदलती तासीर से जुड़ा है। भाव शुद्धि शुद्धि का वैज्ञानिक आधार भावनाओं के बायोलॉजिकल सिग्नल्स में निहित है, इन सिग्नल्स शुद्धि के स्वास्थ में महत्व का आकलन अब वैज्ञानिक भी करने लगे हैं।  भोजन की शुद्धि के लिए इन सोलह नियमों के पालन की व्यवस्था ही विशुद्ध सोला के भोजन का जैनाचर है जो अच्छे स्वास्थ के लिए उपयोगी है।

साधु, साध्वियों की आहार चर्या में इन नियमों का पूर्ण पालन आवश्यक है। कई जैन अपने रोजमर्रा के जीवन में भी इनका पूर्ण या आंशिक पालन करने में प्रयासरत रहते हैं और इसी शुद्धता के ध्यान से कई जैन, पार्टियों, रेस्टोरेंट में खानपान से परहेज करते हैं।

सीए आदीश कु जैन

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