आचार्य श्री सुन्दर सागर महाराज और अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर ने खोड़निया को दिया आशीर्वाद

बांसवाड़ा। अठारह हजार हुमड़ समाज के अध्यक्ष दिनेश खोड़निया को जन्मदिन के अवसर पर शनिवार को आचार्य सुन्दर सागर महाराज और अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज की ओर से आशीर्वाद पत्र, धर्म का प्रतीक चिह्न समवसरण, आशीर्वाद लिखित डायरी भेंट की गई। ये सभी वस्तुएं लेकर संघ के भैया ब्र.विक्की भैया, उमंग भैया एवं अन्य गुरुभक्त सागवाड़ा स्थित उनके निवास स्थान पर पहुंचे।
आचार्य सुन्दर सागर महाराज और अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने पत्र में आशीर्वाद लिखा कि आपको माता-पिता से धर्म के अच्छे संस्कार मिले हैं। मनुष्य जीवन अनमोल है, उसमें भी आपको जिन धर्म मिला है। आप जिस प्रकार से धर्म की सेवा कर रहे हैं, उस सेवा का अवसर बड़े पुण्य से ही मिलता है। आप अपने गुणों से अपनी पहचान बनाओ ,जो शाश्वत है। आप ने जिस प्रकार से सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में ऊंचाइयां प्राप्त की हैं, उसी प्रकार आप धर्म के क्षेत्र में भी प्रतिदिन नई ऊंचाइयों को प्राप्त करें। आप धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पुरुषार्थ को करते हुए मोक्ष को प्राप्त करें।
खोड़निया ने आचार्य श्री और मुनि श्री के लिए कहा है कि आज उनका जन्मदिन सफल हो गया है। आज उन्हें आचार्य संघ और मुनि श्री से आशीर्वाद मिल गया है, इससे बढ़कर और क्या उपहार हो सकता है। संतों के आशीर्वाद से उन्हें जीवन में सफलता मिली है। आगे भी उनके आशीर्वाद से वह धर्म के लिए सदैव तत्पर रहेंगे।

संक्रमण की रोकथाम के लिए महामारी सतर्क-सावधान जन-अनुशासन दिशा-निर्देश

जयपुर, 5 जनवरी। मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत की अध्यक्षता में बुधवार को मुख्यमंत्री निवास से वीसी के माध्यम से हुई राज्य मंत्रिपरिषद् की बैठक में आए सुझावों एवं विचार-विमर्श के अनुरूप गृह विभाग ने कोविड संक्रमण की रोकथाम एवं बचाव के लिए महामारी सतर्क-सावधान जन-अनुशासन दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

इसके महत्वपूर्ण बिन्दु इस प्रकार हैं:-
शैक्षणिक गतिविधियों के सम्बन्ध में
1.जिन विद्यालय/महाविद्यालय/विश्वविद्यालय/कोचिंग संस्थान द्वारा छात्रावास का संचालन किया जा रहा है, संस्था प्रधान/संचालक द्वारा कोविड उपयुक्त व्यवहार (डबल डोज वैक्सीनेशन, मास्क का अनिवार्य उपयोग, दो गज की दूरी, सेनेटाइजेशन, बंद स्थानों पर उचित वेन्टीलेशन इत्यादि) की अनुपालना सुनिश्चित की जायेगी।
2.जयपुर एवं जोधपुर में बढ़ते कोविड संक्रमण के मद्देनजर जयपुर नगर निगम क्षेत्र (ग्रेटर/हैरिटेज) एवं जोधपुर नगर निगम (उत्तर/दक्षिण) के समस्त सरकारी/निजी विद्यालयों में कक्षा 8 तक की नियमित शिक्षण/कोचिंग गतिविधियों का संचालन आगामी दिनांक 17 जनवरी, 2022 तक बंद रहेगा, परन्तु ऑनलाइन अध्ययन जारी रखा जायेगा।
राज्य के अन्य जिलों के सम्बन्धित जिला कलक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट शैक्षणिक गतिविधियों के संचालन के सम्बन्ध मंज अतिरिक्त मुख्य सचिव, शिक्षा विभाग, राजस्थान सरकार से चर्चा उपरांत निर्णय ले सकेंगे।
कार्यालयों के सम्बन्ध में
3.नगर निगम एवं नगर पालिका क्षेत्रों के सभी राजकीय कार्यालयों, जहां कर्मचारियों की बैठक व्यवस्था में सोशल डिस्टेंसिंग संभव नहीं हो, उन कार्यालयों में 50 प्रतिशत कार्यालय उपस्थिति तथा 50 प्रतिशत घर से कार्य के सम्बन्ध में सचिवालय स्तर पर प्रशासनिक सचिव, विभाग स्तर पर विभागाध्यक्ष एवं जिला स्तर पर जिला कलक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट निर्णय ले सकेंगे।
यह आदेश निम्न आवश्यक सेवाओं से सम्बन्धित कार्यालयों पर लागू नहीं होगा:-
जिला प्रशासन, गृह, वित्त, पुलिस, विधि विज्ञान प्रयोगशाला, जेल, होमगार्ड, कन्ट्रोल रूम एवं वॉर रूम, वन एवं वन्य जीव विभाग, आयुर्वेद विभाग, पशुपालन विभाग, सूचना एवं प्रौद्योगिकी विभाग, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, नागरिक सुरक्षा, अग्निशमन एवं आपातकालीन सेवाएं, सार्वजनिक परिवहन, आपदा प्रबंधन, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति, नगर निगम, नगर विकास प्रन्यास, जिला परिषद, विद्युत, पेयजल, स्वच्छता, टेलीफोन, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा चिकित्सा विभाग।
4.समस्त सरकारी एवं निजी कार्यालयों में कोविड उपयुक्त व्यवहार (डबल डोज वैक्सीनेशन, मास्क का अनिवार्य उपयोग, दो गज की दूरी, सेेनेटाइजेशन इत्यादि) की अनुपालना सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी सम्बन्धित कार्यालय अध्यक्ष की होगी।
5.कार्यालय अध्यक्ष द्वारा विशेष योग्यजन/गर्भवती महिला/55 वर्ष या उससे अधिक आयु/पुराने रोगों एवं सहरूग्णता परिस्थितियों से पीड़ित कर्मचारी/अधिकारी को कार्यालय में उपस्थित होने से छूट दी सकेगी, लेकिन उन्हें घर से काम (Work From
Home)  करना आवश्यक रहेगा।
6.वे कर्मचारी/अधिकारी जो कार्यालय में नहीं आ रहे हैं एवं घर से काम कर रहे हैं, वे हर समय टेलीफोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों पर उपलब्ध रहेंगे।
7.कार्यस्थल पर किसी भी कार्मिक के कोविड पॉजिटिव या फिर संभावित संक्रमण की स्थिति बनने पर कार्यालय अध्यक्ष द्वारा कार्यालय कक्ष को 72 घंटे के लिए बंद किया जा सकेगा एवं सम्बन्धित कार्यालय कक्ष के अन्य कर्मचारियों को घर से कार्य करने की अनुमति प्रदान की जायेगी।
अन्य दिशा-निर्देश
8.कोविड की वर्तमान परिस्थितियों के मद्देनजर प्रशासन गांव के संग एवं प्रशासन शहरों के संग अभियान के अन्तर्गत प्रस्तावित शिविर आगामी आदेशों तक स्थगित रहेंगे।
9.संपूर्ण प्रदेश में प्रतिदिन रात्रि 11ः00 बजे से प्रातः 05ः00 बजे तक जन अनुषासन कर्फ्यू रहेगा।
यह दिशा-निर्देश 7 जनवरी 2022 से लागू होंगे। उक्त दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किये जाने पर समस्त जिला कलक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट अपने स्थानीय क्षेत्राधिकार में आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 51 से 60 एवं राजस्थान महामारी अधिनियम, 2020 के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित करेंगे।

 

बहुआयामी बेमिसाल व्यक्तित्व के धनी थे प्रतिष्ठा पितामह पं. गुलाब चन्द्र जी ‘पुष्प’

