धर्मात्मा पाप से डरता है, पापी से नहींः मुनि श्री शुद्ध सागर जी

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  • तीर्थंकर भगवान की देशना स्याद्वाद वाणी का उपदेश
  • खुद को बदलना होगा, दूसरों को बदलने से हमें कुछ नहीं मिलेगा

रावतभाटा (चितौड़गढ़)। मुनि श्री शुद्ध सागर जी महाराज का अमृतमय वर्षायोग धर्म नगरी रावतभाटा चितौड़गढ़ में चल रहा है। मुनि श्री संघ श्री 1008 पारसनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, नया बाज़ार, रावतभाटा में विराजमान हैं। प्रातःकाल उन्होंने श्रावकों को तीर्थंकर भगवान की देशना स्याद्वाद वाणी का उपदेश देते हुए कहा कि धर्म करने के लिए हमें स्वयं को बदलना होगा। हमारे अंदर धर्म की जो राय बनी है, उसे टटोलना होगा। मुनिश्री कहते हैं कि जब बिना बदले रोटी नहीं बन पाती है तो हम “धर्मात्मा” केसे बन सकते हैं। आत्मा में कोई बदलाव नहीं आता है, वह नरक, तिर्यंच, निगोद संसार सभी जगह समान है। संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं- कुछ पापात्मा व कुछ पुण्यात्मा। दोनों की आत्मा वहीं होती है उसमें कोई बदलाव नहीं आता है। मात्र अंतर इतना होता है कि धर्मात्मा जो होता है, उसे बदलना पड़ता है।

मुनि श्री ने अपने प्रवचन में आगे कहा कि मात्र मंदिर जाने से, अभिषेक, पूजन करने से हम धर्मात्मा नहीं बनते हैं। हमें अपने आचार, विचार सब बदलना होगा तभी हम धर्मात्मा बन सकते हैं। मुनि श्री ने श्रोताओं से कहा कि धर्मात्मा जो होता है, वह पाप से डरता है। पाप करने से डरता है परन्तु वह “पापी” से नहीं डरता है। हमें यह विचारने की जरूरत है कि हम पाप से डरते हैं या पापी से? यदि हम पाप से डरते हैं तो हम धर्मात्मा हो सकते है लेकिन जो पापी से डरता है वह तीन काल में भी धर्मात्मा होने वाला है नहीं।

पापी से घृणा करना ही पाप

मुनि श्री कहते हैं कि पापी से घृणा करना ही पाप है। पाप से घृणा करने वाला, पापी से घृणा कर ही नहीं सकता है।

अपने आप से राग करना तथा दूसरों से घृणा करना यही पाप होता है। मुनि श्री कहते हैं कि बिना बदले संसार में कोई कार्य संभव नहीं होता है । कार्य की परिभाषा देते हुए मुनि श्री कहते है कि वस्तु का बदल जाना ही कार्य है।
मुनिश्री कहते हैं हे जीव, तू सोचता है कि मैं धर्म करूं और तू बदलना भी नहीं चाहता है तो तेरा धर्म केसे होगा? जितना जितना हम खुद को बदलेंगे, उतना हमारा धर्म अग्रसर होगा। संसारी जीव की यही धारणा होती है कि मैं दूसरों को बदलूं, वह यह कभी नहीं सोचता कि में स्वयं को बदलूं। दूसरों को बदलने से हमें कुछ नहीं मिलेगा। हे जीव, यदि तू स्वयं को बदलेगा तो तेरा कल्याण होगा और तू उतना ही धर्मात्मा होगा।
मुनि श्री ने अंत में श्रावकों से कहा कि हे जीव, यदि तुझे संसार में ही रहना है तो तू धर्म कर ही क्यूं रहा है। बाहर से तो तू धर्मात्मा कहला रहा है और अंदर से तेरे धर्म के भाव ही नहीं है तो उससे भी तू मात्र पाप का ही बंध कर रहा है। धर्म और विवेक का सहवर्तीपना संबंध है। जहां विवेक होगा, वहां धर्म होगा और जहां विवेक नहीं होगा, वहां धर्म किंचित मात्र भी नहीं हो सकता है। मुनि श्री ने बताया, सुख-दुख दोनों हमारे कर्म का निमित होता है।

प्रवचन में रावतभाटा के पुरुष, महिला, बालक , बालिकाएं व गुरु भक्त उपस्थित थे।

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