बिना गुरु के ज्ञान नहीं और जिसके जीवन में गुरु नहीं उसका जीवन शुरू नहीं

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गुरु पुर्णिमा के अवसर गुरु भक्तों ने अपने भाव अभिव्यक्त किए

न्यूज सौजन्य-राजेश जैन दद्दू

इंदौर ।  हर दिन ही अपने गुरु की वंदना के लिए श्रेष्ठ है पर गुरु पूर्णिमा का अपना महत्व है। गुरु पूर्णिमा अर्थात सद्गुरुओं के प्रति समर्पण भाव को अभिव्यक्ति देने वाला पर्व। यह पर्व हमें गुरु के चरणों में अपना अनुग्रह अहोभाव और श्रद्धा सुमन अर्पित करने का अवसर देता है। इस पावन पर्व पर गुरु भक्त डॉ जैनेन्द्र जैन और राजेश जैन दद्दू ने अपने गुरु के प्रति श्रध्दा सुमन के भाव अभिव्यक्त करते हुए कहा कि साधनारत समस्त धरती के देवताओं का स्मरण करते हुए नमोस्तु नमोस्तु और सभी गुरु भक्तों को यथा योग्य अभिवादन।

साथ ही कहा कि गुरु की महिमा अनंत है और उनके उपकारों से भी हम कभी उऋण नहीं हो सकते इसलिए कहा जाता है कि बिना गुरु के ज्ञान नहीं और जिसके जीवन में गुरु नहीं उसका जीवन शुरू नहीं। इस लोक और परलोक के सुख के लिए हमें अलग-अलग क्षेत्रों में महारत हासिल कर चुके गुरुओं की आवश्यकता होती है। जिनसे हम विविध ज्ञान प्राप्त कर अपने व्यक्तित्व का विकास करते हैं। वैसे तो लोक में माता-पिता अध्यापक और श्रेष्ठ ज्ञानी पुरुषों को भी गुरु कहा जाता है लेकिन श्रमण संस्कृति और जैन आगम के अनुसार, निर्ग्रन्थ वीतरागी दिगंबर जैन आचार्य, उपाध्याय और मुनि सच्चे गुरु व आर्यिका माताजी गुरु मां कहलाने के अधिकारी हैं।

यह हमारा सौभाग्य है कि पंचम काल में हमें ऐसे वीतरागी और सच्चे गुरुओं के दर्शन व उनका सान्निध्य मिला है जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान एवं धर्म का प्रकाश सब जगह फैला रहे हैं। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर साधनारत श्रमण संस्कृति के महामहिम संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ एवं श्रेष्ठ चर्या शिरोमणि आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ससंघ सहित साधनारत अन्य समस्त आचार्य, उपाध्याय, मुनिष एवं नगर में विराजित साधनारत बहु भाषाविद श्रुत संवेगी श्रमण मुनि आदित्यसागरजी महाराज ससंघ अन्य मुनि राजों सहित सभी को नमोस्तु एवं वंदनीय गुरु मां आर्यिका पूर्णमति माताजी ससंघ
सहित अन्य सभी आर्यिका माता जी को वंदामी करते हुए कहा कि सभी का रत्नत्रय सदैव कुशल मंगल रहे एवं संयम मार्ग पर चलते हुए शतायु हों और ज्ञान धर्म की प्रभावना कर हमारा मार्ग प्रशस्त करते रहें।

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