मै सिध्द क्षेत्र चैत्य गाँव हूँ

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mai siddha kshetra chaitya gaav hu

मै वह हूँ जिस पर आजतक किसी की कोई मेहरबानी नही हुई क्योंकि में अब पुराना जो हो गया हूँ, बूढ़ा जो हो गया हूँ। मेरे अपनो ने मुझे मेरे सपनों के साथ छोड़ दिया है। मैं अपने आप को कई सालों से असहाय मान रहा हूँ। मुझे तुम्हारे पूर्बजों ने अपनो सपनों के साथ जोड़ा था। मुझे जैनत्व की प्रभावना के लिए छोड़ा था, परंतु क्या पता था उन्हें कि जैन ही मुझसे नाता तोड़ लेेंगे। शहरों में अपने घर और नए मंदिर बनाने लगेंगे। मेरे अपने मुझे यहां अजैनों के हवाले छोड़कर जाते रहे। मैं इतना दु:खी शायद तब भी न हुआ जब मैने मुगलों और कुछ और आक्रांताओं ने मुझ पर हमले किए, लेकिन मैं अपने आपको बचाकर खड़ा रहा क्योंकि तब मेरे अपने मेरे साथ थे। उनके सपने मेरे साथ थे। आज सब अपने-अपने नाम के लिए नए-नए तीर्थो का निर्माण कर रहे हैं और मुझे दुबारा अपनाने से डर रहे हैै। क्या कसूर है मेरा कोई मुझे बताएगा? क्या बिगाड़ा था मैंने तुम सबका कि मैं बूढ़ा हो गया, जंगल में हूँ, तुम जहां रहते हो वहां से दूर हूँ।
इसमें मेरी क्या गलती कि साधना के लिए सभी मुनिजन जंगल में ही रहते थे और मुझ जैसे क्षेत्रों को साधना का केंद्र कहते थे। मैं तो वही हूँ जिसे तुम सबने बनाया था।
सच कहते है कि पत्थर कभी पिघलता नहीं, यही उसकी खूबी है कि वह बदलता नहीं।
परंतु यह मेरी खूबी नही बुराई बन गई है कि मैं बदल नही पाया। इंसानो की तरह मैं शहर की ओर नही भाग पाया। मुनिजन भी शहरों की और चले गए। वही तो मेरे थे। आज मुझ तक कोई नही आता और मैं किसी के यहाँ तक जा नही सकता। एक पागल आया था मेरे पास। उनका साथ कुछ बुद्धजीवियों ने नहीं दिया। जो मुझे उठाने आया था वह आज भी अपने स्तर से यह कार्य कर रहा है। मैं भी उसकी आस से आस लगाए हुए हूँ। शायद कभी वह आप सबको मुझ तक ला सके। उसके प्रयास में मेरी आश है।
मैं ग्वालियर जिले के करैया गाँव से लगभग 8 किमी दूरी पर अपने विशाल इतिहास के साथ आप सबका सदियों से इंतजार कर रहा हूँ और भावना भा रहा हूँ कि वह जीव मुझ तक आप सबको लाने में शायद सफल हो सके। मैं तुम्हारे जिन शासन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हूँ। मैंने अपने यहां से कई मुनियों को सिद्ध होते हुए देखा है। हूँ तो में एक इन्द्रिय फिर भी आपके आने की राह देखता हूँ।
मुझे आस है आप सबसे कि आप सब मेरे पास आएंगे। मैं बूढ़ा नही हूँ यह सबको बताएंगे। हे! मेरे युवाओं मुझे अपना मित्र मानो, मेरे बुजुर्गो! आप भी मुझे अपना साथी मानो। हो सकता है शायद मेरी पुकार आप तक पहुंच जाए। या तो मुझे बिल्कुल ही मिटा जाओ या मुझे अपना बना जाओ। एक बार मुझसे मिलने तो आओ, मुझे भी धैर्य बंधाओ। मैं भी वही हूँ जिसने तुम्हारी कई पीढियां देखी हैं। मेरे सीने में छेद किये जा रहे हैै। लोग मुझे धीरे धीरे मिटा रहे हैं और मेरे अपने मुझ तक अभी भी नहीं आ रहे है। अगर मैंने जिनशासन की सेवा, उसे बचाकर कोई गलती की तो इसमें मेरा कोई दोष नहीं। मुझे तुम्हारे ही पूर्वजों ने यहां बनाया था। मैं तो पत्थर हूँ चल कर आपकी तरह नगर शहर नहीं जा सकता। मेरे जिनशासन के बेटों मैं भी तुम्हारा हूँ। बुजुर्ग हो चुके मेरे साथियो मैं तुम्हारी साधना का सहारा बनने को बैचेन हूँ। मुझे अपनाओ तो सही। जिनशासन की मैं भी अमूल्य धरोहर हूँ। लोगों को समझाओ तो सही। मैं वचन देता हूँ मैं आपकी पीढ़ियों को आपकी गाथाएं सुनाऊंगा कि आपने कैसे मुझ बूढ़े पड़ चुके एक सिद्ध क्षेत्र को जवान किया। मै आप सबका इंतजार कर रहा हूँ।
मुझे भरोसा है आप मेरे अपने हो। मुझे फिर से मेरे अतीत का स्वरूप दिलाओगे। मुझे जिनशासन के बच्चे-बच्चे से आस है। मेरा विनय है कि मेरी आश मत तोड़ना।

मेरी भावना को पढ़ने के लिए आपका बहुत बहुत आभार
धन्यवाद

मेरे जीर्णोद्धार के लिए जरूर जरूर आना
आपका अपना जिनशासन प्रभावक क्षेत्र
सिद्ध क्षेत्र चैत्यगाँव
संपर्क – ब्रह्मरूपी जी
7772837025

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