वास्तु सलाहः पढ़ाई में बच्चे की सफलता की गारंटी – तृष्टि जैन

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शिक्षा का जीवन में बहुत अधिक महत्व है। शास्त्रों में लिखा है-साहित्य, कला से विहीन मनुष्य पशु के समान होता है।  शिक्षा व्यक्ति के सम्पूर्ण चरित्र का निर्माण करती है, इसलिए हर अभिवावक अपने बच्चे की शिक्षा पर विशेष बल देता है। रुचिकर तथ्य यह है कि वास्तु सलाहकारों का दावा है कि छात्र जिस दिशा में बैठकर अध्ययन करता है, वह भी उसके परीक्षा परिणामों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि वास्तुशास्त्र का पालन किया जाए तो इससे बच्चे को पूरी एकाग्रता के साथ अध्ययन करने में मदद मिलती है और यह अच्छे अंक प्राप्त करने में मदद कर सकता है। माता-पिता को शायद ही यह एहसास होता है कि जिस वातावरण में बच्चा रहता है, उसमें कोई गलती हो सकती है। वास्तु शास्त्र के अनुसार विद्याध्ययन के लिए कक्ष कैसा होना चाहिए, उसी विषय पर यह संकलन प्रस्तुत है।

छिपी क्षमताओं की खोज के लिए सरल सुझाव

  • विद्याध्ययन में वास्तुशास्त्र का व्यापक महत्व है। विद्या का अध्ययन जीवन को सफल बनाने के लिए किया जाता है। अध्ययन कक्ष कैसा है, इसका प्रभाव लाभार्थी पर पड़ता है। वास्तुशास्त्र के अनुसार अध्ययन कक्ष को भवन के पश्चिम-मध्य क्षेत्र में बनाना अतिलाभप्रद है। इस दिशा में बुध, गुरु, चंद्र एवं शुक्र चार ग्रहों का उत्तम प्रभाव होता है। इस दिशा के कक्ष में अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों को बुध ग्रह से बुद्धि वृद्धि, गुरु ग्रह से महत्वाकांक्षा एवं जिज्ञासा वृद्धि, चंद्र ग्रह से नवीन विचारों की वृद्धि और शुक्र ग्रह से प्रतिभा एवं लेखन कला में निपुणता और धन की वृद्धि होती है।
  • अध्ययन कक्ष में विद्यार्थी की टेबुल पूर्व-उत्तर ईशान या पश्चिम में रहनी चाहिए। दक्षिण आग्नेय व नैऋत्य या उत्तर- वायव्य में नहीं होना चाहिए।
  • अध्ययन कक्ष में खिड़की या रोशनदान का पूर्व-उत्तर या पश्चिम में होना श्रेष्ठ है। दक्षिण दिशा में इसका होना ठीक नहीं है।
  • अध्ययन कक्ष में शौचालय कदापि नहीं बनाएं।
  • अध्ययन कक्ष की दीवारों पर रंग संयोजना सफेद, बादामी, फीका, आसमानी या हल्केे फिरोजी रंग की श्रेष्ठ है। काला, लाल, गहरा नीला रंग कमरे में नहीं होना चाहिए।
  • अध्ययन कक्ष में किताबों की अलमारी को पूर्व या उत्तर दिशा में बनाएं तथा उसकी सप्ताह में एक बार साफ-सफाई अवश्य करनी चाहिए। अलमारी में गणेशजी की फोटो लगाकर नित्य पूजा करनी चाहिए।

विद्यारम्भ संस्कार मुहूर्त की गणना
मनुष्य जीवन में जितना महत्व विद्या को दिया गया है, उतना ही महत्व विद्यारम्भ संस्कार का भी है। उससे भी अधिक महत्ता होती है, विद्यारम्भ संस्कार के शुभ मुहूर्त की। माना गया है कि जब भी बच्चे के अंदर शिक्षा और ज्ञान ग्रहण करने की चेतना का विकास होने लगे, तभी इस संस्कार को किया जाना शुभ होता है। सामान्यतः शिशु के जन्म से 5 वर्ष की आयु में इस संस्कार को किया जाता है। हालांकि विद्यारम्भ संस्कार के शुभ मुहूर्त की गणना के लिए, बच्चे की कुंडली अनुसार शुभ तिथि, नक्षत्र, वार और पवित्र माह का आंकलन करना अनिवार्य होता है।
*माना गया है कि इस संस्कार के लिए विशेष रूप से चैत्र-वैशाख शुक्ल तृतीया, माघ शुक्ल सप्तमी तथा फाल्गुन शुक्ल तृतीया उचित होती है। साथ ही दिनों में रविवार, सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार बेहद उत्तम दिन माने गए हैं।
*नक्षत्रों में अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, अभिजीत, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती नक्षत्र बेहद अनुकूल हैं।

