इथोपिया और दक्षिणी अमेरिका तक फैला था जैन धर्म

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डॉ. राजमल कोठारी ने जैन प्रतीक चिह्नों व मंदिरों का किया खुलासा

श्रीफल न्यूज के लिए प्रकाश श्रीवास्तव की रिपोर्ट 

जयपुर । अतीत में विश्व के हर देश में जैन धर्म का प्रभाव रहा है। कतिपय हस्तलिखित ग्रंथों में इस बात के महत्वपूर्ण प्रमाण मिले हैं। ईसा से पूर्व ईराक, ईरान और फिलिस्तीन में जैन मुनि और बौद्ध भिक्षु हजारों की संख्या में चहुं ओर फैले हुए थे। पश्चिमी एशिया, मिस्र, यूनान और इथोपिया के पहाड़ों और जंगलों में श्रमण-साधुओं के रहने की बात सामने आई है जो अपने त्याग और विद्या के लिए प्रसिद्ध थे। मध्य-पूर्व में प्रचलित समानिया सम्प्रदाय श्रमण का अपभ्रंश माना जाता है। यूनानी लेखक मिस्र, एचीसीनिया और इथोपिया में दिगम्बर मुनियों का अस्तित्व बताते हैं। जैन धर्म, उसके व्यापक प्रभाव एवं प्रसार क्षेत्र को लेकर प्रख्यात वैज्ञानिक तथा श्रीभारतवर्षीय दिगंबर जैन महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. राजमल कोठारी ने एक विशेष बातचीत में जैन धर्म, श्रमण-संस्कृति का स्पष्ट प्रभाव दृष्टिगोचर होने के संदर्भ में कई प्रमाण दिए। इन प्रमाणों से जैन धर्म, जैन संस्कृति और जैन सिद्धांतों के बार में पता चलता है।

डॉ. कोठारी कहते हैं कि जैन धर्म भारत ही नहीं, इथोपिया और साउथ अमेरिका तक फैला था। वहां लोग जैन धर्म का पालन करते थे और राजा भी जैन थे। इथोपिया के जेहा में भगवान चंद्रप्रभु और आदिनाथ के मंदिर मिले हैं। ऐसे ही साउथ अमेरिका के पेरू, ग्वाटोमोल में क्षमोशरण के रूप में जैन मंदिर मिले हैं। इन स्थलों पर जैन धर्म के प्रतीक चिह्न हैं तो अभिषेक पंचामृत भी होना पाया गया है। इससे पता चलता है कि जैन धर्म कहां तक फैला हुआ था। कट्टरता के कारण जैन धर्म का प्रभाव कम होता गया। डॉ. राजमल कोठारी पिछले 10 वर्षों से दुनियाभर में जैन धर्म से जुड़े साक्ष्य, मंदिर, उपासना ,संस्कृति आदि क्षेत्र के कार्य कर रहे हैं।

10 हजार वर्ष पूर्व तक जैन धर्म के साक्ष्य मिले

डॉ. कोठारी कहते हैं कि उनके द्वारा वर्ष 2017 में अमेरिका और इथोपिया में जैन धर्म से जुड़े स्थानों की खोज की गई है। वे खुद इन स्थलों पर गए और यहां पाए गए अवशेष और प्रतीक चिह्न जैन उपासना से जुड़े हुए प्रतीक देखे हैं। उनके मुताबिक इथोपिया और अमेरिका में मिले जैन संस्कृति से जुड़े मंदिर तीन से चार हजार वर्ष पुराने मंदिर और संस्कृति है। हमारी खोज में इन क्षेत्रों में राजा जैन थे और लोग भी जैन धर्म का पालन करते थे। इस खोज से स्पष्ट हुआ है कि ऋषभदेवजी महाराज कहां तक पहुंचे थे। इन क्षेत्रों में 10 हजार वर्ष पूर्व तक जैन धर्म के साक्ष्य मिले हैं। इन मंदिरों में जैन धर्म से जुड़ा सबसे बड़ा साक्ष्य मोक्ष प्रकिया का मिला है जो भारत में कहीं नहीं मिला। यहां मिले अवशेष जैन धर्म की पूजा-उपासना से जुड़े होकर क्षमोशरण की तरह मंदिर बने हुए हैं। डॉ. कोठारी की खोज पर एक रिसर्च पेपर अगले वर्ष प्रकाशित होने वाला है।

