क्रियाहीन ज्ञान और ज्ञानहीन क्रिया व्यर्थ-मुनि श्री आदित्य सागर

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न्यूज सौजन्य- राजेश जैन दद्दू 

इंदौर। अज्ञानी का कथन, क्रिया, समर्पण, श्रद्धान और परिणमन अज्ञानमय होता है तो वहीं ज्ञानी का परिणमन ज्ञानमय होता है। ज्ञानी के लिए दुनिया में ऐसा कोई कार्य नहीं है जो कठिन हो लेकिन उनके लिए कठिन है जिनकी क्रिया अज्ञान रूप है। क्रिया के साथ ज्ञान भी और भाव भी होना चाहिए, वरना पुण्यफल प्राप्त नहीं होगा।
यह उद्गार बुधवार को समोसरण मंदिर, कंचन बाग में मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने धर्मसभा में व्यक्त किए। आपने कहा कि व्यक्ति आजकल छोटी- छोटी बातों एवं क्रियाओं पर गुस्सा, नाराज हो जाते हैं।आपने उदाहरण देते हुए कहा कि मंदिर जी में रोज प्रातः श्री जी की प्रतिमा का अभिषेक एवं शांति धारा होती है लेकिन किसी दिन कोई श्रद्धालु श्रावक शुद्ध शोले के वस्त्रों में, शुभ भावों के साथ शांति धारा संपन्न होने के पश्चात भगवान का अभिषेक कर ले या चरण स्पर्श कर ले तो लोग नाराज होकर विरोध करने लग जाते हैं और कहते हैं कि शांति धारा के पश्चात अभिषेक करना पाप है। ऐसा कहने वालों से पूछा जाना चाहिए कि आगम में वर्णित पांच प्रकार के पाप हिंसा, झूठ ,चोरी, कुशील और परिग्रह मैं से शांति धारा के पश्चात अभिषेक करना कौन से नंबर का पाप है?
मुनिश्री ने स्पष्ट किया कि शांति धारा के पश्चात अभिषेक करना ना तो पाप की श्रेणी में आता है और ना ही निषेध है क्योंकि शांति धारा भी अभिषेक का ही वृहद रूप है। क्रियाएं विवाद के लिए नहीं होती, अपनी बुद्धि को स्वस्थ रखें और सम्यक आचरण के साथ क्रिया करें। प्रारंभ में मांगलिक क्रियाएं वाशिंगटन डीसी से आईं इंजीनियर श्रीमती मीनल झावेरी, अरुण सेठी और अनिल पांड्या ने संपन्न की। संचालन हंसमुख गांधी ने किया।

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