महान संत के बारे में कुछ लिखना सहज नहीं, पर उनसे जुड़े व्रतांतों से उनके तप, त्याग और संयम की प्रतिमूर्ति होने का पता चलता है…

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श्रीफल के लिए सुरेश सबलावत की कलम से

ऐसे ही आचार्य से जुड़े व्रतांत उनके 33 वें आचार्य पदारोहण दिवस पर साझा किए गए

तीर्थंकर भगवान महावीर की परंपरा के सच्चे निर्वाहक आचार्य वर्धमान सागर जी महाराज का नाम जैन समुदाय में बड़ी श्रद्धा और गौरव के साथ लिया जाता है। भगवान महावीर के बताए मार्ग पर चलकर उन्होंने मुनि के रूप में मिले अपने नाम को सार्थक किया है।

आषाढ़ शुक्ल द्वितीया (24 जून 1990 )को पारसोला में मुनि वर्धमान सागर महाराज का आचार्य पदारोहण हुआ। 33 वाँ आचार्य पदारोहण दिवस कोटा के पास केशवरायपाठन में मनाया गया । राजस्थान के कहि हिस्सो से देशभर से हजारों श्रावक इस पुण्य अवसर का लाभ लेने पहुंचे थें । दिगंबर जैन परम्परा के ऐसे महान संत के बारे में कुछ भी लिखना सहज नहीं हो सकता, लेकिन उनसे जुड़े एक वृतांत को साझा करना चाहूंगा, जिससे पता चलता है कि आचार्य वर्धमान सागर जी तप, त्याग और संयम की प्रतिमूर्ति हैं।

आचार्य वर्धमान सागर महाराज को आचार्य पद देने में एक नहीं दो दो परंपरा के आचार्य की अनुमोदना रही। वे चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शांतिसागर महाराज की परंपरा के पंचम पट्टाधीश हैं।

दिगम्बर जैन समाज की 5-6 बड़ी संस्थाओं के आचार्य अजित सागर महाराज के आदेश का पालन करते हुए वर्धमान सागर महाराज ने आचार्य पद संस्कार की अनुमोदना की और पारसोला में 25 से 30 श्रावकों के बीच आचर्य पुष्पदन्त सागर महाराज ने आचार्य पद के संस्कार की अनुमोदना की ।

“म्हारे संघने तो वर्धमान सम्हाल सके”। सन 1986 के चातुर्मास के समय सीकर में यह बात चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शांतिसागर महाराज की परंपरा के तृतीय पट्टाधीश आचार्य धर्म सागर महाराज ने किशनगढ़ के गुलाबचंद गोधा को तब कही जब गोधा ने यह पूछा कि भविष्य में इतने बड़े संघ को कौन संभालेगा।

मुनि वर्धमान सागर कोई पद स्वीकार करना ही नहीं चाहते थे। आचार्य धर्मसागर महाराज की सामाधि के बाद संघ के साधुओं का 1987 का चातुर्मास किशनगढ़ में हुआ, वहाँ समाज द्वारा मुनि वर्धमान सागर जी को उपाध्याय पद देने को कहा गया, लेकिन मुनिश्री ने मना किया। उसके बाद चतुर्थ पट्टाधीश आचार्य ने पत्र लिख उन्हें अपने पास बुला लिया। वर्ष 1990 में जब आचार्य अजित सागर महाराज का स्वास्थ्य खराब हुआ तब उन्होंने एक पत्र में अपना आचार्य पद मुनि वर्धमान सागर के लिए लिख दिया। जब यह बात संघ और समाज को पता चली तो विवाद के सुर उठे, तब मुनि वर्धमान सागर ने आचार्य अजित सागर महाराज को कहा कि मैं साधक ही ठीक हूं, मुझे साधना में आनंद आता है। मुनि की बात सुनकर आचार्य अजित सागर जी ने सहज और सरल भाव से कहा कि वर्धमान ! मैंने संघ, समाज और परम्परा के हित के लिए ही सोच समझकर निर्णय लिया है।

अजित सागर महाराज के पत्र में क्या लिखा था, वह बात उनकी समाधि की वियानजंलि सभा में ही पता चली, जब महासभा अध्यक्ष निर्मल सेठी ने वह पत्र मुनि वर्धमान सागर महाराज को दिया। मुनि ने वह पत्र मुनि पुण्य सागर महाराज को देने को कहा जब मुनि पुण्य सागर जी ने वह पत्र खोला तो आचार्य पद वर्धमान सागर महाराज को देने की बात पता चली।

आचार्य पद को लेकर निर्मल सेठी ने असम में विराजमान गणिनी आर्यिका सुपार्श्वमति माताजी से पूछा तो उन्होंने कहा कि मेरा ज्योतिष और मैंने तो अपना आचार्य वर्धमान सागर को मान लिया है।

अंततः मुनि वर्धमान सागर जी अपने आचार्य के आदेश का पालन कर आचार्य का पद ग्रहण किया और पूरे संघ को साथ लेकर अपने दायित्व का निर्वहन किया।

वर्धमान सागर जी के प्रति संघ और समाज में अपार श्रद्धा का भाव दर्शाता है कि जो विश्वास आचार्य अजित सागर जी और सुपार्श्वमती माता जी ने व्यक्त किया था, उस विश्वास को कायम रखने में मुनि वर्धमान सफल सिद्ध हुए।

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