पुष्प जी की षष्टम पुण्य स्मृति दिवस 05 जनवरी 2022 पर विशेष :

डॉ सुनील संचय, ललितपुर

साधु , धर्मगुरु , पण्डित , विद्वान् और प्रतिष्ठाचार्य वे विभूतियाँ है जो स्वयं का कल्याण तो करते ही हैं , जन – जन को धर्म की राह दिखाते हैं । परमपूज्य सन्तों , राष्ट्रनेताओं , सामाजिक कर्णधारों और विविध क्षेत्रों में अपने प्रशस्त कृतित्व से सम्पूर्ण वसुन्धरा एवं चिन्तना को महिमा मण्डित करने वालों का प्रतिवन्दन सदैव स्वागतेय होता है । इसी दैदीप्यमान मणिमाला में ‘ सादाजीवन उच्च विचार के सशक्त हस्ताक्षर कालजयी प्रतिष्ठाचार्य माननीय पं . गुलाबचन्द्र जी जैन ‘ पुष्प ‘ एक ऐसा नाम रहा है जो सम्पूर्ण जैन जगत् में अत्यधिक विश्रुत और श्रद्धास्पद है । सम्यक् रत्नत्रय के प्रशस्त आराधक पण्डित ‘ पुष्प ‘ जी को अपने आचार्यत्व में शताधिक पञ्चकल्याणक प्रतिष्ठाएँ और अर्द्धशतक गजरथ महोत्सव शास्त्रोक्त विधि – विधान पूर्वक सुसम्पन्न कराने का गौरव प्राप्त है । प्रतिष्ठा कार्यों में आगम – सम्मत क्रियाओं को प्रभावना- पूर्वक निष्पन्न कराने वाले पं . पुष्प जी वाणीभूषण रहे हैं । उनकी प्रभविष्णु प्रतिष्ठा शैली और सहज वैदुष्य से अभिभूत समाज ने विविध अवसरों पर उन्हें संहितासूरि वाणीभूषण धर्मरत्न , साहित्यरत्न , विद्वद्रत्न , प्रतिष्ठारत्न , प्रतिष्ठातिलक , प्रतिष्ठादिवाकर प्रभृति अलंकरणों से महिमा मण्डित किया है । मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जनपद के ककरवाहा ग्राम की भूमि को अपने जन्म से प्रख्यात करने वाले उद्भट मनीषी आदरणीय पं . गुलाबचन्द्र जी जैन ‘ पुष्प ‘ आगमोक्त देव शास्त्र – गुरु के अनन्य उपासक , हित मित मधुरभाषी सहृदय विद्वान् थे। पं . जी के व्यक्तित्व में आगमोक्त विधि – विधान की प्रभविष्णुता , प्रभावी वक्तृता , कुशल रचनाधर्मिता और संयमी जीवन यापन का अभूतपूर्व संगम था । यही कारण है कि वे परमपूज्य साधु – सन्तों के भी अधिक निकट रहे । पं . ‘ पुष्प जी आडम्बरविहीन विशुद्धमार्गी प्रतिष्ठाचार्य के साथ – साथ सिद्धान्तमर्मज्ञ , कुशल समाजसेवक , विद्या अभिवर्धक , निष्णात वैद्य , निर्णायक पञ्च , संगीतज्ञ , ज्योतिर्विद और आशुकवि थे। आदरणीय ‘ पुष्प ‘ जी एक ऐसे उद्भट मनीषी थे जो अपनी कलाओं , विद्याओं तथा विशेषज्ञताओं को उदारतापूर्वक सर्वसामान्य को प्रदान करते थे । वे अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों के प्रणेता भी हैं । ” पुष्प ” जी आर्ष परम्परा के उन मनीषियों में अग्रगण्य रहे हैं जिन्होंने अपना समग्र जीवन भगवती जिनवाणी माता की आराधना एवं उसके प्रचार – प्रसार में समर्पित कर दिया था । ‘ पुष्प ‘ जी स्वयं तो प्रतिष्ठाचार्य थे ही , उन्हें एक यशस्वी प्रतिष्ठाचार्य का सुपुत्र होने का सौभाग्य और एक उदीयमान प्रतिष्ठाचार्य का पिता होने का भी गौरव प्राप्त है । ‘ पुष्प ‘ जी के पिता पं . मन्नूलाल जी अपने समय के लब्धप्रतिष्ठ प्रतिष्ठाचार्य थे । ‘ पुष्प ‘ जी ने उन्हीं से प्रतिष्ठाचार्य बनने न केवल प्रेरणा प्राप्त की प्रत्युत प्रशिक्षण भी प्राप्त किया । ‘ पुष्प ‘ जी के भरे – पूरे परिवार में उनके चतुर्थ पुत्र ब्र . जय ‘ निशान्त ‘ जी महामंत्री अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन शास्त्रि परिषद ,परमपूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी मुनि महाराज के उपदेश आदेशानुसार अपने पिता से इस प्रतिष्ठाशास्त्र की विद्या की धरोहर को सम्भालने में दत्तावधान हैं । ” पुष्प ‘ जी समाज , धर्म , साहित्य , शिक्षा , संस्कृति , कला , इतिहास एवं पुरातत्त्व के आराधक , सम्बर्द्धक , संरक्षक मनीषी थे। उनकी क्रियाशीलता , बहुज्ञता – विशेषज्ञता और सहजता का अनेकविध लाभ सिद्धक्षेत्र अहार , द्रोणगिरि , नैनागिरि , अतिशय क्षेत्र पपौरा , गिरारगिरि और नवागढ़ आदि को प्राप्त हुआ है ।
श्री पं . मन्नूलाल जी की स्मृति में अपनी जन्मभूमि ककरवाहा में हाईस्कूल की संस्थापना , घुवारा में श्री गणेशप्रसाद वर्णी स्नातक महाविद्यालय की स्थापना हेतु प्रेरणाप्रद उदार दान एवं सागर के भाग्योदय तीर्थ को अपने उल्लेखनीय आर्थिक सहयोग से करना पं . ‘ पुष्प ‘ जी की निजी विशेषता है ।भारतीय मनीषा के मूर्तरूप पं . गुलाब चन्द्र जी ‘ पुष्प ‘ बुन्देलखण्ड के एक ऐसे सपूत थे जिनकी निष्ठा , अध्यवसाय , सार्वजनीन सोच संयमी – अनुशासित जीवनचर्या और रचनाधर्मिता ने उन्हें आवाल – वृद्ध सभी का श्रद्धास्पद बना दिया । साधनहीन छोटे से गाँव ककरवाहा में जन्में ” पुष्प ” जी ने अपने जीवन की तरुणाई के पहले चरण में बहुत से उतार – चढाव देखे , झंझावातों का मुकाबला किया , किन्तु अश्रान्त पथिक की भाँति वे सीढी दर सीढी ऊपर बढ़ते गये और परिणाम यह हुआ कि तरुणाई पार करते ही वे अच्छे प्रतिष्ठाचार्य के रूप में जग जाहिर हुए । पूर्व से पश्चिम तक और उत्तर से दक्षिण तक उनकी निर्विवाद छवि तथा विशुद्ध आगमानुसारी प्रतिष्ठा पद्धति की गूँज सर्वत्र गूँजने लगी । उन्होंने विधि – विधान और प्रतिष्ठाशास्त्र को अपनी विशेषज्ञता का क्षेत्र बनाया । उनकी क्रियाशीलता के उदाहरण बहुत से पञ्चकल्याणक महोत्सवों , मन्दिर – वेदी – प्रतिष्ठाओं और गजरथ महोत्सवों की निर्विघ्न सम्पन्नता में दिखाई पड़ते हैं और सृजनशीलता उनके द्वारा प्रणीत “ प्रतिष्ठारत्नाकर ‘ आदि ग्रन्थों में निदर्शित होती है । पुष्प ‘ जी द्वारा प्रणीत “ प्रतिष्ठा रत्नाकर ” अपने विषय का परिपूर्ण मानक दर्पण है । लगभग 750 पृष्ठों के इस महाग्रन्थ में प्रतिष्ठा सम्बन्धी सभी विधि – विधानों का जो सांगोपांग , शास्त्रसम्मत विश्लेषण पं . जी ने किया है वह अद्वितीय है । इस महाग्रन्थ से दुरूह प्रतिष्ठाप्रविधियाँ प्रतिष्ठा कार्य सम्पन्न कराने के अभिलाषी विद्वानों के अतिरिक्त सामान्य जनों को भी हस्तामलकवत् सहज सुबोध हो उठी । इसके अतिरिक्त पं . जी की अन्य प्रमुख कृतियाँ हैं : प्रतिष्ठा – दर्पण , अर्चना गीत , याग – मण्डल विधान , व्रतोद्यापन संग्रह आदि।
पुष्प जी के व्यक्तित्व की चमक बढ़ाने और उनकी कीर्ति प्रसारित करने में उनकी अपनी साधना तो कारण रही ही है , परन्तु एक और बड़ा सशक्त कारण यह है कि वे निष्ठावान प्रतिष्ठाचार्यों की अपनी ही तीन पीढ़ियों की माला के मध्य में एक आभावान मणि की तरह सुशोभित थे। उनके पूज्य पिता पण्डित मन्नूलाल जी अपने समय के माने हुए प्रतिष्ठाचार्य थे और अपनी विनम्रता तथा निःस्पृहता के लिये विशेष रूप से जाने जाते थे । पुष्प जी स्वयं अपनी अनेक विशेषताओं के साथ जाने जाते थेऔर उनके होनहार सुपुत्र आदरणीय ब्र. जय कुमार जी ‘ निशान्त ‘ भैया भी आजन्म ब्रह्मचर्य का संकल्प लिये , अपने पिता के समान अनुशासन में प्रतिष्ठा कार्यों के साथ प्रतिबद्ध , एक निष्णात प्रतिष्ठाचार्य के रूप में , सारे देश में ख्याति प्राप्त कर चुके हैं । प्रतिष्ठा के क्षेत्र में ऐसा तीन पीढ़ियों का अक्षुण्ण योगदान किसी भी प्रतिष्ठाचार्य के लिये बड़ा दुर्लभ संयोग है । आदरणीय पुष्पजी सचमुच भाग्यशाली थे कि यह उत्तम संयोग उनके अवदान का प्रभा – मण्डल बन कर इतिहास में उनकी कीर्ति को प्रसारित कर रहा है।
आदरणीय पुष्पजी उल्लेखनीय सेवाओं के लिए सराकोद्धरक आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के सान्निध्य में अतिशय क्षेत्र बड़ागांव खेकड़ा जिला बागपत में ‘पुष्पांजलि’ अभिनंदन ग्रंथ समर्पण करके प्रतिष्ठा पितामह की उपाधि से अलंकृत किया गया था ।

