गणतंत्र दिवस विशेष : ‘गणतंत्र’ का जनक दुनिया का पहला गणराज्य वैशाली और भगवान महावीर स्वामी -डॉ. सुनील जैन संचय, ललितपुर

label_importantआलेख

गणतंत्र का अर्थ है हमारा संविधान-हमारी सरकार-हमारे कर्त्तव्य-हमारा अधिकार। इस व्यवस्था को हम सभी गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं। स्वतंत्र भारत देश का सविंधान डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर के नेतृत्व में लिखा जिसे लिखने में 2 साल 11 महीने 18 दिन लगे। गणतंत्र दिवस भारत का राष्ट्रीय पर्व है। यह दिवस भारत के गणतंत्र बनने की खुशी में मनाया जाता है। इसे सभी जाति एवं वर्ग के लोग एक साथ मिलकर मनाते हैं।

गणतंत्र दिवस हमारी प्राचीन संस्कृति का गरिमा का गौरव दिवस है। भारत आज लोकतंत्र की मशाल जलाते हुए दुनिया में आशा-उमंग, शांति के आकर्षण का केंद्र बिंदु बन गया है। 15 अगस्त 1947 को देश अंग्रेजों से आजाद हुआ और 26 जनवरी 1950 को भारत देश एक लोकतांत्रिक, संप्रभु तथा गणतंत्र देश घोषित किया गया। अंग्रेजों से स्वतंत्रता के बाद भले ही हम 72वां गणतंत्र दिवस मना रहे हों लेकिन गणतंत्र की लोकतांत्रिक व्यवस्था का जनक भारत ही है।

‘गणतंत्र’ एक ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था का जनक भारत ही है। इसकी शुरुआत भारत के बिहार राज्य के वैशाली से हुई है। उन दिनों ये प्रांत वैशाली गणराज्य के नाम से जाना जाता था।
ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार बिहार प्रान्त में स्थित वैशाली में ही विश्व का सबसे पहला गणतंत्र यानि “रिपब्लिक” कायम किया गया था। भगवान महावीर की जन्म स्थली होने के कारण जैन धर्म के मतावलम्बियों के लिए वैशाली एक पवित्र स्थल है। भगवान बुद्ध का इस धरती पर तीन बार आगमन हुआ, यह उनकी कर्म भूमि भी थी। महात्मा बुद्ध के समय सोलह महाजनपदों में वैशाली का स्थान मगध के समान महत्त्वपूर्ण था। अतिमहत्त्वपूर्ण बौद्ध एवं जैन स्थल होने के अलावा यह जगह पौराणिक हिन्दू तीर्थ एवं पाटलीपुत्र जैसे ऐतिहासिक स्थल के निकट है। वैशाली को भारतीय दरबारी आम्रपाली की भूमि के रूप में भी जाना जाता है। बौद्ध तथा जैन धर्मों के अनुयायियों के अलावा ऐतिहासिक पर्यटन में दिलचस्‍पी रखने वाले लोगों के लिए भी वैशाली महत्त्‍वपूर्ण है। वैशाली की भूमि न केवल ऐतिहासिक रूप से समृद्ध है वरन् कला और संस्‍कृति के दृष्टिकोण से भी काफी धनी है। वैशाली जिला के चेचर (श्वेतपुर) से प्राप्त मूर्तियाँ तथा सिक्के पुरातात्विक महत्त्व के हैं। वैशाली अपने हस्‍तशिल्‍प के लिए विख्‍यात है।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने वैशाली के संबंध में लिखा है –

वैशाली जन का प्रतिपालक, विश्व का आदि विधाता, जिसे ढूंढता विश्व आज, उस प्रजातंत्र की माता॥ रुको एक क्षण पथिक,इस मिट्टी पे शीश नवाओ, राज सिद्धियों की समाधि पर फूल चढ़ाते जाओ||

ऐतिहासिक प्रमाणों के मुताबिक ईसा से लगभग छठी सदी पहले वैशाली में ही दुनिया का पहला गणतंत्र यानी ‘गणराज्य’ कायम हुआ था। आज जो लोकतांत्रिक देशों में अपर हाउस और लोअर हाउस की प्रणाली है, जहां सांसद जनता के लिए पॉलिसी बनाते हैं, ये प्रणाली भी वैशाली गणराज्य में थी। वहां उस समय छोटी-छोटी समितियां थी, जो गणराज्य के अंतर्गत आने वाली जनता के लिए नियमों और नीतियों को बनाते थे।