  • वृषभ, मिथुन, सिंह, कन्या और धनु लग्न को, विद्यारम्भ संस्कार के लिए सबसे अधिक शुभ माना जाता है।
  • इस संस्कार को कभी भी चतुर्दशी, अमावस्या, प्रतिपदा, अष्टमी, सूर्य संक्रांति के दिन नहीं किया जाना चाहिए।
    *पौष, माघ और फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली अष्टमी तिथि के दौरान भी, इस संस्कार को करना निषेध माना गया है।

अधिक रात तक न पढ़ें विद्यार्थी
विद्यार्थियों को रात में आधिक देर तक नहीं पढ़ना चाहिए क्योंकि इससे तनाव, चिड़चिड़ापन, क्रोध, दृष्टि दोष, पेट रोग आदि समस्याएं होने की प्रबल आशंका रहती है। ब्रह्ममुहूर्त या प्रातःकाल में 4 घन्टे अध्ययन करना रात्रि के 10 घन्टे के बराबर होता है। वजह यह कि प्रातःकाल में स्वच्छ एवं सकारात्मक ऊर्जा संचरण होती है जिससे मन व तन दोनों स्वस्थ रहते हैं।

हल्के रंग का पेंट हो अध्ययन कक्ष में

  • अध्ययन कक्ष में हल्के रंगों का प्रयोग करें। जैसे- हल्का पीला, गुलाबी, आसमानी, हल्का हरा आदि।
  • पढ़ने वाली टेबुल को दीवार से सटाकर न रखें। पढ़ते वक्त रीढ़ को हमेशा सीधा रखें। लेटकर या झुककर नहीं पढ़ना चाहिए। पढ़ने की सामग्री आंखों से लगभग एक फीट की दूरी पर रखनी चाहिए।

ज्योतिष
परीक्षा के अनुसार हो अध्ययन कक्ष
अध्ययन कक्ष में इस प्रकार की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि बच्चों का पढ़ाई के प्रति रुझान बढ़े एवं मन एकाग्र होकर अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित हो सके।

  • बीएड, प्रशासनिक सेवा, रेलवे, आदि की तैयारी करने वाले छात्रों का अध्ययन कक्ष पूर्व दिशा में होना चाहिए क्योंकि सूर्य सरकार एवं उच्च पद का कारक तथा पूर्व दिशा का स्वामी है।
    *बी-टेक, डाक्टरी, पत्रकारिता, लॉ, एमसीए, बीसीए आदि की शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों का अध्ययन कक्ष दक्षिण दिशा में होना चाहिए तथा पढ़ने वाली मेज आग्नेय कोण में रखनी चाहिए। वजह, मंगल अग्नि कारक ग्रह है एवं दक्षिण दिशा का स्वामी है।
  • एमबीए, एकाउन्ट, संगीत, गायन और बैंक आदि की तैयारी करने वाले छात्रों का अध्ययन कक्ष उत्तर दिशा में होना चाहिए क्योंकि बुध वाणी एवं गणित का संकेतक है एवं उत्तर दिशा का प्रतिनिधित्व करता है।
  • रिसर्च तथा गंभीर विषयों का अध्ययन करने वाले छात्रों का अध्ययन कक्ष पश्चिम दिशा में होना चाहिए क्योंकि शनि खोजी एवं गंभीर ग्रह है तथा पश्चिम दिशा का स्वामी है।

अध्ययन कक्ष में क्या होना चाहिए और क्या नहीं?

*अध्ययन कक्ष में अभ्यास पुस्तकें रखने की रेक एवं टेबल उत्तर दिशा की दीवार से लगी होना चाहिए।
*अध्ययन कक्ष में पेयजल, मंदिर, घड़ी उत्तर या पूर्व दिशा में रखना चाहिए।
*टीवी, मैगजीन, अश्लील साहित्य व सीडी प्लेयर एवं वीडियो गेम, रद्दी अखबार, अनुपयोगी सामान एवं भारी वस्तुएं न रखें।
*आदर्शवादी चित्र, सरस्वती माता एवं गुरुजनों के चित्र लगाना चाहिए।
*अध्ययन कक्ष में शयन नहीं करें।
*युद्ध, लड़ाई-झगड़े, हिंसक पशु-पक्षियों के चित्र व मूर्तियां नहीं रखनी चाहिए।
*अध्ययन कक्ष को अन्य कक्षों के जमीनी तल से ऊंचा या नीचा नहीं रखें। तल का ढाल पूर्व या उत्तर की ओर रखा जाए।
*कक्ष में केवल ध्यान, अध्यात्म वाचन, चर्चा एवं अध्ययन ही करना चाहिए। गपशप, भोग-विलास की चर्चा एवं अश्लील हरकतें नहीं करनी चाहिए।
*अध्ययन कक्ष में जूते-चप्पल, मोजे पहनकर प्रवेश नहीं करना चाहिए।

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