कहाँ गयी मेरे आँगन की गौरैया!

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विश्व गौरैया दिवस 20 मार्च 2022 पर विशेष :

गौरैया के अस्तित्व पर संकट के बादल,
गौरैया के संरक्षण के लिए आगे आएं

– डॉ. सुनील जैन संचय, ललितपुर

( एक समय था जब घर-घर में गौरैया दिखती थीं, लेकिन समय के साथ पक्के मकानों और कम होते जंगलों के कारण गौरैया के कुनबे भी कम हो गए, जिसका असर पर्यावरण पर भी पड़ रहा है।जैसे-जैसे हम पेड़-पौधों को काटते जा रहे हैं उससे गौरैया आज लुप्त होने की कगार पर पहुँच गयी है। अब घरों में न तो गौरैया दिखाई देती है और न ही उसकी चीं-चीं करती आवाज़। आज गौरैया पक्षी को बचाने के लिए तरह-तरह के आयोजन किये जा रहे हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए 20 मार्च को हर वर्ष पूरे विश्व में गौरैया दिवस मनाया जाता है। 20 मार्च 2022 विश्व गौरैया दिवस के अवसर पर,
दिनोंदिन नन्ही गौरैया की संख्या में आ रही गिरावट पर चिंता जाहिर करते हुए गौरैया के संरक्षण और संवर्द्धन पर प्रकाश डाल रहे हैं डॉ. सुनील जैन संचय। हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है कि गौरैया का गौरव लौटाएं, ताकि फिर आंगन व छत पर गौरैया फुदकती नजर आए।-संपादक)
प्रकृति की सभी रचनाएं प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष एक-दूसरे पर निर्भर हैं और उनमें हमारे साथ-साथ नन्ही गौरैया भी शामिल है। गौरैया चिड़िया यह एक छोटी पक्षी है जो प्रायः सभी स्थानों पर मिल जाती है। इसके रहने का एक अलग ही अंदाज होता है। गौरैया रहती तो घोंसले में ही है, पर यह अपना घोंसला अधिकाशतः ऐसे स्थानों पर बनाती है जो चारों तरफ से सुरक्षित हो। गौरैया हल्की भूरे रंग , सफेद रंग लिये होती है। नर के गले के पास (चोंच के नीचे) काले रंग का धब्बा होता है, जो नर गौरैया की पहचान कराता है। प्रातःकाल इनके चहकने की अनोखी प्रकृति होती है, जो बहुत ही सुखमय प्रतीत होती है। हम घर-आँगन में इसकी चूं-चूं की मधुर आवाज़ को बचपन से सुनते आए हैं।
जिस आंगन में नन्ही गौरैया की चहल कदमी होती थी आज वह आंगन सूने पड़े हुए हैं।दुनिया भर में गौरैया पक्षी के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है। विश्व गौरैया दिवस पहली बार वर्ष 2010 में नेचर फाइबर सोसायटी के द्वारा मनाया गया  था।  आधुनिक मकान, बढ़ता प्रदुषण, जीवन शैली में बदलाव के कारण गौरैया लुप्त हो रही। कभी गौरैया का बसेरा इंसानों के घर में होता था। अब गौरैया के अस्तित्व पर छाए संकट के बादलों ने इसकी संख्या काफी कम कर दी है और कहीं..कहीं तो अब यह बिल्कुल दिखाई नहीं देती। इस संकट की घड़ी में नन्ही गौरैया को अपने अंगने में बुलाने के लिए हम लोगों को मिलकर कई काम करने होंगे।
 हम जैसे जैसे शहरीकरण और विकास के नए आयामों को छूते जा रहे हैं इन पक्षियों के प्राकृतिक निवास भी उसी तीव्र गति से खत्म हो रहे हैं। हमारी वर्तमान पीढ़ी तकनीक में इतना ज्यादा उलझ चुकी है कि प्रकृति से उसका नाता लगभग खत्म ही हो चुका है। प्रकृति के प्रति हमारे युवाओं की अनदेखी के कारण ही घर पर कलरव करने वाली गौरैया चिडिय़ा भी अब हमारे जेहन में नहीं रही। हमारे घरों में अपनाई जाने वाली जीवनशैली में आए परिवर्तन से भी गौरैया के जीवन पर संकट के बादल मंडराये