सुप्रसिद्ध गीतकार रवींद्र जैन मुंबई ने लिखा था –
रत्नाकर के रत्न प्रतिष्ठा के वे अमित तिलक हैं।
पुष्पांजलि के द्वारा इनके वन्दन-अभिनंदन हैं।।

पुष्प जी के समग्र समर्पण से ही आज ललितपुर जनपद में स्थित प्रागैतिहासिक दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र नवागढ़ जन-जन की आस्था का केंद्र बन रहा है। उनके बाद आदरणीय ब्र. जयकुमार जी निशांत भैया विरासत सहेज रहे हैं। नवागढ़ क्षेत्र को शून्य से शिखर तक विकास के आयाम स्थापित करने में आपका योगदान जैन संस्कृति की इतिहास में सदैव अमर रहेगा। पिछले वर्ष से यहाँ गुरुकुल का संचालन भी शुरू हो गया है जो एक नया आयाम स्थापित कर रहा है। आदरणीय जयनिशांत भैया जी ने पुष्प जी के सपने को साकार करने का संकल्प किया है। आप निरंतर नवागढ़ क्षेत्र के पुरातत्व के अन्वेषण एवं विकास के लिए दृढ़ता एवं समर्पण के साथ संलग्न है। इसी का सुफल है कि आज नवागढ़ क्षेत्र प्राचीनतम पुरातात्विक धरोहर के लिए विश्व विख्यात हो रहा है ।
परम आदरणीय गुलाब चंद्र पुष्प का जीवन आदर्श रहा है , आपने अधिकांश समय स्वाध्याय एवं अनुष्ठान में व्यतीत किया था। उन्होंने ने आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से दो प्रतिमा के व्रत कोनी अतिशय क्षेत्र में ग्रहण करके व्रती जीवन का शुभारंभ किया था। धर्म आचरण करते हुए अपने परिवार से उदासीन होकर इंदौर पंचबालयती आश्रम को साधना स्थल बनाया। उनका अंतिम संस्कार नवागढ़ तीर्थक्षेत्र पर हुआ था।
मेरा सौभाग्य रहा कि परम श्रद्धेय गुलाब चन्द्र जी पुष्प का मार्गदर्शन मुझे प्राप्त हुआ।
उनकी षष्ठम पुण्य तिथि पर उन्हें शत शत नमन, श्रद्धांजलि।

 

अजमेर की जैन बेटी ने बढ़ाया मान, अमेरिका की रिसर्च टीम के साथ मिलकर बनाई ब्रेस्ट कैंसर वैक्सीन

छवि जैन के माता-पिता भी हैं डॉक्टर

अजमेर । भारत की जैन बेटी ने देश ही नहीं, विदेशों में भी नाम रोशन किया है। मूल रूप से अजमेर की रहने वालीं डॉक्टर छवि जैन ने अमेरिका की रिसर्च टीम के साथ मिलकर महिलाओं में होने वाले ब्रेस्ट कैंसर की वैक्सीन तैयार की है। इस वैक्सीन का अमेरिका में जानवरों पर ट्रायल सफल रहा है। अब ये वैक्सीन महिलाओं पर क्लीनिकल ट्रायल के रूप में शुरू की जाएगी। क्लिनिकल ट्रायल के पहले चरण में ट्रिपल नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर से प्रभावित 18-24 साल की महिलाओं में दो हफ्ते के अंतर से तीन डोज दी जाएंगी बताया जा रहा है कि यह वैक्सीन अल्फा लेक्टलब्यूमिन नामक ब्रेस्ट कैंसर प्रोटीन पर प्रहार करती है। ट्रिपल नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर में अल्फा लेक्टलब्यूमिन नामक ब्रेस्ट कैंसर प्रोटीन बनता है और ये वैक्सीन इसी प्रोटीन खत्म करने का काम करेगी. छवि अमेरिकन कैंसर सोसायटी की फीमेल रिसर्च एंबेसडर भी हैं। वर्तमान में डॉक्टर छवि अमेरिका के लर्निंग इंस्टीट्यूट क्लीवलैंड क्लीनिक में साइंटिस्ट हैं।

माता-पिता हैं डॉक्टर
डॉ. छवि जैन के माता पिता भी डॉक्टर हैं। अजमेर के जवाहर लाल नेहरू अस्पताल में पिता शिशु रोग विशेषज्ञ हैं और मां डॉक्टर नीना जैन भी इसी अस्पताल में एनेस्थीसिया विभाग में सीनियर प्रोफेसर हैं। अजमेर की सोफिया और मयूर स्कूल से अपनी आरंभिक शिक्षा प्राप्त करने वाली छवि ने पुणे के इंस्टीट्यूट ऑफ बायो इन्फोर्मेटिक्स एंड बायो टेक्नोलॉजी से एमटेक किया। इसके बाद पीएचडी के लिए वह स्विट्रजरलैंड की स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी गईं। छवि ने लर्नर रीसर्च इंस्टीट्यूट में 2018 से जून 2021 तक काम किया। यहीं से वह डॉ. थामस बड और डॉ. विनसेंट टूही की रिसर्च पर आधारित कैंसर वैक्सीन की ट्रायल टीम में शामिल हुईं।

