मोक्ष महल का द्वार है दीक्षा -अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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  • प्रकृति के अनुसार रहना ही मुनि दीक्षा
  • धर्म प्रभावना और आत्म कल्याण से मोक्ष का द्वार है दीक्षा

जैन धर्म में संन्यास को दीक्षा कहा है। पुरुष की दीक्षा में तीन क्रम होते हैं, जो क्रमश: क्षुल्लक, ऐलक और मुनि हैं। मुनि अवस्था में पूरा दिगम्बर होना होता है यानी तन पर एक भी वस्त्र नहीं होता। वहीं क्षुल्लक अवस्था एक लंगोट और लूप्टा होता है और ऐलक अवस्था में केवल लंगोट होती है। जहां तक भोजन की बात है तो ये तीनों ही अवस्था मे 24 घंटे में एक बार भोजन करते हैं। एक मुनि खड़े-खड़े हाथ में, ऐलक बैठ कर हाथ में और क्षुल्लक बैठकर कटोरे में आहार लेता है। जरूरी नहीं कि एक व्यक्ति की दीक्षा क्रम से हो यानी वह सीधे मुनि भी बन सकता है। यह निर्णय वह गुरु करता है, जिसे दीक्षा देना होती है।

मूल गुण और उत्तम गुण
मुनि दीक्षा के बाद 28 मूलगुण, आचार्य 36 मूलगुण और उपाध्याय 25 मूलगुण का पालन करते हैं। मूलगुण का तात्पर्य है नियम, जिनका पालन करना अनिवार्य है। इसके अलावा और अनेक नियम होते हैं, जिन्हें उत्तर गुण कहा जाता है। मुनि, आचार्य और उपाध्याय के कार्य का विभाजन भी शास्त्रों में किया गया है लेकिन अभी वर्तमान में मुनि भी दीक्षा-शिक्षा देते हैं।

क्या हैं मूल गुण
एक समय खाना, जमीन पर सोना, हाथ में खाना, सिर और मूंछ के बाल हाथ से उखाड़ना यानी केशलोचन, किसी भी प्रकार का परिग्रह नहीं रखना, पैदल विहार करना (चलना), स्वाध्याय, भक्ति, उपवास आदि इस तरह से 28 मूलगुण या नियम का पालन करते हैं। यह सब करने का मतलब यही है कि एक मुनि किसी से किसी प्रकार की याचना नहीं करता। जो उसे प्रकृति से मिलता है, उसे वह स्वीकार करता है। कुल मिलाकर मुनि दीक्षा का मतलब है प्रकृति के अनुसार रहना।

दीक्षा के बाद पठन-पाठन
दीक्षा लेने के पहले वह जितना चाहे लौकिक पढ़ाई कर सकता है लेकिन दीक्षा के बाद वह धार्मिक पढ़ाई ही कर सकता है। दीक्षा का उद्देश्य आत्मकल्याण है। दीक्षा के बाद मुनि त्याग, साधना, संयम, तप के माध्यम से आत्म साधना करते हैं। मौन पूर्वक अपने किए पाप कर्मों को प्रति ग्लानि करते हैं। दीक्षा के बाद इसलिए भी नहीं पढ़ाया जाता है क्योंकि आत्मिक साधना में डिग्री की नहीं, अनुभव की आवश्यकता होती है। इसलिए तो हम जिसे प्रभु मानते हैं, उसकी डिग्री का पता नहीं पर उनके चरित्र-व्यवहार के बारे में शास्त्र में लिखा है और उसी से हमारी श्रद्धा और आस्था बनती है धर्म और मुनियों पर।

नहीं छोड़ सकते दीक्षा
दीक्षा लेने के बाद शास्त्रों के अनुसार दीक्षा को नहीं छोड़ जा सकता है। हां, दीक्षा में दोष लग जाने पर प्राश्यचित करने का प्रावधान है। प्राश्चयित देने का अधिकार गुरु को होता है। स्वास्थ्य खराब हो जाए या अन्य किसी कारणवश मुनि चर्या का पालन नहीं हो पा रहा है तो समाधिमरण करने का प्रावधान है।

कब ले सकते हैं दीक्षा
जैन शास्त्रों के अनुसार 8 साल की उम्र के बाद कोई भी बालक या बालिक धर्म मार्ग पर चलने का अधिकारी हो जाता है। उससे पहले बालक को धर्म के मार्ग पर लगाने के लिए संस्कारित करना और प्रेरणा देने का काम माता-पिता का होता है। प्राचीन समय में 12-13 की उम्र में दीक्षा का वर्णन शास्त्र में है। दिवंगत मुनि तरुण सागर की दीक्षा 13-14 साल की उम्र में होने का प्रमाण है।

दीक्षा पश्चात कर्म
दीक्षा के बाद इंसान आत्म कल्याण के अलावा और कुछ करने का अधिकारी नहीं होता। आत्म साधना से दीक्षा सफलता को प्राप्त होती है और दीक्षा लेने का उद्देश्य भी सार्थक होता है। वास्तव में दीक्षा लेने वाले का पहला काम आत्म साधना है। उसके बाद वह त्याग, तप और संयम के द्वारा धर्म प्रभावना करे, अन्य लोगों का आत्म कल्याण की भावना से उपदेश(प्रवचन) दे। मुनि दीक्षा में आचार्य, उपाध्याय पद होते हैं। आचार्य का काम दीक्षा-शिक्षा और प्राश्चयित देने का होता है। उपाध्याय का काम शिक्षा देने का होता है और मुनि का काम ज्ञान, ध्यान और तप में लीन होने का है।

स्त्री दीक्षा
स्त्री जब दीक्षा लेती है तो उसमें क्रम से क्षुल्लिका और आर्यिका, ये दो ही अवस्था होती हैं। वह सफेद साड़ी पहनती है और बैठ कर आहार ग्रहण करती हैं। आर्यिका हाथ और क्षुल्लिका कटोरे में खाती है। पुरुष दीक्षा की तरह स्त्री दीक्षा भी क्रम से होने का कोई नियम नहीं है। आर्यिका की भी वही चर्या होती है, जो मुनि की होती है।

नग्न चर्या का महत्व
मुनि नग्न इसलिए ही होते हैं क्योकि प्रकृति में जब जन्म हुआ था, तो कोई भी जीव नग्न अवस्था में ही होता है। जैसे उसे कर्म ने संसार में भेजा, वह वैसा ही रहा। जैसे मुनि प्रकृति के पेड़ की छाया, हवा, जल आदि का उपयोग कर अपनी दिनचर्या का पालन करते हैं, उसी तरह मुनि से सभी अपनी आत्म कल्याण की बात पूछ सकते हैं। मुनि किसी एक धर्म या जाति का नहीं, उन सबका होता है जो आत्मकल्याण की भावना रखते हैं।

दीक्षा की सार्थकता
दीक्षा लेना तभी सार्थक तभी हो सकता है, जब दीक्षा लेने वाला आत्म साधना में अपने आप को लगा ले। आत्म साधना से धर्म की प्रभावना वह करे और मुनि के आचरण का प्रचार-प्रसार करे ताकि श्रावण भी धर्म के मार्ग पर चलें। कहने का मतलब है कि साधना मुनि करे और उसकी प्रभावना उनका भक्त करे, तभी धर्म की प्रभावना संभव है। आत्म प्रभावना के बिना धर्म प्रभावना नहीं हो सकती।

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