हैं। जहां महिलाएं पहले गेंहू को आटे में परिवर्तित करने से पूर्व उसे धोकर छतों अथवा आंगन में सुखाया करती थी, वहीं अब गेंहू सीधे आटे का रूप ले रहा है या फिर रेडिमेड आटा ही उपयोग में लाया जा रहा है। इस तरह छतों और आंगन से गौरैया को मिलने वाला आहार अब उपलब्ध नहीं है। गौरैया की चूं चूं अब चंद घरों में ही सिमट कर रह गई है। एक समय था जब उनकी आवाज़ सुबह और शाम को आंगन में सुनाई पड़ती थी। मगर आज के परिवेश में आये बदलाव के कारण वह शहर से दूर होती गई। गांव में भी उनकी संख्या कम हो रही है।
बचपन की सबसे सुखद स्मृतियों में गौरैया जरूर आती है, क्योंकि सबसे पहले बच्चा इसी चिड़िया को पहचानना सीखता था। पड़ोस के लगभग हर घर में इनका घोंसला होता था। आंगन में या छत की मुंडेर पर वे दाना चुगती थीं। बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर ये झुंड के झुंड फुदकती रहती थीं। प्राचीन काल से ही हमारे उल्लास, स्वतंत्रता, परंपरा और संस्कृति की संवाहक वही गौरैया अब संकट में है। संख्या में लगातार गिरावट से उसके विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है।
विदेशों में भी घट रही संख्या
न केवल भारत में बल्कि दूसरे देशों में भी गौरैया की संख्या में दिनों-दिन गिरावट आ रही है।ब्रिटेन, इटली, फ्रांस, जर्मनी जैसे देशों में इनकी संख्या जहां तेज़ी से गिर रही है। मगर नीदरलैंड में तो इन्हें ‘रेड लिस्ट’ के वर्ग में रखा गया है।
दिल्ली में तो इस पक्षी को ढूंढना इतना दुर्लभ हो गया है कि लाख ढूंढने पर भी यह पक्षी दिखाई नहीं देता, इसीलिए दिल्ली सरकार द्वारा साल 2012 में गौरैया को ‘राज्य-पक्षी’ घोषित करने का फैसला लिया गया।
गौरैया की दिनोंदिन घटती संख्या का कारण
सबसे बड़ा कारण है आधुनिक घरों में गौरैया के रहने के लिए जगह नहीं है। घरों की खिड़कियों में लगे कूलर, रोशनदानों की जगह विण्डो, ए सी ने गौरैया के जीवन को और भी खतरे में डाल दिया है। अगर चिलचिलाती धूप से बचने या भोजन की खोज में गौरैया आपके घरों में आयेगी भी तो पंखे या कूलर से इसके कट जाने का खतरा रहता है।
घर का माहौल भी अब उनके अनुकूल नहीं रहा है। घर में अब महिलाएं न तो गेहूं सुखाती हैं न ही धान कूटती हैं जिससे उन्हें छत पर खाना नहीं मिलता है।अब घरों में टाइल्स का इस्तेमाल ज्यादा होने लगा है।खेती में कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ गया है जिसका असर गौरैया पर पड़ रहा है। गौरेया की घटती संख्या का मुख्य कारण है, भोजन-पानी की कमी और पेड़ों का कटान। बढ़ती मॉडर्न टेक्नोलॉजी ने चिड़ियों का सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है।शहरीकरण के नए दौर में घरों में बगीचों के लिए स्थान नहीं है।पेट्रोल के दहन से निकलने वाला मेथिल नाइट्रेट छोटे कीटों के लिए विनाशकारी होता है, जबकि यही कीट चूजों के खाद्य पदार्थ होते हैं।मोबाइल फोन टावरों से निकलने वाली तरंगों में इतनी क्षमता होती है, जो इनके अंडों को नष्ट कर सकती है।
गौरैया को विलुप्त होने से हम ऐसे बचा सकते हैं
यदि इसके संरक्षण के उचित प्रयास नहीं किए गए तो हो सकता है कि गौरैया इतिहास की चीज बन जाए और भविष्य की पीढ़ियों को यह देखने को ही न मिले। गौरैया को विलुप्त होने से बचाने  के लिए हम कुछ छोटे-छोटे प्रयास कर सकते हैं।

