मन को संयमित रखने के लिए आवश्यक है स्वाध्याय – अनीता महेन्द्र बाकलीवाल

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जिनागम के अनुसार जैन धर्म में गृहस्थ के छह आवश्यक नियम बताए गए हैं। उनमें से एक हैै स्वाध्याय- मन को संयमित रखने के लिए स्वाध्याय बहुत आवश्यक है। स्वाध्याय ज्ञानार्जन के लिए सबसे उत्तम मार्ग है। इससे अज्ञान व अविद्या का आवरण हट कर शास्त्रों का दिव्य ज्ञान प्राप्त होता है। स्वाध्याय मन की मलिनता को साफ कर परमात्मा के निकट जाने का विद्वानों द्वारा बताया गया सर्वोत्तम मार्ग है। अतः प्रत्येक विचारवान व्यक्ति को प्रतिदिन संकल्पपूर्वक सद्ग्रंथों का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए।

आज की नई पीढ़ी में स्वाध्याय की आवश्यकता क्यों?

आज के युवा और बच्चे धर्म को सिर्फ रूढ़िवादी और ढकोसला मानते हैं। इसका कारण यह है कि उन्हें धर्म का यथार्थ स्वरूप तर्क सहित समझाकर, वैज्ञानिक पहलू ध्यान में रखकर, सिद्धांतों की रूपरेखा बताने वाला ज्ञान नहीं मिल पाता। आज के समय में बच्चों पर बढ़ता पढ़ाई का बोझ और समय की कमी की वजह से वे धर्म मार्ग में नहीं लग पाते, इसलिए उनके नैतिक गुणों में कमी आ रही है। बच्चों में नैतिक गुणों का विकास हो, इसलिए उन्हें स्वाध्याय के लिए प्रेरित करना बहुत आवश्यक है। घर के बड़े बुजुर्गों को चाहिए कि बच्चों को अपने साथ बैठाकर उनमें स्वाध्याय की आदत डालें। छोटी-छोटी प्रेरणादायक कहानियां सुनाकर उन्हें स्वाध्याय के लिए प्रेरित किया जा सकता है। साथ ही महापुरूषों, तीर्थंकरों के जीवन का परिचय, उनके सत्कार्यों की जानकारी समय-समय पर बच्चों को बताते रहना चाहिए, ताकि उन्हें जीवन के बारे में सही मार्गदर्शन मिल सके। शिक्षण संस्थाओं में यदि शिक्षक किताबी ज्ञान के अलावा स्वाध्याय के जरिए बच्चों में नैतिक गुण भरने की कोशिश करें तो आज हम बाल अपराध होते देख रहे हैं, उनमें काफी हद तक कमी आ सकती है। स्वाध्याय में चिंतन, मनन और श्रवण का समावेश होना चाहिए। प्रगतिशील और जीवंत समाज के निर्माण के लिए हमें बच्चों में स्वाध्याय का गुण विकसित करना ही होगा।
मनुष्य जीवन का उद्देश्य सिर्फ आर्थिक उन्नति करना ही नहीं है बल्कि शारीरिक उन्नति कर बौद्धिक व अध्यात्मिक उन्नति करना भी है। शारीरिक उन्नति तो अच्छे व्यायाम और अच्छे भोजन से हो जाती है, लेकिन बौद्धिक उन्नति के लिए अच्छे संस्कारों की जरूरत होती है। अच्छे संस्कार भी माता-पिता, गुरू-आचार्य आदि से मिल जाते हैं, लेकिन ज्ञान की प्राप्ति आचार्य व माता-पिता के साथ-साथ स्वाध्याय के द्वारा ही हो सकती है। आजकल हमारे देश में स्कूलों में जो शिक्षा दी जाती है, उसमें संस्कारों पर नाम मात्र का ध्यान दिया जाता है। उन्हें सिर्फ एकांगी ज्ञान का अध्ययन कराया जाता है। उनके अध्ययन में आध्यात्मिक व सामाजिक ज्ञान तो होता ही नहीं है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि बच्चों को धार्मिक शिक्षण संस्थाओं से जोड़ा जाए और बच्चों को ऐसी पाठशालाओं में भेजा जाए जहां धार्मिक शिक्षा भी प्राप्त हो और उनमें स्वाध्याय का गुण विकसित हो।

स्वाध्याय से बच्चों को लाभ –

स्वाध्याय का अर्थ है “स्व-अध्ययन“। स्व-अध्ययन का गुण यदि बच्चों में विकसित हो जाएगा तो आज की ट्यूशन प्रधान और तोता रटंत विद्या से उन्हें मुक्ति मिल जाएगी, क्योंकि प्रतिदिन स्वाध्याय करने से बुद्धि बहुत ही तीव्र हो जाती है तथा कठिन से कठिन विषय भी तुरंत समझ में आ जाता है। व्यक्ति प्रकृति के रहस्यों को स्वतः ही जानने लगता है।

कुल मिलाकर इतना ही कहना है कि आज की युवा और बच्चों को भटकने से रोकने के लिए हमें बच्चों में स्वाध्याय करने का गुण विकसित करना ही होगा। जो स्वाध्याय करते है, उनका मन हमेशा प्रसन्नचित्त और शांत रहता है। स्वाध्याय से ज्ञानवर्धन होता है जिससे धर्म व संस्कृति की रक्षा व सेवा हो सकती है।

जय जिनेन्द्र

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