प्राचीन गणतंत्र ‘वैशाली’ और महावीर स्वामी : विश्‍व को सर्वप्रथम गणतंत्र का पाठ पढ़ने वाला स्‍थान वैशाली ही है। आज वैश्विक स्‍तर पर जिस लोकतंत्र को अपनाया जा रहा है वह यहां के लिच्छवी शासकों की ही देन है। लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व नेपाल की तराई से लेकर गंगा के बीच फैली भूमि पर वज्जियों तथा लिच्‍छवियों के संघ (अष्टकुल) द्वारा गणतांत्रिक शासन व्यवस्था की शुरुआत की गयी थी। यहां का शासक जनता के प्रतिनिधियों द्वारा चुना जाता था।

दरअसल वैशाली नगर वज्जी महाजनपद की राजधानी थी। महाजनपद का मतलब प्राचीन भारत के शक्तिशाली राज्यों में से एक होता था। ये क्षेत्र प्रभावशाली था अपने गणतांत्रिक मूल्यों की वजह से। वैशाली गणराज्य को लिच्छवियों ने खड़ा किया था। वैशाली को कुछ इतिहासकार गणतंत्र का ‘मक्का’ भी कहते हैं।

ऐतिहासिक साहित्य से ज्ञात होता है कि भगवान महावीर के काल में अनेक गणराज्य थे। तिरहुत से लेकर कपिलवस्तु तक गणराज्यों का एक छोटा सा गुच्छा गंगा से तराई तक फैला हुआ था। गौतम बुद्ध शाक्यगण में उत्पन्न हुए थे। लिच्छवियों का गणराज्य इनमें सबसे शक्तिशाली था, उसकी राजधानी वैशाली थी। लिच्छवी संघ नायक महाराजा चेटक थे। महाराजा चेटक की ज्येष्ठ पुत्री का नाम ‘प्रियकारिणी त्रिशला’ था जिनका विवाह वैशाली गणतंत्र के सदस्य एवं क्षत्रिय ‘कुण्डग्राम’ के अधिपति महाराजा सिद्धार्थ के साथ हुआ था और इन्हीं के यहाँ 599 ईसापूर्व चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन बालक वर्धमान (महावीर स्वामी) का जन्म वज्जिकुल में हुआ जिसने अनेकान्त-स्याद्वाद सिद्धांत के माध्यम से पूरे विश्व को अच्छे लोकतंत्र की शिक्षा प्रदान कर एक नई दिशा प्रदान की।

भगवान महावीर के सिद्धांत, शिक्षाएं, संविधान आज भी अत्यंत समीचीन और प्रासंगिक हैं। उन्होंने अपने जीवन काल में बहुत सी सामाजिक कुरीतियों की समाप्ति और समाज सुधार के लिए सम्यकदर्शन, सम्यकज्ञान और सम्यक् आचरण के सिद्धांतों का प्रयोग किया। उन्होंने स्त्री-दासता, महिलओं के समान दर्जे और सामाजिक समता जैसे विषयों पर सामाजिक प्रगति की शुरूआत की। भगवान महावीर की शिक्षाओं में पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों का ह्रास, युद्ध और आतंकवाद के जरिए हिंसा, धार्मिक असहिष्णुता तथा गरीबों के आर्थिक शोषण जैसी सम-सामयिक समस्याओं के समाधान पाए जा सकते हैं। भगवान महावीर ने ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का शंखनाद कर ‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’ की भावना को देश और दुनिया में जाग्रत किया। ‘जियो और जीने दो’ अर्थात् सह-अस्तित्व, अहिंसा एवं अनेकांत का नारा देने वाले महावीर स्वामी के सिद्धांत विश्व की अशांति दूर कर शांति कायम करने में समर्थ है।

आज विश्व के सामने उत्पन्न हो रहीं सुनामी, ज्वालामुखी जैसी प्राकृतिक आपदाएं, हिंसा का सर्वत्र होने वाला ताडंव, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, अनैतिकता, वैमनस्य, युद्ध की स्थितियां, प्रकृति का शोषण आदि समस्याएं विकराल रूप ले रही हैं। ऐसी स्थिति में कोई समाधान हो सकता है तो वह महावीर स्वामी का अहिंसा, अपरिग्रह और समत्व का चिंतन है। भगवान महावीर के तीन सिद्धांत अहिंसा, अनेकांत और अपरिग्रह बहुत सी आधुनिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं।

