इक्कीसवीं सदी की नारी है आत्मनिर्भर

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महिला दिवस 08 मार्च 2022 पर विशेष :

समाज की वास्तविक वास्तुकार है नारी

लेखक- डॉ. सुनील जैन संचय

भारतीय संस्कृति में नारी के सम्मान को बहुत महत्व दिया गया है। संस्कृत में एक श्लोक है-

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।। (मनुस्मृति ३/५६ )

अर्थात जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं और जहाँ स्त्रियों का सम्मान नही होता है वहाँ किये गये समस्त अच्छे कर्म निष्फल हो जाते हैं।
हमारे जीवन में वैसे तो हर व्यक्ति का अपना-अपना खास स्थान है, लेकिन महिलाएं हमारे जीवन में कई अहम रोल निभाती हैं. कभी मां के रूप में, कभी बहन के रूप में, तो कभी एक पत्नी के रूप में. इस दिन दुनिया भर में महिलाओं के जीवन में सुधार लाने, उनकी जागरुकता बढ़ाने जैसे कई विषयों पर जोर दिया जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हर साल 8 मार्च को ही अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस क्यों मनाया जाता है? आखिर इसके पीछे ऐसी क्या वजह है, तो चलिए इस बारे में जानते हैं ।

जानें कब से मनाया जाता है ये दिन :
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत एक आंदोलन के रूप में हुई थी। आज से करीब 113 साल पहले साल 1908 में इसकी शुरुआत हुई थी, जब अमेरिका के शहर न्यूयॉर्क में करीब 15 हजार महिलाओं ने मार्च निकालकर नौकरी में कम घंटों, बेहतर सैलरी और वोटिंग के अधिकार की मांग की थी।

महिला का शिक्षित होना बेहद जरूरी :
महिलाएं समाज के विकास एवं तरक्की में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उनके बिना विकसित तथा समृद्ध समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती। ब्रिघम यंग के द्वारा एक प्रसिद्ध कहावत है कि ‘अगर आप एक आदमी को शिक्षित कर रहे हैं तो आप सिर्फ एक आदमी को शिक्षित कर रहे हैं पर अगर आप एक महिला को शिक्षित कर रहे हैं तो आप आने वाली पूरी पीढ़ी को शिक्षित कर रहे हैं’। समाज के विकास के लिए यह बेहद जरुरी है कि लड़कियों की शिक्षा में किसी तरह की कमी न आने दी जाए क्योंकि उन्हें ही आने वाले समय में लड़कों के साथ समाज को एक नई दिशा देनी है। ब्रिघम यंग की बात को अगर सच माना जाए तो उस हिसाब से अगर कोई आदमी शिक्षित होगा तो वह सिर्फ अपना विकास कर पायेगा पर वहीं अगर कोई महिला सही शिक्षा हासिल करती है तो वह अपने साथ साथ पूरे समाज को बदलने की ताकत रखती है। महादेवी वर्मा ने लिखा है कि -‘नारी सदैव अजेय रही है।’ कुछ लोग कहते हैं औरत का कोई घर नही होता हैं लेकिन मेरा यह अनुभव हैं कि औरत के बिना कोई घर, घर नही होता हैं. रवीन्द्रनाथ ठाकुर के अनुसार पवित्र नारी सृष्टिकर्ता की सर्वोत्तम कृति होती है; वह सृष्टि के सम्पूर्ण सौन्दर्य को आत्मसात किये रहती हैं।

आज की नारी है आत्मनिर्भर :

आज की महिला निर्भर नहीं हैं। वह हर मामले में आत्मनिर्भर और स्वतंत्र हैं और पुरुषों के बराबर सब कुछ करने में सक्षम भी हैं।
महिलाएं आज हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं और खुद ही अपना मुकाम तय कर रही हैं।

किसी ज़माने में अबला समझी जाने वाली नारी को मात्र भोग एवं संतान उत्पत्ति का जरिया समझा जाता था। जिन औरतों को घरेलू कार्यों में समेट दिया गया था, वह अपनी इस चारदीवारी को तोड़कर बाहर निकली है और अपना दायित्व स्फूर्ति से निभाते हुए सबको हैरान कर दिया है। इक्कीसवीं सदी नारी के जीवन में सुखद संभावनाएँ लेकर आई है। नारी अपनी शक्ति को पहचानने लगी है वह अपने अधिकारों के प्रति जागरुक हुई है। वर्तमान स्थिति में नारी ने जो साहस का परिचय दिया है, वह आश्चयर्यजनक है। आज नारी की भागीदारी के बिना कोई भी काम पूर्ण नहीं माना जा रहा है। समाज के हर क्षेत्र में उसका परोक्ष – अपरोक्ष रूप से प्रवेश हो चुका है। महिलाएं पहले से अधिक सशक्त और आत्मनिर्भर हुई है।