इंजीनियर बनना चाहती थीं
छवि हमेशा से अपने कजिन की तरह इंजीनियर बनना चाहती थीं लेकिन फिर एक दिन उनकी ये सोच बदल गई। मयूर स्कूल में पढ़ते हुए उन्होंने 11वीं में मैथ्स सब्जेक्ट लिया था, लेकिन एक दिन के लिए बायो की क्लास अटेंड की। इसी एक क्लास ने उनके भविष्य को बदल कर रख दिया। इसके बाद उन्होंने बायलोजी में आगे बढ़ने का मन बना लिया।

मिले हैं कई अवॉर्ड
छवि को क्लीवलैंड क्लिनिक के शीर्ष नेतृत्व की ओर से एप्रीसिएशन एंड एक्सिलेन्स अवार्ड और एम्पलॉई ऑफ द क्वार्टर अवॉर्ड मिला है। केसवेस्टर्न रिजर्व यूनिवर्सिटी से फेलोशिप भी हासिल हुई। छवि को फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन से मनुष्यों पर पहले अध्ययन की मंजूरी हासिल कराने में सफलता मिली है।

बीते वर्ष की गलतियों को न दोहराने का करें संकल्प – आचार्य श्री सुंदर सागर महाराज

 

श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में नववर्ष की पूर्व संध्या पर हुए कार्यक्रम

बांसवाड़ा। आचार्य श्री सुंदर सागर महाराज के सान्निध्य में श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, मोहन कॉलोनी में नववर्ष की पूर्व संध्या पर सहस्त्रनाम की आराधना, णमोकार मन्त्र के जाप, आरती एवं भजन संध्या आदि कार्यक्रम आयोजित किए गए।

इस अवसर पर भगवान आदिनाथ की प्रतिमा के समक्ष आचार्य श्री सुंदर सागर महाराज के सान्निध्य में सहस्त्रनाम के मंत्रों के साथ दस जैन श्रावक परिवार ने 1008 दीपक, 1008 काजू,1008 बादाम,1008 सुपारी,1008 लौंग, 1008 इलायची,1008 अखरोट,1008 फूल आदि के साथ आराधना कर निर्जरा की भावना की गई। इसी के साथ 108 दीपकों से आचार्य श्री एवं भगवान की आरती भी की गई। कार्यक्रम के दौरान श्रावकों ने भजनों पर नृत्य किया और एक स्वर में जय जयकार करते रहे । इस अवसर पर बीते चार महीने में हुए कार्यक्रमों की झलकियां 40 मिनिट के वीडियो के माध्यम से दिखाई गईं। रात को 12 बजते ही आचार्य संघ और श्रावकों ने भगवान के दर्शन कर नमोस्तु किया। आचार्य श्री ने नववर्ष की डारियों में केसर से स्वास्तिक बनाकर उपस्थित श्रावकों को आशीर्वाद स्वरूप डारियां भेंट की।


आचार्य श्री सुंदर सागर महाराज में शनिवार को प्रातः काल की धर्म सभा में कहा कि सभी यह भावना करना कि मरण सम्यक्त्व के साथ हो। किसी से राग-द्वेष नहीं रखना। किसी की गलती को नहीं, उसकी अच्छाई को देखना। सभी से क्षमा मांग लेना। किसी के साथ बैर भाव नहीं रखना बल्कि मैत्री, प्रमोद और करुणा के भाव रखना। उन्होंने कहा कि वर्ष 2021 के जो गलतियां की हैं, वह अब नही करूंगा, यह संकल्प भी सभी को करना है। इस अवसर पर समाज के अध्यक्ष पवन नाचनावत, लोकेन्द्र जैन आदी उपस्थित थे। इसके बाद दोपहर में संघस्थ भैया, दीदी एवं अन्य भक्तों ने आचार्य श्री का पाद प्रक्षालन जल, दूध, दही और केसर किया।

 

 

आचार्य श्री विमल सागर महाराज का समाधि दिवस मनाया

 

बांसवाड़ा। शहर की मोहन कॉलोनी दिगम्बर जैन मंदिर में आचार्य श्री सुन्दर सागर महाराज के सानिध्य में आचार्य श्री विमल सागर महाराज का 27 वां समाधि दिवस मनाया गया। समाज के श्रावक- श्राविका एवं संघ के भैया -दीदी द्वारा आचार्य विमल सागर महाराज की प्रतिमा का पंचामृत अभिषेक और आरती की गई। आचार्य श्री सुन्दर सागर महाराज, मुनि श्री पूज्य सागर महाराज, मुनि श्री शुद्ध सागर महाराज, आर्यिका सदय मति माता जी, आर्यिका सुकाव्य मति माता जी, आर्यिका सूक्ष्ल मति माता जी, आर्यिका सुरम्य मति माता जी सहित त्यागी समूह ने स्मरण सुनाकर आचार्य श्री विमल सागर महाराज को शब्द सुमन अर्पण कर श्रद्धान्जलि अर्पित की। इस अवसर पर रात में आचार्य विमल सागर पर बने भजनों की संघ्या की गई।

आचार्य श्री सुन्दर सागर महाराज ने कहा कि आचार्य विमल सागर महाराज ऐसे साधु थे जिन्हों कभी परंपरा का भेद नही किया। आचार्य श्री विमल सागर महाराज किसी को खाने के लिए अपने हाथों से फल दे देते थे तो उसके बिगड़े काम बन जाते थे। आज पूरी दुनिया मे उनके भक्त है आज भी वह अपने काम का निर्णय आचार्य श्री की फ़ोटो के समक्ष खेड़े होकर करते है। आचार्य विमल सागर महाराज के लिए सब एक सामना थे चाहे गरीब हो, अमीर हो, विशेष या सामान्य सब पर उनका वात्सल्य बरसता था। आचार्य को तीर्थो के संरक्षण के प्रति अधिक उत्साह था उन्हें अपने जीवन के 42 चातुर्मास में से 7 सम्मेदशिखर जी, 5 सोनागिरि, 1 राजगृही, बड़वानी में एक, श्रवणबेलगोला में एक ,गिरनार में एक में किए। आप ने अपने पूरे जीवन मे 5 हजार से अधिक उपवास किए थे। आप के दो मुख्य शिष्य थे आचार्य श्री सन्मति सागर, आचार्य भरत सागर महाराज। आचार्य विमल सागर महाराज अहिंसा का प्रचार -प्रसार बहुत किया।

आचार्य श्री निमित्तज्ञानी थे उन्हें यह ज्ञान आचार्य सुधर्म सागर महाराज से प्राप्त हुआ था। आचार्य श्री महावीरकीर्ती महाराज में आचार्य श्री विमल सागर महाराज को मुनि दीक्षा सोनागिर में थी उनकी दीक्षा में मुनि वीर सागर महाराज भी थे। मुनि वीर सागर महाराज दीक्षा के मंत्र बोल रहे थे और आचार्य श्री महावीरकीर्ती स्वामी दीक्षा के संस्कार कर रहे थे इसलिए ही मुनि दीक्षा के समय नाम विमल रखा था। विमल के वि का अर्थ वीर और म का अर्थ महावीर और ल का अर्थ लाल

आचार्य विमल सागर महाराज के जन्म का नाम नेमिचन्द्र था। उनका जन्म एटा के कोसमा में हुआ था। उनकी माता का नाम कटोरी बाई और पिता का नाम बिहारीलाल था। जेनेरु संस्कार आचार्य शांति सागर महाराज से, सात प्रतिमा आचार्य वीर सागर से ली, क्षुल्लक दीक्षा बड़वानी में 1950 में आचार्य महावीरकीर्ती से ली और नाम क्षुल्लक वृषभ सागर, ऐलक दीक्षा धरपुरी नाम सुधर्म सागर 1951, मुनि दीक्षा 1953 सोनागिरि में आचार्य महावीरकीर्ती से नाम विमल सागर ,आचार्य पद 1960 में हुआ था। आचार्य विमल सागर महाराज ने अपने हस्त कमलो से 42 मुनि दीक्षा, 28 आर्यिका, 24 क्षुल्लक,18 क्षुल्लिका और एक ऐलक दीक्षा प्रदान की था ।

कन्टेन -ब्रह्मचारी कनक जैन

काशी में जन्में तीर्थंकर चंद्रप्रभु व पार्श्वनाथ भगवान की शिक्षाओं की प्रासंगिकता