विदेशों में भी घट रही संख्या
न केवल भारत में बल्कि दूसरे देशों में भी गौरैया की संख्या में दिनों-दिन गिरावट आ रही है।ब्रिटेन, इटली, फ्रांस, जर्मनी जैसे देशों में इनकी संख्या जहां तेज़ी से गिर रही है। मगर नीदरलैंड में तो इन्हें ‘रेड लिस्ट’ के वर्ग में रखा गया है।
दिल्ली में तो इस पक्षी को ढूंढना इतना दुर्लभ हो गया है कि लाख ढूंढने पर भी यह पक्षी दिखाई नहीं देता, इसीलिए दिल्ली सरकार द्वारा साल 2012 में गौरैया को ‘राज्य-पक्षी’ घोषित करने का फैसला लिया गया।

गौरैया की दिनोंदिन घटती संख्या का कारण
सबसे बड़ा कारण है आधुनिक घरों में गौरैया के रहने के लिए जगह नहीं है। घरों की खिड़कियों में लगे कूलर, रोशनदानों की जगह विण्डो, ए सी ने गौरैया के जीवन को और भी खतरे में डाल दिया है। अगर चिलचिलाती धूप से बचने या भोजन की खोज में गौरैया आपके घरों में आयेगी भी तो पंखे या कूलर से इसके कट जाने का खतरा रहता है।
घर का माहौल भी अब उनके अनुकूल नहीं रहा है। घर में अब महिलाएं न तो गेहूं सुखाती हैं न ही धान कूटती हैं जिससे उन्हें छत पर खाना नहीं मिलता है।अब घरों में टाइल्स का इस्तेमाल ज्यादा होने लगा है।खेती में कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ गया है जिसका असर गौरैया पर पड़ रहा है। गौरेया की घटती संख्या का मुख्य कारण है, भोजन-पानी की कमी और पेड़ों का कटान। बढ़ती मॉडर्न टेक्नोलॉजी ने चिड़ियों का सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है।शहरीकरण के नए दौर में घरों में बगीचों के लिए स्थान नहीं है।पेट्रोल के दहन से निकलने वाला मेथिल नाइट्रेट छोटे कीटों के लिए विनाशकारी होता है, जबकि यही कीट चूजों के खाद्य पदार्थ होते हैं।मोबाइल फोन टावरों से निकलने वाली तरंगों में इतनी क्षमता होती है, जो इनके अंडों को नष्ट कर सकती है।

गौरैया को विलुप्त होने से हम ऐसे बचा सकते हैं
यदि इसके संरक्षण के उचित प्रयास नहीं किए गए तो हो सकता है कि गौरैया इतिहास की चीज बन जाए और भविष्य की पीढ़ियों को यह देखने को ही न मिले। गौरैया को विलुप्त होने से बचाने के लिए हम कुछ छोटे-छोटे प्रयास कर सकते हैं।

गौरैया संरक्षण के उपाय :
ब्रिटेन की रॉयल सोसाइटी ऑफ बर्डस द्वारा विश्व के विभिन्न देशों में किए गए अनुसंधान के आधार पर भारत और कई बड़े देशों में गौरैया को रेड लिस्ट कर दिया गया है जिसका अर्थ है कि यह पक्षी अब पूर्ण रूप से विलुप्ति की कगार पर है। गौरैया संरक्षण के लिए हम यही कर सकते हैं कि अपनी छत पर दाना-पानी रखें, अधिक से अधिक पेड़- पौधे लगाएं, उनके लिए कृत्रिम घोंसलों का निर्माण करें।

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