दर्द- चार दिन में ही यह बिखराव समाज को क्या संदेश देगा

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14 दिसंबर को 2 दीक्षा के मौके पर 2 किमी दूर विराजित अन्य आचार्यों को क्यों नहीं बुलाया ?

बांसवाड़ा । बांसवाड़ा में आचार्य श्री सुंदर सागर महाराज ने 10 दिसम्बर को 6 मुमुक्षुओं को दीक्षा दी तो मंच पर दीक्षा प्रदाता सही पांच आचार्य का सानिध्य मिलने से समाज में सकारात्मक संदेश गया। इस समय आचार्य सुंदर सागर जी के साथ आचार्य श्री समता सागर महाराज, आचार्य श्री विभव सागर महाराज, आचार्य श्री सुवीर सागर महाराज, आचार्य श्री अनुभव सागर महाराज विराजित थे। दीक्षा दिन ही आचार्य विभव सागर महाराज का 24 वां दीक्षा दिवस भी मनाया गया।वहीं इसके चार दिन बाद, 14 दिसम्बर को बांसवाडा में ही आचार्य विभव सागर महाराज ने 2 दीक्षा प्रदान की। इस मौके पर अकेले दीक्षा प्रदाता आचार्य श्री विभव सागर महाराज ही मंच पर थे। उनसे 2 किमी दूर विराजीत अन्य आचार्य दीक्षा के मंच पर नहीं दिखाई दिए। आखिर ऐसा क्या कारण रहा ? यह बात समाज के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है । क्या इससे समाज पर नकारात्मक प्रभाव पढ़ेगा ? इस घटना से वागड़ में एक नई परम्परा का चलन शुरू हुआ। ऐसी घटना से समाज में एक दूसरे के प्रति वात्सल्य अंग भी नहीं दिखाई दे रहा है।
ऐसा क्या कारण था कि आचार्य श्री विभव सागर महाराज ने आचार्यश्री सुंदर सागर महाराज को सानिध्य प्रदान करने के लिए आग्रह भी नहीं किया। यह जानना जरूरी है कि जहां हजारों श्रावक-श्राविकाओं को कार्यक्रम में आने का निमंत्रण दिया गया पर एक सयंमी की दीक्षा में एक संयमी संघ (आचार्य श्री सुंदर सागर जी महाराज) को मौजूद रहने का आग्रह क्यों नहीं किया गया। ऐसे क्या परेशानी थी और किसकी। कुछ प्रश्न जो सभी श्रावकों के मन मस्तिष्क में घूम रहे हैं।
ये सवाल उठ रहे मन में :
• आख़िर कौन नहीं चाहता कि दूसरा संघ कार्यक्रम में नही आए।
• क्या आचार्य श्री सुंदर सागर महाराज जी के मंच आने से सिद्धान्त का लोप हो रहा था ।
• क्या आचार्य श्री विभव सागर महाराज के मान सम्मान में अंतर हो जाता ?
• आचार्य श्री विभव सागर महाराज इस घटना से क्या संदेश देना चाह रहे थे ?
• दोनों आचार्य एक ही आचार्य परम्परा के, फिर क्या मजबूरी ?
• 10 दिसम्बर को एक ही मंच पर पांचों आचार्य के पाद प्रक्षालन हुआ तो छोटे-बड़े की बात नही थी ?
• क्या मंच पर बैठने की पर्याप्त जगह नही थी ?
• एक आचार्य का इस प्रकार का करना योग्य है ।
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