तीर्थंकर चंद्रप्रभ व पार्श्वनाथ की जयंती 30 दिसम्बर 2021 पर विशेष

-डाॅ. सुनील जैन ‘संचय’

सर्वधर्म सदभाव की नगरी है काशी। विभिन्न धर्मों के धार्मिक सरोकार से जुड़ी इस पावन नगरी की इन दिनों चर्चा चहुँओर है। देश के प्रधानमंत्री ने काशी विश्वनाथ कॉरिडॉर सहित अनेक सौगातें काशी को हाल ही में दी हैं। बनारस को लोग मंदिरों का शहर, भारत की धार्मिक राजधानी, भगवान शिव की नगरी, दीपों का शहर आदि विशेषण भी देते हैं. प्रसिद्ध अमरीकी लेखक मार्क ट्वेन लिखते हैं कि “बनारस इतिहास से भी पुरातन है, परंपराओं से पुराना है, किंवदंतियों से भी प्राचीन है और जब इन सबको एकत्र कर दें, तो उस संग्रह से भी दोगुना प्राचीन है.”
मैंने अपने जीवन निर्माण के पांच वर्ष वाराणसी में व्यतीत किए हैं,इसलिए काशी की संस्कृति से मेरा निकटता से परिचय है। गंगा का पावन जल और शांत आनंदमयी घाटों का अनुभव कितना मनमोहक होता है शायद आप लोग जानते होगे, बनारस के कुछ अलग ही रहस्य हैं जो हर शहर से भिन्न है।

बनारस का हर शाम इतना सुहाना लगे।
इसे भुलाने में कई सदियाँ कई जमाना लगे।।

काशी यानि वाराणसी एक धार्मिक -सांस्कृतिक नगरी एवं पवित्र नगरी मानी जाती है क्योंकि इस नगरी में सभी सम्प्रदायों की आस्था जुड़ी है जिसमें जैन धर्मावलंबियों की आस्था भी जुड़ी है क्योंकि पवित्र गंगा नदी के बीच वसी नगरी काशी में चार तीर्थंकरों का जन्म हुआ, जन्म की ही नहीं चार- चार कल्याणक भी हुए हैं। सप्तम तीर्थंकर श्री सुपार्श्वनाथ, अष्टम तीर्थंकर श्री चन्द्रप्रभ, ग्यारहवें तीर्थंकर श्रेयांशनाथ और तेईसवें तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ ने जन्म लेकर वाराणसी नगरी को पवित्र बनाया है। मेरा सौभाग्य रहा कि पवित्र गंगा किनारे सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ भगवान की जन्मभूमि से सुशोभित जैन घाट पर स्थित सुप्रसिद्ध स्याद्वाद महाविद्यालय में मुझे अध्ययन करने का अवसर मिला।

ऐतिहासिक अवलोकन से स्पष्ट होता है कि जैन धर्म का प्रभाव भी इस नगरी पर रहा है। ‘संयम’ और ‘सहनशीलता’ के प्रतिमूर्ति जैन धर्म के तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का जन्म काशी में पौष कृष्णा एकादशी को हुआ था । तत्कालीन काशी नरेश महाराजा विश्वसेन आपके पिता एवं महारानी वामादेवी आपकी माता थीं। शहर के भेलुपुर इलाके में तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की जन्मभूमि है। यही वो जगह है जहाँ जैन धर्म के 23 वें तीर्थांकर की जन्म , कर्म और तप भूमि है। जो आज जैन धर्मावलम्बियों के लिए बड़ा स्थल है। यहां आज जैन धर्म के 23 वें तीर्थंकर का भव्य मंदिर है।

पार्श्वनाथ के जन्म स्थल भेलूपुर मुहल्ले में विशाल, कलात्मक एवं मनोरम मन्दिर का निर्माण हुआ है। मन्दिर में काले पत्थरों से निर्मित चार फिट ऊंची पार्श्वनाथ की प्रतिमा विराजमान है। 6273 वर्ग फिट क्षेत्रफल में यह मन्दिर परिसर है। राजस्थानी कारीगरों द्वारा राजस्थानी पत्थरों से निर्मित राजस्थानी शैली का यह मन्दिर अदभुत एवं अद्वितीय है। मन्दिर के दिवारों पर शिल्पकारों द्वारा सुन्दर ढंग से कलात्मक चित्रों को दर्शाया गया है।
इस मंदिर में दर्शन के लिए हर रोज ढेरों श्रद्धालु आते हैं। पार्श्वनाथ ने अज्ञान, आडंबर, अंधकार और क्रिया क्रम के मध्य में क्रांति का बीज बनकर जन्म लिया था।
उन्होंने हमारे भीतर सुलभ बोधि जगाई, व्रत की संस्कृति विकसित की। बुराइयों का परिष्कार कर अच्छा इंसान बनने का संस्कार भरा। पुरुषार्थ से भाग्य बदलने का सूत्र दिया। भगवान पार्श्वनाथ क्षमा के प्रतीक और सामाजिक क्रांति के प्रणेता हैं। उन्होंने अहिंसा की व्याप्ति को व्यक्ति तक विस्तृत कर सामाजिक जीवन में प्रवेश दिया, जो अभूतपूर्व क्रांति थी। उनका कहना था कि हर व्यक्ति के प्रति सहज करुणा और कल्याण की भावना रखें। उनके सिद्धांत व्यावहारिक थे, इसलिए उनके व्यक्तित्व और उपदेशों का प्रभाव जनमानस पर पड़ा। आज भी बंगाल, बिहार, झाारखंड और उड़ीसा में फैले हुए लाखों सराकों, बंगाल के मेदिनीपुर जिले के सदगोवा ओर उडीसा के रंगिया जाति के लोग पार्श्वनाथ को अपना कुल देवता मानते हैं। पार्श्वनाथ के सिद्धांत और संस्कार इनके जीवन में गहरी जड़ें जमा चुके हैं। इसके अलावा सम्मेदशिखर के निकट रहने वाली भील जाति पार्श्वनाथ की अनन्य भक्त है।
भगवान पार्श्वनाथ की जीवन-घटनाओं में हमें राज्य और व्यक्ति, समाज और व्यक्ति तथा व्यक्ति और व्यक्ति के बीच के संबंधों के निर्धारण के रचनात्मक सूत्र भी मिलते हैं। इन सूत्रों की प्रासंगिकता आज भी यथापूर्व है। हिंसा और अहिंसा का द्वन्द भी हमें इन घटनाओं में अभिगुम्फित दिखाई देता है। ध्यान से देखने पर भगवान पार्श्वनाथ तथा भगवान महावीर का समवेत् रूप एक सार्वभौम धर्म के प्रवर्तन का सुदृढ़ सरंजाम है।

तीर्थंकर पार्श्वनाथ तथा उनके लोकव्यापी चिंतन ने लम्बे समय तक धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक क्षेत्र को प्रभावित किया। उनका धर्म व्यवहार की दृष्टि से सहज था, जिसमें जीवन शैली का प्रतिपादन था। राजकुमार अवस्था में कमठ द्वारा काशी के गंगाघाट पर पंचाग्नि तप तथा यज्ञाग्नि की लकड़ी में जलते नाग-नागिनी का णमोकार मंत्र द्वार उद्धार कार्य की प्रसिद्ध घटना यह सब उनके द्वारा धार्मिक क्षेत्रों में हिंसा और अज्ञान विरोध और अहिंसा तथा विवेक की स्थापना का प्रतीक है।
तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने मालव, अवंती, गौर्जर, महाराष्ट्, सौराष्ट्, अंग-नल, कलिंग, कर्नाटक, कोंकण, मेवाड़, द्रविड, कश्मीर, मगध, कच्छ, विदर्भ, पंचाल, पल्लव आदि आर्यखंड के देशों में विहार किया। मध्यप्रदेश के छतरपुर जिला में सुप्रसिद्ध जैन सिद्धक्षेत्र नैनागरी स्थित है जहाँ भगवान पार्श्वनाथ का समवशरण आया था। उनकी ध्यानयोग की साधना वास्तव में आत्मसाधना थी। भय, प्रलोभन, राग-द्वेष से परे। उनका कहना था कि सताने वाले के प्रति भी सहज करूणा और कल्याण की भावना रखें।
तीर्थंकर पार्श्वनाथ की भारतवर्ष में सर्वाधिक प्रतिमाएं और मंदिर हैं। उनके जन्म स्थान भेलूपुर वाराणसी में बहुत ही भव्य और विशाल दिगम्बर और श्वेताम्बर जैन मंदिर बना हुआ है। यह स्थान विदेशी पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केन्द्र है। पार्श्वनाथ की जयंती पर जहां वाराणसी सहित पूरे देश में जन्मोत्सव धूमधाम से श्रीजी की शोभायात्रा के साथ मनाया जाता है ।

