दीपों से जगमगाया शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर

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मां पद्मवाती की मूर्ति का भव्य श्रंगार

भीलूड़ा। अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज के सान्निध्य में शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में नवरात्रि के अवसर पर नौ दिन तक जिनेन्द्र भगवान की भक्ति और मां पद्मवाती की आराधना की गई। महोत्सव के अंतिम दिन बड़े ही उत्साह से मां पद्मावाती का स्वर्णआभूषण से भव्य श्रंगार किया जाता है। कर्नाटक में इस प्रकार का उत्सव मनाने की परम्परा रही है।प्रातःकाल भगवान पार्श्वनाथ का पंचामृत अभिषेक हितेश जैन,मीनेष जैन,प्रतिभा जैन ने किया। उसके बाद मां पद्मवाती का श्रृंगार किया गया। शाम 7 बजे पंडाल में मां पद्मवाती की मूर्ति को साड़ी, चूड़ी,फल,फूल और रोशनी से सजाया गया और 1008 दीपकों का स्वस्तिक बनाकर सहस्त्रनाम के मंत्र बोलते हुए दीप जलाए गए।
मां पद्मावती की आराधना के मुख्य यजमान प्रेरणा नरेंद्र शाह सागवाड़ा थे। इसकी साथ ही सुनीता कमलेश जैन परिवार ने भी प्रमुख यजमान बनकर आराधना की।  दीपिका जैन, सुलोचना जैन, मोनिका जैन, अंजली जैन, हिमानी जैन, संध्या जैन, प्रियंका जैन,संगीता जैन, प्रतिभा जैन, सुषमा जैन ने भी मां पद्मावाती की गोद भराई की और सभी आराधना करने वाले श्रावकों ने 1008 दीप जलाए। प्रत्येक परिवार ने मां पद्मावती को कुमकुम अर्चना,अर्घ्य,दीपक फल भी समर्पित किए। मुख्य कलश स्थान मोहित जैन व चार कलश की स्थापना का लाभ हितेश जैन, दीपक जैन,पंकज जैन,तृष्टि जैन को मिला। आरती चेतना जी और अष्ट द्रव्य समर्पण करने का लाभ धर्मेंद्र जैन को मिला।
नौदिवसीय आराधना क्षुल्लक अनुश्रवण और तृष्टि दीदी के मार्गदर्शन में एवं हितेश जैन मीनेष  जैन निदेशन में सम्पन्न हुए। संचालन धमेंद्र जैन ने किया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से रमणलाल जैन, अरविंद जैन, ओमप्रकाश जैन,कांतिलाल जैन,जयंतीलाल जैन,कमलेश जैन,ललित जैन,अनोखी जैन,मोहित जैन,सुभाष जैन,चंद्रकांत शाह आदि उपस्थित थे।

इस मौके पर अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने प्रवचन में कहा कि तीर्थंकर के यक्ष – यक्षिणी ने धर्म प्रभावना का सहयोग किया है। उनके उपकार का स्मरण करते हुए सम्मान स्वरूप पूजन आराधना करना हम श्रावकों का कर्तव्य है। शास्त्रों में उल्लेख है कि चक्रवर्ती भरत ने 9 दिन तक देवी- देवताओं की आराधना की थी, तभी से यह परम्परा चली आ रही है। इनकी आराधना से हमारे धर्म प्रभावना में सहयोग मिलता है। देवी देवताओं की आराधना से सम्यक्त्व में मलिनता नहीं आती, बल्कि धर्म प्रभावना होता है।

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