समाज का दर्पण हैं महिलाएं :
जीवन के हर क्षेत्र में वे पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मजबूती से खड़ी हैं और आत्मबल, आत्मविश्वास एवं स्वावलंबन से अपनी सभी जिम्मेदारी निभाती है। आज की नारी पढ लिखकर स्वतंत्र है अपने अधिकारों के प्रति सजग भी है। आज की नारी स्वयं अपना निर्णय लेती है। इतिहास गवाह है कि नारी ने हमेशा से परिवार संचालन का उत्तरदायित्व सम्भालते हुए समाज निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है । वहीं भारतीय संस्कृति में स्त्री का दर्जा पुरुष की अपेक्षा कहीं अधिक सम्माननीय माना गया है । हमारे आदि-ग्रंथों में भी नारियों की भूमिका को अहम माना गया है।

महिला दिवस पर कार्यक्रम :
समाज के विकास में महिलाओं की सच्ची महत्ता और अधिकार के बारे में जनजागरूकता लाने हेतु ही हर साल महिला दिवस जैसे कार्यक्रम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाये जाते हैं। इस दिन पर महिलाओं की सुरक्षा, विकास एवं सशक्तिकरण के लिए सर्वोच्च प्राथमिकताएं तय किए जाते हैं और विश्वभर में लागू किए जाते हैं। विमेंस डे इसलिए और भी ज्यादा खास हो जाता है क्योंकि इस दिन के सम्मान में आयोजित कार्यक्रमों के जरिए समाज के विकास के प्रत्येक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण एवं प्रशंसनीय भूमिका निभाने वाली महिलाओं को उनके कार्यों के लिए सम्मानित किया जाता है उन्हें सराहा जाता है। महिला दिवस पर इस तरह के कार्यक्रमों के आयोजन से महिलाओं के उत्थान की दिशा में तेजी से कार्य करने में बड़ी मदद मिलती है। बीते कुछ वर्षों में महिलाओं ने सेना, प्रशासन, राजनीति जैसे हर क्षेत्र में अपना परचम लहराते हुए महिला सशक्तिकरण के संदेश को साकार किया है, ऐसे में लोगों के हर तबके को बेहतर समाज निर्माण में महिलाओं की भूमिका समझनी चाहिए।

महिलाओं को शिक्षित करना है जरूरी :
आजादी के 74 साल बाद भी देश में एक बड़ी संख्या में लड़कियां और बच्चियां अपनी शिक्षा को पूरा नहीं कर पाती हैं और गरीबी या पारिवारिक समस्या की वजह से छोटी उम्र में ही स्कूल छोड़ने को मजबूर होती हैं। अशिक्षित होने की वजह अधिकांश महिलाएं अपने जीवन स्तर में सुधार करने में खुद को असमर्थ महसूस करती हैं। वैसे तो सरकारों ने महिला शिक्षा और छोटी बच्चियों की पढ़ाई पूरी करवाने के लिए कई सारी योजनाओं को शुरू किया है। लेकिन फिर भी अभी भी ये प्रयास ऊंट के मुंह में जीरे के समान ही प्रतीत होते हैं।
आज की नारी जागृत एवं सक्रिय हो चुकी है | वह अपनी शक्तियों को पहचानने लगी है जिससे आधुनिक नारी का वर्चस्व बढ़ा है | तकनीकी एवं इंजीनियरिंग जैसे पेचीदा विषयों में उसका दखल देखते ही बनता है | वर्तमान स्थिति में नारी ने जो साहस का परिचय दिया है, वह आश्चयर्यजनक है | आज नारी की भागीदारी के बिना कोई भी काम पूर्ण नहीं माना जा रहा है | समाज के हर क्षेत्र में उसका परोक्ष – अपरोक्ष रूप से प्रवेश हो चुका है। हालांकि, अब भी महिलाओं को पूरी तरह से समानता प्राप्त करने में मीलों का सफर तय करना है। नारी को चाहिए की उसे भी अपनी मान, मर्यादा की सीमाएं नहीं लांघना चाहिए। स्वतंत्रता की दुहाई देकर स्वच्छंद नहीं होना चाहिए। भारतीय संस्कृति में नारी को जिस रूप में देखा गया है उसकी पहचान बनाए रखना चाहिए।

नारी पर सुप्रसिद्ध लेखक जयशंकर प्रसाद की ने लिखा है –
नारी तुम केवल श्रद्धा हो,
विश्वास-रजत-नग-पगतल में,
पियूष-स्त्रोत सी बहा करो,
जीवन के सुन्दर समतल में।
भारत में महिलाओं का स्वर्णिम इतिहास :
हजारों भारतीय महिलाओं ने अपने कर्म, व्यवहार और बलिदान से विश्व में आदर्श प्रस्तुत किया है। प्राचीनकाल से ही भारत में पुरुषों के साथ महिलाओं को भी समान अधिकार और सम्मान मिला है इसीलिए भारतीय संस्कृति और धर्म में नारियों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इन भारतीय महिलाओं ने संस्कृति, समाज और सभ्यता को नया मोड़ दिया। भारतीय इतिहास में इन महिलाओं के योगदान को कभी भी भूला नहीं जा सकता। भारत में जहां ऐतिहासिक नारियों में सीता, द्रोपती, सती अंजना, शबरी, कौशल्या आदि का योगदान किसी से छिपा नहीं है वहीं देवी अहिल्याबाई होलकर, मदर टेरेसा, इला भट्ट, महादेवी वर्मा, राजकुमारी अमृत कौर, अरुणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी, लक्ष्मीबाई और कस्तूरबा गांधी आदि जैसी कुछ प्रसिद्ध महिलाओं ने अपने मन-वचन व कर्म से सारे जग-संसार में अपना नाम रोशन किया है। कस्तूरबा गांधी ने महात्मा गांधी का बायां हाथ बनकर उनके कंधे से कंधा मिलाकर देश को आजाद करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इंदिरा गांधी ने अपने दृढ़-संकल्प के बल पर भारत व विश्व राजनीति को प्रभावित किया है। कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स जैसी एस्ट्रोनॉट ने न केवल हमें गौरवांवित किया बल्कि इस बात का प्रमाण भी दिया कि मौका मिलने पर महिलाएं हर काम को करने में सक्षम हैं।