चौबीस तीर्थंकरों में भगवान पार्श्वनाथ लोकजीवन में सर्वाधिक प्रतिष्ठित हैं। इस आर्यखंड-भारतदेश के प्रत्येक राज्य में भगवान पार्श्वनाथ विभिन्न विशेषणों के साथ पूजे जाते हैं। कहीें वे ‘‘अंतरिक्ष पार्श्वनाथ’’ के रूप में प्रतिष्ठित हैं तो कहीं देवालय ‘‘चिन्तामणि पार्श्वनाथ’’ की जय से गुंजित होता है, कहीं वे ‘‘तिखाल वाले बाबा’’ के रूप में विराजमान हैं।

तीर्थंकर पार्श्वनाथ की भक्ति में अनेक स्तोत्र का आचार्यों ने सृजन किया है, जैसे- श्रीपुर पाश्र्वनाथ स्तोत्र, कल्याण मंदिर स्तोत्र, इन्द्रनंदि कृत पार्श्वनाथ स्तोत्र, राजसेनकृत पाश्र्वनाथाष्टक, पद्मप्रभमलधारीदेव कृत पाश्र्वनाथ स्तोत्र, विद्यानंदिकृत पाश्र्वनाथ स्तोत्र आदि। स्तोत्र रचना आराध्यदेव के प्रति बहुमान प्रदर्शन एवं आराध्य के अतिशय का प्रतिफल है। अतः इन स्तोत्रों की बहुलता भगवान पार्श्वनाथ के अतिशय प्रभावकता का सूचक है। भारतीय संस्कृति की प्रमुख धारा श्रमण परम्परा में भगवान पार्श्वनाथ का ऐतिहासिक एवं गौरवशाली महत्व रहा है। भगवान पार्श्वनाथ हमारी अविच्छिन्न तीर्थंकर परम्परा के दिव्य आभावान योगी ऐतिहासिक पुरूष हैं। सर्वप्रथम डाॅ. हर्मन याकोबी ने ‘स्टडीज इन जैनिज्म’ के माध्यम से उन्हें ऐतिहासिक पुरूष माना।
वर्तमान वैज्ञानिक युग में भी उनके द्वारा प्रतिपादित जीने की कला और संदेश नितान्त प्रासंगिक है।
जीवन के अंत में श्रावण शुक्ला सप्तमी के दिन झारखंड स्थित सुप्रसिद्ध शाश्वत जैन तीर्थ श्री संवेदशिखर के स्वर्णभद्रकूट नामक पर्वत से निर्वाण प्राप्त किया। इन्हीं की स्मृति में इस तीर्थ क्षेत्र के समीपस्थ स्टेशन का नाम पारसनाथ प्रसिद्ध है। सम्पूर्ण देश के लाखों जैन धर्मानुयायी इस तीर्थ के दर्शन-पूजन हेतु निरंतर आते रहते हैं।
गंगा नदी के तट पर बना हुआ चंद्रप्रभ जिनालय स्थापत्य कला को सुशोभित कर रहा :

आठवें तीर्थंकर चंद्रप्रभ का जन्म भी पौष कृष्ण एकादशी को ही राजघराने में हुआ था। इनके माता पिता बनने का सौभाग्य चंद्रावती के महाराजा महासेन और लक्ष्मणा देवी को मिला। भगवान चन्द्रप्रभु के जन्म, तप एवं ज्ञान कल्याणक स्थली क्षेत्र सुरम्य गंगातट पर चन्द्रावती गढ़ के भग्नावशेषों के बीच स्थित है। क्षेत्र पर चैत्र कृष्णा 5 को वार्षिक मेला लगता है। गंगा किनारे चंद्रावती में आठवें तीर्थंकर चंद्राप्रभु स्वामी ने जन्म लिया था। वहां चंद्राप्रभु का भव्य मंदिर आस्था का केंद्र है लेकिन गंगा की कटान की वजह से यह तीर्थ बदहाल पड़ा है। वर्तमान मंदिर की वेदी में मूलनायक तीर्थंकर चंद्रप्रभ की श्वेत पाषाण की पद्मासन प्रतिमा है। मंदिर का शिखर बहुत ही सुंदर बना हुआ है। यहां से गंगा का मनोहारी दृश्य बहुत ही आकर्षक लगता है जो अवलोकनीय है। गंगा नदी के तट पर बना हुआ जिनालय स्थापत्य कला को सुशोभित कर रहा है । मंदिर का निर्माण प्रभुदास जैन ने किया था। इनके परिवारजन श्री अजय जैन, प्रशांत जैन आरा आदि आज भी इस क्षेत्र की देख-रेख में संलग्न हैं। चंद्रावती में आगामी फरवरी 2022 में आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी के सान्निध्य में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव भी प्रस्तावित है।
जैन तीर्थंकरों के दर्शन के लिए वर्ष भर देश के कोने-कोने से लाखों की तादाद में जैन धर्मावलंबी काशी आते हैं।
भगवान चंद्रप्रभ हमारे जीवन दर्शन के स्रोत हैं, प्रेरक आदर्श हैं। उन्होंने जैसा जीवन जीया, उसका हर अनुभव हमारे लिए साधना का प्रयोग बन गया।
भगवान चंद्रप्रभ को इतिहास का स्वरूप धारण कराने में आचार्य समन्तभद्र स्वामी का बड़ा हाथ है। जब उन्हें भस्मक व्याधि हो गयी थी उस समय काशी में उनके साथ जो घटनाक्रम हुआ वह ऐतिहासिक था। इस ऐतिहासिक घटना ने जनमानस पर गहरा प्रभाव छोड़ा और कलाकार चंद्रप्रभु की कलाकृतियां गढ़ने में तत्पर हो गए और श्रावक जन भगवान चंद्रप्रभु के चमत्कार के प्रति अधिक आस्थावान और विश्वस्त हो गए। चंद्रावती के अलावा देवगढ़ , खजुराहो, सोनागिर, तिजारा, ग्वालियर, श्रवणबेलगोला , बरनावा, मांगीतुंगी आदि में चंद्रप्रभु भगवान की प्राचीन व चमत्कारी प्रतिमाएं विराजमान हैं।
तीर्थंकर चंद्रप्रभु अपनी अद्वितीय धवल रूप गरिमा में वीतरागता का वैभव बिखेरने के साथ अपने अद्वितीय अतिशय और चमत्कारों के कारण भी लोकप्रिय संकट मोचन रहे हैं। तीर्थंकर चन्द्रप्रभु का आदर्श मानव को सावधान करता है, उसे जगाता है और कहता है कि हमारी तरफ देख, हमने राजा का वैभव को ठुकराया और आकिंचन व्रत अंगीकार किया और तू इस नाशवान माया की ममता में पागल हुए जा रहा है।
वाराणसी देश के प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी जी का संसदीय क्षेत्र है। पिछले दिनों उन्होंने काशी विश्वनाथ कॉरिडॉर देश को समर्पित कर ऐतिहासिक कार्य किया है। वाराणसी में ही राजघराने में जन्में तीर्थंकर चंद्रप्रभु एवं पार्श्वनाथ भगवान के जन्मकल्याणक दिवस पर माननीय प्रधानमंत्री से निवेदन है कि काशी के चार तीर्थंकरों की जन्मभूमि के विकास , संरक्षण और संवर्द्धन की ओर भी अपना ध्यान आकृष्ट करने का कष्ट करें। चंद्रप्रभु भगवान की जन्म भूमि पर गंगा घाट के तट पर चंद्रावती में जो मंदिर बना है उस पर तो तुरंत ध्यान देने की जरूरत है , समय जीर्णोद्धार बहुत जरूरी है। आशा है प्रधानमंत्री इस ओर जरूर ध्यान देंगे ताकि संस्कृति की यह महान धरोहर संरक्षित और सुरक्षित हो सके।