जैन धर्म का क्षरण होने की वजह अहिंसावादी होना

जैन धर्म के सिकुड़ने का कारण डॉ. कोठारी ने उसका अहिंसावादी होना बताया है। उनके मुताबिक मुगल व इसाई धर्म आने के बाद जैन धर्म को सख्ती के साथ खत्म किया गया। चूंकि जैन धर्मावलम्बी अहिंसा का पालन करते थे उन्होंने प्रतिकार नहीं किया। जैन धर्म की उत्पत्ति को भारत में माना जाता है। डॉ. कोठारी इससे इत्तेफाक नहीं रखते। उनका कहना है कि आज का भारत एक भारत खंड का हिस्सा मात्र है। उन्होंने दावा किया कि 24 तीर्थंकर भारत के हैं, इससे पहले के तीर्थंकर भारत खंड से हैं। इथोपिया से जैन धर्म साउथ भारत में आया।
इजराइल का येरुशलम भी जैन धर्म से जुड़ा
डॉ. कोठारी के अनुसार इजराइल का येरुशलम भी जैन धर्म से जुड़ा है, जिस पर बाद में इसाई और मुसलमानों ने कब्जा किया।

जैन मुनि को सिकंदर ले गया था अपने साथ

यूनानी लेखकों के अनुसार जब सिकन्दर भारत से यूनान लौटा था, तब वह तक्षशिला से एक जैन मुनि ‘कोलानस’ या ‘कल्याण मुनि’ को अपने साथ यूनान ले गया था। ‘कल्याण मुनि’ अनेक वर्षों तक एथेन्स नगर में रहे। उन्होंने एथेन्स में सल्लेखना ली। उनकी समाधि स्थल यहीं पर है।

नार्वे म्यूजियम में ऋषभदेव की मूर्तियां

इतिहासकार एवं प्रोफेसर एम.एस. रामस्वामी आयंगर के अनुसार जैन मुनि संत ग्रीस, रोम, नार्वे में भी विहार करते थे। आर्किटेक्ट एवं नार्वे के लेखक जान लिंगटन के अनुसार नार्वे म्यूजियम में ऋषभदेव की मूर्तियां हैं। वे नग्न और खड्गासन हैं। तर्जिकिस्तान में सराज्य के पुरातात्विक उत्खनन में प्राप्त पंचमार्क सिक्कों तथा सीलों पर नग्न मुद्रायें बनीं हैं जो सिंधु घाटी सभ्यता के सदृश हैं। हंगरी के ‘बुडापेस्ट’ नगर में ऋषभदेव की मूर्ति एवं भगवान महावीर की मूर्ति भूगर्भ से मिली हैं।

डॉ. कोठारी एक परिचय

डॉ. राजमल जैन कोठारी भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला अंतरिक्ष विभाग अहमदाबाद में वरिष्ठ वैज्ञानिक व प्रोफेसर रहे हैं। वे स्पेस से जुड़े सूर्य, चंद्रायान, मंगल और आदित्य मिशन के उपकरण डिजाइन से जुड़े रहे हैं। वे अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ, भारत की खगोलीय संघ के सदस्य है। जर्नल ऑफ स्पेस एंड रेडियो फिजिक्स, एशियन जर्नल ऑफ फिजिक्स पत्रिका के संपादक हैं। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय जैन विद्धत संघ न्यूयार्क तथा अंतरराष्ट्रीय अहिंसा मिशन अहमदाबाद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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