गुरु के प्रति जितनी हमारी श्रद्धा जीवन में उतनी सफलता, भाग्यशाली है वह व्यक्ति जिनके पास गुरु है – मुनिश्री आदित्य सागर जी महाराज

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न्यूज सौजन्य- राजेश जैन दद्दू

इंदौर। गुरु शिष्य का रिश्ता अटूट होता है जिस तरह एक मां से बच्चे का। गुरु के बिना कुछ नहीं होता ना ही गुरु कहने भर से। तीर्थंकर बनने वाले जीव को भी गुरु की आवश्यकता होती है। गुरु कुंभकार हैं जो अपने ज्ञान से शिष्य में छिपी योग्यता को उभार कर उसके व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। दुनिया में कितने अमीर हो लेकिन भाग्यशाली वही हैं जिनके पास गुरु हैं। गुरु बनाना तभी सफल होगा जब आप गुरु की गरिमा को अंतरंग और बहिरंग से दिखाते है उक्त विचार गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज के शिष्य मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने व्यक्त किए। कंचनबाग स्थित समोसरण मंदिर में गुरु की महिमा बताते हुए मुनि श्री ने कहा कि गुरु शिष्य को मां की तरह पुचकारते हैं, पिता की तरह दुलारते हैं और आवश्यकता पड़ने पर बड़े भाई की तरह डांटते भी हैं। गुरु दूर दृष्टि होते हैं और वे जानते हैं कि शिष्य को कब हंसाना है, कब रुलाना है। जीवन में गुरु का होना आवश्यक है लेकिन बुद्धि पूर्वक गुरु उसे ही बनाना जिसके प्रति आपकी अटूट श्रद्धा हो। एक बार गुरु बनाने के बाद तब तक नहीं बदलना चाहिए जब तक गुरु की समाधि ना हो जाए। साथ ही कहा कि गुरु से कुछ छुपाना नहीं चाहिए, गुरु के प्रति जितनी गहरी श्रद्धा श्रद्धा होगी, जीवन में सफलता भी उतनी अधिक होगी। शिष्य का कर्तव्य है कि वह गुरु की आज्ञा माने। शिष्य, गुरु से प्राप्त ज्ञान को,चरित्र को जितना प्रकट करेंगे, गुरु शिष्य से उतने ही प्रसन्न होंगे।

मीडिया प्रभारी राजेश जैन दद्दू ने बताया कि सभा के प्रारंभ में आजाद जैन, अरुण सेठी, आशा रानी पांड्या (अमेरिका) एवं उर्मिला गांधी ने आचार्य द्वय के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन किया। पंडित रतनलालजी शास्त्री के निर्देशन में भजन गायक मयूर जैन ने आचार्य श्री विद्यासागर जी एवं विशुद्ध सागर जी महाराज की संगीतमय पूजन संपन्न कराई। इस अवसर पर आचार्य विशुद्ध सागर जी एवं मुनि श्री आदित्य सागर जी, मुनि श्री अप्रमित सागर जी द्वारा रचित कृतियों का एवं ताड़ पत्र पर प्रकाशित भक्तांबर स्तोत्र का विमोचन रितेश जैन, राजेश पांड्या परिवार,रामलाल जी,अशोक खासगीवाला, डॉक्टर जैनेंद्र जैन और कमलेश जैन ने किया। धर्म सभा का संचालन हंसमुख गांधी ने किया।

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