श्री चंद्रप्रभ विधेयं, स्मर्ता सद्य फलप्रदाः।
भवाब्धि व्याधि विध्वंस, दायिनी मेव राक्षदा।।

दृष्टि अपने आप भी मिल सकती है – आचार्य श्री विद्यासागार जी

कुण्डलपुर पहुंचे 200 से अधिक संत

दमोह। आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने रविवार को कुण्डलपुर में अपने प्रवचनों में कहा कि दृष्टि हमें बड़ों से भी मिलती है और छोटों से भी मिल सकती है, मित्रों से और शत्रुओं से भी मिल सकती है, यह हमारी धारणा है कि जितना पढ़ाया गया, उतना ही मान लेते हैं। आचार्यों का यह आग्रह नहीं कि उपदेश से ही दृष्टि मिलती है। यह अपने आप भी मिल सकती है, क्योंकि निमित्त दूसरे हो सकते हैं, परंतु उपादान अपना ही होता है।
आचार्यश्री ने कहा कि तत्व होने के कारण उसको किसी से बांधा नहीं जा सकता। कई बार आंखो से देखा, कानों से सुना, फिर भी मुंह से स्पष्टीकरण देने का साहस नहीं करें, क्योंकि इस स्पष्टीकरण में परोक्ष छुपा है, क्या संकल्प है, क्या वर्तमान में घटित हुआ है फिर भी हम वर्तमान को पकड़कर चलते रहते हैं। गुरुदेव ने कंडे की अग्नि का उदाहरण देते हुए बताया कि कंडे की अग्नि का तब तक पता नहीं चलता जब तक राख को अलग नहीं किया जाए, उसी प्रकार हमारी वासनाएं, कषायंे भी इसी तरह धधकती रहती हैं। एक पक्ष है तो दूसरा भी पक्ष ही है, आदमी सोचता है कि एक मिले तो दूसरा छोड़ दें। धारणा सुधारने के लिए की जाती है, धारण करने के लिए नहीं और दूसरे को सुधारने के लिए नहीं की जाती।
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज को नवधा भक्ति भाव से पड़गाहन और आहार का सौभाग्य संदीप मोदी, सौरभ मोदी अभाना एवं परिजनों को प्राप्त हुआ।
मुनिश्री सुधासागर महाराज का कुण्डलपुर के लिए मंगल विहार
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि श्री सुधा सागर जी महाराज का संघ सहित पद विहार चांदखेड़ी से कुण्डलपुर की ओर हो गया है। जनवरी माह के प्रथम सप्ताह में मुनिश्री के कुंडलपुर पहुचने की संभावना है। उल्लेखनीय है कि फरवरी 2022 में आयोजित होने वाले कुण्डलपुर महामहोत्सव में शामिल होने के लिए अभी तक 200 मुनिश्री और आर्यिका माताजी पहुंच चुके हैं।
मुनि संघ की कुण्डलपुर में हुई भव्य अगवानी
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि श्री अजित सागर जी महाराज, मुनि श्री सौम्य सागर जी महाराज, मुनि श्री निर्दाेष सागर जी महाराज का रविवार को कुण्डलपुर में मंगल प्रवेष हुआ। यहां सभी संतों की भव्य अगवानी हुई। इसी प्रकार आर्यिका आदर्शमति माताजी ससंघ, 15 माताजी का चातुर्मास उपरांत मंगल विहार कुण्डलपुर की ओर चल रहा है। रविवार दोपहर बाद दमोह पहुंचने पर नगर वासियों ने भव्य अगवानी की। संघ का सोमवार सुबह कुण्डलपुर की ओर पद विहार होगा।

आचार्य श्री सन्मति सागर का 11वां समाधि दिवस मनाया

आचार्य सुंदर सागर महाराज ने प्रवचन में बताए उनके जीवन के प्रसंग

बांसवाड़ा । आचार्य श्री सुंदर सागर महाराज ससंघ ने अपने दीक्षा गुरु आचार्य श्री सन्मति सागर महाराज का 11वां समाधि दिवस शुक्रवार को दिगम्बर जैन आदिनाथ मन्दिर मोहन कॉलोनी में मनाया। प्रात: जिनेन्द्र भगवान और आचार्य श्री सन्मति सागर महाराज की प्रतिमा का पंचामृत अभिषेक किया। इसके बाद प्रवचन में आचार्यश्री के जीवन की महत्वपूर्ण प्रसंग श्रावकों को बताए। आचार्य श्री सन्मति सागर महाराज ने 1988 में बांसवाडा में आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में चातुर्मास किया था । व्रती और त्यागी आचार्यश्री ने इस दौरान पर्युषण में 10 उपवास और तीन अष्ठानिका पर्व में 8-8 उपवास किए ।

आचार्यश्री सन्मति सागर यूं बढ़े मोक्ष की राह पर

आचार्य श्री सन्मति सागर महाराज में 1956 में बेलगंज आगरा में आचार्य श्री महावीरकीर्ति से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लेकर अपना पहला कदम संयम की ओर बढ़ाया। इस समय 18 वर्ष की आयु थी। मुनि बनने की प्रेरणा गणिनी आर्यिका विजयमति माताजी की रही।उन्होंने बहुत सम्बल दिया और आगम का अध्ययन भी करवाया । उन्होंने मुनि अवस्था का पहला चातुर्मास बाराबंकी में किया । आचार्य श्री का जन्म का नाम ओमप्रकाश जैन उनके माता पिता का नाम श्री प्यारे लाल- श्रीमती जयमाला देवी था । आचार्य श्री जन्म 1938 में एटा (उत्तर प्रदेश) के पास फफोतु में पद्मवाती पुरवाल गोत्र में हुआ। इसी गोत्र में 7 वीं शताब्दी में आचार्य पूज्यपादस्वामी ,मुनिब्रह्मगुलाल,आचार्य सुर्धम सागर का जन्म भी हुआ। 1956 में आचार्य विमल सागर महाराज से ब्रह्मचर्य व्रत लिया । श्रावण शुक्ल अष्टमी सन् 1961 में क्षुल्लक दीक्षा मेरठ, कार्तिक शुक्ल 12 सन 1962 में मुनि दीक्षा सम्मेद शिखर में बाहुबली भगावान की प्रतिमा के नीचे। आचार्य/उपाध्यक्ष पद आचार्य महावीरकीर्ति स्वामी ने 3 जनवरी 1972 को मेहसाणा (गुजरात) में दिया। समाधि मरण 24 दिसम्बर 2010 तिनगेवाडी (गांधी नगर, कोल्हापुर) में हुआ । अंतिम संस्कार उदग़ांव कुंजवन में हुआ ।

मुनि दर्शन से मनाही पर छोड़ी नौकरी

आचार्य श्री साकरोली में मलेरिया विभाग में नौकरी करते थे।वे उस समय आचार्य श्री विमल सागर महाराज के दर्शन करने गए। वापस आने पर उनके अधिकारी ने पूछा कि कहां गए थे। साधु दर्शन की बात बताने पर अधिकारी ने कहा कि यही करना है तो नौकरी छोड़ दो। बस इसी बात से उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी बाद में अन्य काम करने लग गए । गृहस्थ अवस्था मे दो बार सगाई हुए पर शादी नही हो पाई । पहली सगाई जहां हुई वह लड़की बीमार हो गई तो शादी टल गई। दूसरी लडक़ी के परिवार ने 500 रुपए की मांग की , इससे उन्होंने शादी से इंकार कर दिया ।

