मुनि श्री क्षमासागर जी ने दिखाई थी समाज और युवा वर्ग को नई दिशा

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• मुनि श्री क्षमासागर जी का समाधि दिवस मनाया
• मुनिश्री का अवदान अविस्मरणीय

 

 

ललितपुर। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि श्री 108 क्षमासागर जी महाराज के समाधि दिवस 13 मार्च पर रविवार को आचार्य विद्यासागर युवा मंच बुंदेलखंड के तत्वावधान में वर्चुअल के माध्यम मनाया गया। जिसमें मुनिश्री को श्रद्धांजलि दी गयी तथा उनके अवदान को रेखांकित किया गया।
आचार्य श्री विद्यासागर युवा मंच बुंदेलखंड के निदेशक डॉ. सुनील संचय ललितपुर ने कहा कि
पूज्य मुनि श्री क्षमासागर जी के अनुशासन से परिपूर्ण संवेदनशील गहन व्यक्तित्व ने समाज के सभी वर्ग के लोगों पर एक अमिट छाप छोड़ी है। विशेष रुप से आज की युवा पीढ़ी के लिए मुनिश्री एक आदर्श मार्गदर्शक, प्रेरणा के स्त्रोत्र एवं पितातुल्य वात्सल्य की प्रतिमूर्ति थे । ‘कर्म कैसे करें उनकी’ उनकी कृति प्रत्येक वर्ग के व्यक्ति के लिए उपयोगी है।
वरिष्ठ समाजसेवी राजेश रागी बक्सवाहा ने कहा कि मुनिश्री ने युवा वर्ग को अनुशासित किया साथ ही कर्म सिद्धान्त, शंका समाधान के माध्यम से समाज को जाग्रत किया, नयी रोशनी दी काव्य ह्रदय मुनि श्री क्षमासागर जी महाराज सचमुच क्षमा की मूर्ति थे उनका वात्सलय सदा अक्षुण्ण रहेगा।
संयोजक मनीष विद्यार्थी शाहगढ़ ने कहा कि मुनि श्री क्षमासागर महाराज की प्रेरणा से प्रतिवर्ष देश के 10वीं एवं 12वीं कक्षा के मेधावी बच्चों को सम्मानित करने के लिए राष्ट्रीय यंग जैना अवार्ड का प्रतिष्ठित आयोजन किया जाता है। मुनिश्री का यह अभूतपूर्व आयोजन नए मानक गढ़ रहा है।
अनिल शास्त्री गुढ़ा ने कहा कि मुनि श्री क्षमासागर महाराज ने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपनी कठिन मुनिचर्या का पालन किया और सल्लेखनापूर्वक समाधि धारण की।
चेतन शास्त्री बंडा ने कहा कि ने कहा कि
मुनिश्री ने लोगों को जीवन जीने की कला सिखाई।
उनकी लघुकाय कविताएं गहन अर्थ रखती हैं।आयोजन दीप प्रज्वलन और मंगलाचरण पूर्वक शुरू हुआ। वक्ताओं ने भावभीनी विनयांजलि समर्पित की।
वक्ताओं ने कहा कि मुनिश्री अपने प्रेरक, मार्मिक प्रवचनों में कहते थे कि -जीवन को अच्छा बनाने के लिए ललक हर व्यक्ति में होती है और हर व्यक्ति विभिन्न क्रियाओं के माध्यम से इस दिशा में प्रयत्न भी करता है, परंतु वाह्य क्रियाओं के साथ-साथ हमारा ध्यान अपने आत्मा के विकास एवं व्यक्तित्व को अच्छा बनाने पर हो तो वाह्य क्रियाएं अपने आप ही व्यवस्थित हो जाती हैं।

रिपोटिंग- सुनील जैन “संचय”,ललितपुर

 

 

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