जिसे सुख मान रहे है वह बहिरंग स्थूल असत्य कल्पना है – मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज

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  • पुण्य पाप नहीं दिखता, लेकिन इनका उदय दिखता है

इंदौर। जिसे सुख मान रहे है वह बहिरंग स्थूल असत्य कल्पना है। सत्य बड़ा सूक्ष्म और अंतरंग का विषय है जितना सत्य तुम्हें दिख रहा है वह कम है जो नहीं दिख रहा है वह अनंत गुणा है। जीव राशि भी अल्प दिख रही है जबकि वह भी अनंत गुणा है। इसी प्रकार पाप-पुण्य भी दिखता नहीं है लेकिन पुण्य-पाप का उदय दिखता है। यह विचार चातुर्मास के दौरान मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने कंचन बाग स्थित समवशरण मंदिर में प्रवचन देते हुए व्यक्त किए। सभा को संबोधित करते हुए कहा कि सुख दुख कर्म से हैं, आत्मा की उपज नहीं है। आत्मा तो अनंत आनंद का पिंड है। साथ ही बताया कि ऐसा कुछ ना देखो, ना सुनो और ऐसा अनुभव भी मत करों जिससे कर्मों का बंध हो। संकल्प और कल्पना ऐसी करना चाहिए जो आपको संसार की वासनाओं में ले जाने के बजाय जिनवाणी की शरण में ले जाए।

वस्तु का वास्तविक स्वभाव धर्म है
धर्म सभा के दौरान मुनि श्री सहज सागर जी ने धर्म को सिद्धांत रूप और आचरण रूप बताते हुए कहा कि वस्तु का वास्तविक स्वभाव धर्म है। धर्म दिखता नहीं है, पर वह है। धर्म सिद्धांत रूप भी है और आचरण रूप भी है। धर्म से ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है।

मीडिया प्रभारी राजेश जैन दद्दू ने बताया कि इस दौरान मुनि श्री आदित्य सागर जी के गृहस्थ जीवन के पिता राजेश जैन जबलपुर और संदीप जैन, सार्थक जैन ने मुनिश्री का पाद प्रक्षालन कर अन्य सभी मांगलिक क्रियाएं संपन्न की। धर्म सभा का संचालन हंसमुख गांधी ने किया।

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