आचार्य पद के निर्णय का अधिकार विजयमति माताजी को

आचार्य श्री सुंदर सागर महाराज ने आचार्य श्री सन्मति सागर महाराज के जीवन पर प्रकाश डालते हुए संघ के साधुओं को बताया कि 1998 में ही उन्होंने 12 वर्ष की समाधि का मन बना लिया था यह बात एक पत्र से ज्ञात होती है उस पत्र में लिखा था कि अगर मेरी समाधि के बाद अगर विजय मति माता जी की समाधि होती है तो मेरा आचार्य पद किसे देना है उसका निर्णय गणिनी आर्यिका विजयमति माता जी करेंगी ।

11 को आचार्य पद और 80 को मुनि दीक्षा

आचार्य श्री ने अपने हाथों से मुनि सुविधि सागर , मुनि हेम सागर , मुनि सुंदर सागर, मुनि सुनील सागर, मुनि सूर्य सागर इन पांच मुनिराजों पर आचार्य पद के संस्कार किए । इसके अलावा 6 मुनि की आचार्य पद की घोषणा की कुल 11 आचार्य पद दिए । आचार्य श्री ने 80 मुनि दीक्षा,30 आर्यिका दीक्षा, 7 ऐलक दीक्षाया,10 क्षुल्लक दीक्षा,15 क्षुल्लिका दीक्षा प्रदान की है ।

ऐसी थी त्याग की महिमा

आचार्य श्री ने 1960 में शुद्रजल का त्याग कर दिया । सन् 1976 कोलकाता में अजीव अन्न का त्याग कर दिया । शिखर जी मे 1973 चातुर्मास के समय मात्र मूंग की दाल का पानी लिया और 27 किमी पहाड़ की चार महीने में 108 वंदना की । 1974 में रांची के चातुर्मास के समय पानी का त्याग कर मात्र नारियल का पानी लिया ।1995 में दिल्ली में चातुर्मास के समय 1 महीने तक 1 उपवास एक आहार , दूसरी महीने में 2उपवास एक आहार इस प्रकार चार उपवास एक आहार किया। गुजरात के दाहोद में 1982 में सिंहनिष्क्रिय व्रत किया । 1998 में सम्मेदशिखर की वंदना के बाद आहार में दूध का आजीवन त्याग कर दिया इसके पहले उनका घी, तेल, नमक, शक्कर का त्याग कर छह रस के त्यागी हो गए । मन्नुका, बादाम को छोड़ सभी ड्राईफ्रूट का त्याग कर दिया । 2003 में गन्ने के रस त्याग कर दिया और मात्र मट्ठा और पानी लेने का नियम किया ।

कुछ और विशेष बातें…

• छोटे पाटे पर अधिक सोते थे ।
• रात्रि 8बजे सो जाते और रात्रि 11 उठकर साधना करते थे ।
• जिसको जो बोल दिया उसका वह काम हो जाता था ।
• इतनी साधना के बाद प्रचार प्रसार से दूर रहते थे ।
• साधु को उसके नियम व्रत से च्युत होने उसे वापस उसमें स्थिर करते थे ।

 

परम वात्सल्य के धनी थे आचार्य विमलसागर जी महाराज -आचार्य श्री सुन्दर सागर महाराज

बांसवाड़ा । जिन शासन में जो जन्म ले लेता है वह चाहता है कि मैं अपने जीवन का कल्याण करूं। ऐसे जिनशासन में महावीर स्वामी के गणधर हुए। इसके बाद आचार्य कुंदकुंद स्वामी आदि ने धर्म प्रभावना की। जिस दिन मुनि मुद्रा का विनाश हो जाएगा उस दिन त्राहि-त्राहि मच जाएगी। भारत का सौभाग्य है कि यहां साधु संत हैं। भारत की धरा पर ऐसे अनेक साधु संत हुए हैं, जिन्होंने अपने आचरण, तप, साधना से महती धर्म प्रभावना की है। जो महान व्रतों का पालन करते हैं, वे बडभागी होते हैं।
आज आषाढ कृष्णा सप्तमी ऐसे मुनिराज का दिन है कि आज वे ना होते तो जिन शासन की इतनी प्रभावना  ना होती। भद्र बाहु स्वामी को निमित्त ज्ञान था और उनके बाद आचार्य विमल सागर जी को ऐसा श्रुत ज्ञान था कि बैठे-बैठे आपका पूरा जीवन चरित्र बता देते थे। वे ऐटा जिले के कोसमा में जन्में। माता का नाम कटोरी देवी था। कटोरी ने सागर को जन्म दिया। उस सागर ने पूरे भारत में धूम मचा दी। उनके बचपन का नाम नेमीचद्रं था। चंद्र मतलब चंदाप्रभु। आचार्य विमल सागर के मन में सोनागिरी बसा था। नंगानंग की प्रतिमा का अनावरण आचार्य विमल सागर जी ने किया। सम्मदेशिखर जी में मंदिर भी उनकी ही देन हैं। जन्म के छह माह में ही मां का स्वर्गवास हो गया। बुआ दुर्गादेवी ने प्रण लिया कि मैं इस बालक का पालन-पोषण करूंगी। मुरैना में पढे भी और पढाया भी। शास्त्रों का ज्ञान भी लिया।
प्रतिदिन साइकिल से व्यापार करते थे। कोसमा से बीस किलोमीटर जाते थे। आचार्य शांतिसागर जी फिरोजाबाद पधारे। उनसे मिलने की इच्छा की। नंगे पैर निकल लिए। साथ में थोडी सी मक्का, मूंगफली के दाने डाल लिए। फिरोजाबाद पहुंच तो आचार्य शांतिसागर जी महाराज प्रवचन दे रहे थे। सबको नियम दे रहे थे।
उन्होंने आचार्य श्री से कहा कि जनेउ पहना दो। उन्होंने उन्हे सात मुनिराजों के पास भेज दिया। किसी ने पहनाई नहीं। वापस शांतिसागर के पास पहुंचे। वे परीक्षा ले रहे थे। इससे पता चलता है कि जनेउ पहनाने के संस्कार पहले से थे। जिस समय विद्याधर थे, वे देशभूशण जी महाराज के पास गए। आचार्य श्री बोले यह बालक भविष्य में जिन शासन की बहुत प्रभावना करेगा। उन्होंने सम्मेदशिखर जी यात्रा साइकिल से की। पूरे भारत की तीन बार वंदना की। णमोकार मंत्र की सिद्धी थी। आचार्य कल्पचंद्र सागर जी से शुद्ध जल का नियम और सात प्रतिमा ले ली। चारों अनुयोगों के पाठी थे। धीरे-धीरे दीक्षा मार्ग पर बढ रहे थे। आचार्य महावीरकीर्ति महाराज से बावनी में 1950 में दीक्षा ले ली।
सोनागिरी में आचर्य वीर सागर जी महाराज आचार्य, महावीरकीर्ति महाराज थे। जैसे ही पता चला वहां वीर सागरजी महाराज विराजमान हैं, उन्हें आनंद आ गया। वहां पहुंच कर महाराज के चरणों में वंदना की और कहा कि आप आचार्य परमेष्ठी हा,े दीक्षा दो। महावीरकीर्ति से कहा कि मेरे संस्कार दोनों महाराज करेंगे। इस तरह विमल में “वि“ हुआ वीर सागर जी का और “म“ हुआ महावीरकीर्तिजी का।
आचर्य विमल सागर वात्सलय के धनी थे। क्षुल्लक, आर्यिका सबके लिए वात्सलय था। उन्होने पूरे जीवन मे ंसाढे पांच हजार उपवास किए। निमित्त ज्ञान के धारी थे। आपका चेहरा देख कर पूरा इतिहास बता देते थे। जो बोल दिया वही सच हो गया। जिस श्रीफल मिला, वह करोडपति हो गया। सोनागिरी में छह चातुर्मास किए। सम्मेद शिखर जी में तीन चातुर्मास किए। लगभग सौ मुनि, आर्यिका, क्षुल्लक बनाए। उनके साथ ही आचार्य भरतसागर जी भी थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन उन्हें समर्पित कर दिया। जब जन्म जयती मनती थी तो पांव रखने की भी जगह नहीं होती थी। ऐसे विमलसागर जी के चरणों में हमारा शत-शत प्रणाम।

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