महिलाएं आज भी करती हैं कई अत्याचारों का सामना :
प्रगति करने के साथ ही महिलाओं के साथ होने वाली दुर्घटनाओं के मामले में भी बढ़ोतरी हुई है। आमतौर पर महिलाओं को जिन समस्याओं से दो-चार होना पड़ा है उनमे प्रमुख है दहेज-हत्या, यौन उत्पीड़न, महिलाओं से लूटपाट, नाबालिग लड़कियों से राह चलते छेड़-छाड़ इत्यादि। हिंसा से तात्पर्य है किसी को शारीरिक रूप से चोट या क्षति पहुंचाना।
बेटी-बहु कभी माँ बनकर,सबके ही सुख-दुख को सहकर।
अपने सब फर्ज़ निभाती है,तभी तो नारी कहलाती है।।
गर्भपात न कराने का लें संकल्प :

आज भी बेटियों के जन्म को लेकर लोगों की मानसिकता बदलने की जरूरत है। न जानें कितनी बेटियां कोख में ही मार दी जाती हैं। विडम्बना है कि दुर्गा की होती है पूजा, बेटियों को मिलता है तिरस्कार। आंकड़ों के अनुसार, ऐसा पाया गया है कि पुरुष और महिला लिंगानुपात 1961 में 102.4 पुरुष पर 100 महिला, 1981 में 104.1 पुरुषों पर 100 महिला, 2001 में 107.8 पुरुषों पर 100 महिला और 2011 में 108.8 पुरुषों पर 100 महिला हैं। ये दिखाता है कि पुरुष का अनुपात हर बार नियमित तौर पर बढ़ रहा है। भारत में 1979 में अल्ट्रासाउंड तकनीक की प्रगति आयी हालांकि इसका फैलाव बहुत धीमे था। लेकिन वर्ष 2000 में व्यापक रुप से फैलने लगा। इसका आंकलन किया गया कि 1990 से, लड़की होने की वजह से 10 मिलीयन से ज्यादा कन्या भ्रूणों का गर्भपात हो चुका है। लिंग चयनात्मक गर्भपात से लड़ने के लिये, लोगों के बीच में अत्यधिक जागरुकता की जरुरत है। “बेटियाँ अनमोल होती हैं” के अपने पहले ही भाग के द्वारा आम लोगों के बीच जागरुकता बढ़ाने के लिये टी.वी पर आमिर खान के द्वारा चलाये गये एक प्रसिद्ध कार्यक्रम ‘सत्यमेव जयते’ ने कमाल का काम किया था। जागरुकता कार्यक्रम के माध्यम से बताने के लिये इस मुद्दे पर सांस्कृतिक हस्तक्षेप की जरुरत है। लड़कियों के अधिकार के संदर्भ में जागरुकता कार्यक्रम जैसे बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओं या बालिका सुरक्षा अभियान आदि बनाये गये हैं। 2001 के सेंसस के आंकड़ों के अनुसार, पुरुष और स्त्री अनुपात 1000 से 927 है। सोच बदलने की जरुरत है, नयी सकारात्मक सोच से नवीन समाज का गठन कर हमारे भारत को आगे ले जाना है। हालांकि अब काफी कुछ परिवर्तन देखने मिल रहा है।
इस महिला दिवस पर जहाँ खुद महिलाओं को गर्भपात न करने का संकल्प लेना होगा वहीं प्रत्येक व्यक्ति को नारी के सम्मान के लिए संकल्पित होना होगा। दहेज प्रथा जैसी कुप्रथाओं को जड़मूल से उखाड़ना होगा। बहु को सास के प्रति और सास को बहू के प्रति प्रेम और स्नेह का दिया जलाना होगा। सास और बहू का रिश्ता माँ और बेटी का रूप ले ले तो बहुत अधिक समस्याओं का हल निकल सकता है।
मां है वो, बेटी है वो, बहन है वो तो, कभी पत्नी है वो,जीवन के हर सुख दुख में शामिल है वो,
शक्ति है वो, प्रेरणा है वो, जीवन के हर मोड़ पर, हमारा साथ देती है वो! हैप्पी वूमेंस डे.

 

डॉ. सुनील जैन संचय

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