साहित्यकारों के अनुसार वज्जिकुल में जन्मे भगवान महावीर यहाँ 22 वर्ष की उम्र तक रहे थे। जैन परंपरा के अनुसार 30 वर्ष तक राजप्रसाद में रहकर आप आत्म स्वरूप का चिंतन एवं अपने वैराग्य के भावों में वृद्धि करते रहे। 30 वर्ष की युवावस्था में आप महल छोड़कर जंगल की ओर प्रयाण कर गये एवं वहां मुनि दीक्षा लेकर 12 वर्षों तक घोर तपश्चरण किया। तदुपरान्त 30 वर्षों तक देश के विविध अंचलों में पदविहार कर आपने संत्रस्त मानवता के कल्याण हेतु धर्म का उपदेश दिया। कार्तिक अमावस्या को पावापुरी में आपको निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त हुआ।

यह जगह भगवान महावीर का जन्‍म स्‍थान होने के कारण काफी लोकप्रिय है। यह स्‍थान जैन धर्मावलम्बियों के लिए काफी पवित्र माना जाता है। इसके अलावा वैशाली महोत्‍सव, वैशाली संग्रहालय तथा हाजीपुर के पास की दर्शनीय स्थल एवं सोनपुर मेला आदि भी देखने लायक है। यह नगरी जैन और बौद्ध धर्म का केंद्र थी। यहां कई अशोक स्तंभ के अलावा कुछ बौद्ध स्तूप हैं।

भारतीय संविधान में भगवान महावीर स्वामी (वर्द्धमान) :

अगर हम मूल संविधान की प्रति उठाकर पन्नों को पलटते है तो हमें उसके अंदर सुविख्यात चित्रकार नन्दलाल बोस की कूची से बनाये हुए कुल 22 चित्र नजर आते हैं। इन चित्रों में वैशाली के वर्द्धमान स्वामी (भगवान महावीर) और बौद्ध के चित्र भी सम्मिलित हैं।
भारतीय संविधान की सुलिखित प्रति के 63वें पृष्ठ पर 24वे तीर्थंकर वर्धमान (महावीर स्वामी) की तप में लीन मुद्रा का एक चित्र अंकित है। भारत को अहिंसा परमो धर्म: की संस्कृति प्रदान करने वाले जैनधर्म देश में आध्यात्मिक जागरण का एक और प्रवाह है, जिसने जीवन में आचार को सर्वाधिक महत्त्व दिया। महावीर की अहिंसा के अमोघ अस्त्र को महात्मा गाँधी ने अपनाया और भारत को शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य की दासता से मुक्त कराया।
‘रिश्वतखोरी, बेईमानी, अत्याचार अवश्य नष्ट हो जायें, यदि हम भगवान महावीर की सुन्दर और प्रभावशाली शिक्षाओं का पालन करें। बजाय इसके कि हम दूसरों को बुरा कहें और उनमें दोष निकालें। अगर भगवान महावीर के समान हम सब अपने दोषों और कमजोरियों को दूर कर लें तो सारा संसार खुद ब खुद सुधर जाए।’
26 नबम्बर 1949 को जिस संविधान सभा ने नए विलेख को आत्मार्पित,आत्मसात किया है असल में वह परम्परा और आधुनिक भारत के सुमेलन का उदघोष मात्र था।

प्राचीन भारत की देन है गणतांत्रिक व्यवस्था :

भारत में प्राचीन काल में कई राज्य गणतंत्र सिस्टम से संचालित होते थे। सही मायनों में दुनिया में जहां भी गणतांत्रिक व्यवस्था लागू दिखती है, वो प्राचीन भारत की देन है. प्राचीन भारत में सबसे पहला गणराज्य वैशाली था। बिहार के इस प्रांत को वैशाली गणराज्य के नाम से जाना जाता था।

अमेरिका में होने वाले चुनावों के वक़्त हमें प्रेसिडेंशियल डिबेट्स की खबर देखने को मिलती है. ऐसी ही बहसें आज से लगभग 2600 साल पहले वैशाली गणराज्य में अपने नए गणनायक को चुनने के लिए होती थीं। कई इतिहासकारों का ये भी मानना है कि अमेरिका में जब लोकतंत्र का ताना-बाना बुना जा रहा था, तब वहां के पॉलिसी-मेकर्स के दिमाग में वैशाली के गणतंत्र का मॉड्यूल चल रहा था.

