जब अधर्मी, जैन धर्म को नुकसान पहुंचाने लगे तो उसे कुछ यूं बचाने आए भट्टारक

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आलेख- अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

धर्म पर अधर्म हावी होने के लिए जब-जब आगे बढ़ा तो संस्कृति के संरक्षण के लिए आचार्यों और मुनियों ने बलिदान दिया। आचार्य समंतभद्र, अकलंकदेव और निकलंक का बलिदान भुलाना असंभव है। पल-प्रतिपल घटने वाली बातें इतिहास का हिस्सा बनती जाती हैं। यह बलिदान उसी इतिहास का हिस्सा हैं।

इतिहास बतलाता है कि श्रद्धा, ज्ञान, आचार और विचार में शिथिलता आ रही है। हिंसा, झूठ और चोरी का बोलबाला है। ऐसे में जरूरत है आचार्य और मुनियों की। समय बदला। धर्म, ज्ञान, अहिंसा में अच्छाई का लोप होने लगा, धर्म में राजनीति आ गई। और यही वजह थी कि धर्म राज्य पर आश्रित होने लगा। धर्म को जानने के लिए राजा मंदिर, शास्त्र और गुरु पर अपना शासन समझने लगे। उन्हें आधीन रहने को मजबूर करने लगे।

हुआ कुछ यूं कि नंगनचर्या का पालन करने वाले मुनियों के लिए खुद की सुरक्षा कठिन होने लगी। मुनि और श्रावक के बीच इसी कठिनाई को पाटने कड़ी बने भट्टारक।

बारहवीं सदी से पहले भट्टारक नंग होते थे, लेकिन बाद में भट्टारकों ने वस्त्र अपनाए। कारण यही था कि मंदिर की संपत्ति की सुरक्षा और व्यवस्था नंगनचर्या के साथ असंभव था। जिन मुनियों के मन में संस्कृति बचाने का राग था, उन्होंने वस्त्रों के साथ खुद को भट्टारक बतौर स्वीकार किया।

समय ऐसा भी आया जब अधर्मी जैन मंदिरों को नुकसान पहुंचाने लगे। साधुओं की तपस्या भंग करने लगे। यही नहीं, संस्कृति की इबारत गढ़ने वाले ताड़ पत्र और शास्त्रों के भंडारों को जलाया जाने लगा। हालात ऐसे िक जैनियों के लिए जैन कहलाना भी मुश्किल हो गया। फिर भला श्रावक संस्कृति की रक्षा कैसे करता? इतिहास का काला अध्याय था यह कि अधर्म ऐसा बढ़ा कि जैन साधुओं को घानी में पेरा जाने लगा या गर्म तेल की कड़ाही में डाला जाने लगा। हजारों सालों तक दुर्भाग्य का यह कुचक्र चलता रहा।
श्रावक परिवार और संपत्ति को बचाने में व्यस्त थे। तो ऐसे वक्त में संस्कृति की सुरक्षा और समाज को संगठित करने का दारोमदार भट्टारकों ने अपने जिम्मे लिया। यह योगदान अतुलनीय है।

उस समय देश में अलग-अलग स्थानों पर भट्टारक पीठ की स्थापना हुई। हमारी संस्कृति अक्षुण है और आज भी जीवित है, इसका श्रेय इन्हीं को जाता है। वर्तमान में दक्षिण के अलावा किसी भी पीठ में भट्टारक विराजमान नहीं हैं, पीठ अवश्य हैं। कर्नाटक में 15 पीठ हैं। यहां भट्टारक स्वामी विराजमान हैं और धर्म सुरक्षा को अपना कर्त्तव्य समझते हैं। ये सिर्फ सामाजिक कार्य नहीं, बल्कि आत्मसाधना के लिए भी काम करते थे और आज भी करते आ रहे हैं।

धर्म परिवर्तन का काल भी आया, जब भट्टारकों ने श्रावकों का मार्गदर्शन किया और धर्म के इतिहास को सुरक्षित रखा। आज हम जिन भी माध्यमों से जैन इतिहास को जान पा रहे हैं वो सभी शास्त्र, मूर्तियां भट्टारकों की देन हैं। धर्म पर उनका उपकार अतुलनीय है। और उपकारों का सम्मान हमारी परम्परा। पंच परमेष्ठी में सिद्ध परमेष्ठी बड़े हैं पर आज भी हम पहले अरिहंत परमेष्ठी को नमस्कार करते हैं क्योंकि उन्होंने उपदेश देकर हमें धर्म का स्वरूप बताया। तो क्यों न हमें धर्म और इतिहास को जानने-समझने-समझाने का लाभ देने वालों का हम वंदन करें।

भट्टारक यानी क्या?

वैसे तो इस शब्द के अनेक अर्थ हैं। यहां तक कि तीर्थंकर के लिए भी भट्टारक शब्द का उपयोग किया गया है। भट्टारक परम्परा का उदय इतिहास की सुरक्षा के लिए हुआ था और आज भी वही कर रहे हैं। ये परम्परा मोक्ष मार्ग का साधन है, मोक्ष मार्ग नहीं। जैन धर्म का अस्तित्व बचाने के लिए उसके इतिहास और कला को बचाना ज्यादा जरूरी है। वही काम भट्टारकों ने ईमानदारी से किया है। उनकी इस परम्परा को नमस्कार करते हैं। आप भी दक्षिण भारत जाकर देखें कि किस तरह से भट्टारक अपने इतिहास की सुरक्षा कर रहे हैं। ये इतिहास की याद दिलाते हैं।

इन 15 जगहों पर है भट्टारक पीठ


श्रवणबेलगोला, कोल्हापुर, हुम्चा, नान्दनी, मूड़बद्री, कारकल, स्वादी, सौन्दा, नरसिंहराजपुरा, जिनकांची (तमिलनाडु), अरिहंतगिरि, कनकगिरि, कम्बदहल्ली, वरुर, अरतिपुर।

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