प्राचीनकाल में वैशाली बहुत ही समृद्ध क्षेत्र हुआ करता था। लिच्छीवियों के संघ (अष्टकुल) द्वारा गणतांत्रिक शासन व्यवस्था की शुरूआत वैशाली से की गई थी। आजादी की लड़ाई के दौरान 1920, 1925 तथा 1934 में महात्मा गाँधी का वैशाली में आगमन हुआ था।

भारत के संविधान विषयक जैन तथ्य : भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ, जिसे गणतंत्र दिवस के रूप में प्रतिवर्ष मनाते हैं। भारत के संविधान के प्रथम पृष्ठ पर मोहनजोदड़ो से प्राप्त उस सील को दर्शाया गया है, जिस पर एक बैल अंकित है। बैल प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का चिन्ह है। पृष्ठ 63 पर भगवान महावीर का चित्रांकन है। पृष्ठ 154 पर महात्मा गांधी जी को तिलक करती एक महिला चित्रित है जो संभवत गांधी जी की दांडी यात्रा के समय का है। ज्ञातव्य है कि गांधी जी की दांडी यात्रा के समय महिलाओं का नेतृत्व श्रीमती सरला देवी सारा भाई जैन ने किया था। संविधान निर्माण में विभिन्न प्रांतों से चुने हुए जैन धर्मावलंबियों ने भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। इनमें संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य श्री अजितप्रसाद जैन, सहारनपुर (उ.प्र.), श्री कुसुमकान्त जैन, थांदला जिला झाबुआ (म.प्र.), श्री भवानी अर्जुन खीमजी, खामगांव, श्री बलवंतसिंह मेहता, उदयपुर (राज.), श्री रतनलाल मालवीय, सागर (म.प्र.) आदि ‘जैन’ थे।

भारतीय संविधान में जैन धर्म के तत्व :

भारत के संविधान में जैन धर्म दर्शन में निहित भावनाओं का भी समावेश है। सुप्रसिद्ध संविधान विशेषज्ञ डॉक्टर एल एम सिंघवी ने 25 अप्रैल 2002 को भगवान महावीर के 2600वे जन्मजयंती महोत्सव के समापन के अवसर पर ठीक ही कहा था कि -भगवान महावीर ने विश्व को मनुष्यता का संविधान दिया है। हमारा संविधान ‘जियो और जीने दो’ की घोषणा करने वाला है। धारा 21 हमें प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण का अधिकार प्रदान करती है।
अर्थात हमें स्वतंत्रता पूर्वक जीने का अधिकार प्रदान करती है। वहां स्पष्ट कहा गया है कि-‘ किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं। इसी प्रकार धारा 51 (छ) और (झ) प्राणीमात्र के प्रति दया भाव और हिंसा से दूर रहने का विधान करती है। दूसरे शब्दों में ‘जीने दो’ की उद्घोषणा करती है। हमारे संविधान की उद्देशिका में भारत को लोकतंत्रात्मक गणराज्य कहा गया है यहां भारत को पंथनिरपेक्ष भी कहा गया है। यहाँ भारत को पंथनिरपेक्ष भी कहा गया है साथ ही विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता भी इसी उद्देशिका में दी गई है।

समानता, बंधुत्व , समरसता का लें संकल्प :

गणतंत्र दिवस हमारे संविधान में संस्थापित स्वतंत्रता, समानता, एकता, भाईचारा और सभी भारत के नागरिकों के लिए न्याय के सिद्धांतों को स्मरण और उनको मजबूत करने का एक उचित अवसर है, क्योंकि हमारा संविधान ही हमें अभिव्यक्ति की आजादी देता है। अगर देश के नागरिक संविधान में प्रतिष्ठापित बातों का अनुसरण करेंगे तो इससे देश में अधिक लोकतांत्रिक मूल्यों का उदय होगा।

गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारत के प्रत्येक नागरिक को भारतीय संविधान और गणतंत्र के प्रति अपनी वचनबद्धता दोहरानी चाहिए और देश के समक्ष आने वाली चुनौतियों का मिलकर सामूहिक रूप से सामना करने का प्रण लेना चाहिए। साथ-साथ देश में शिक्षा, समानता, सदभाव, पारदर्शिता को बढ़ावा देने का संकल्प लेना चाहिए। जिससे कि देश प्रगति के पथ पर और तेजी से आगे बढ़ सके।

धन्यवाद!

डॉ. सुनील जैन संचय, ललितपुर
ज्ञान कुसुम भवन, गांधीनगर, नईबस्ती ललितपुर उत्तर प्रदेश
9793821108
[email protected]

Related Posts

Menu