परम वात्सल्य के धनी थे आचार्य विमलसागर जी महाराज -आचार्य श्री सुन्दर सागर महाराज

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बांसवाड़ा । जिन शासन में जो जन्म ले लेता है वह चाहता है कि मैं अपने जीवन का कल्याण करूं। ऐसे जिनशासन में महावीर स्वामी के गणधर हुए। इसके बाद आचार्य कुंदकुंद स्वामी आदि ने धर्म प्रभावना की। जिस दिन मुनि मुद्रा का विनाश हो जाएगा उस दिन त्राहि-त्राहि मच जाएगी। भारत का सौभाग्य है कि यहां साधु संत हैं। भारत की धरा पर ऐसे अनेक साधु संत हुए हैं, जिन्होंने अपने आचरण, तप, साधना से महती धर्म प्रभावना की है। जो महान व्रतों का पालन करते हैं, वे बडभागी होते हैं।
आज आषाढ कृष्णा सप्तमी ऐसे मुनिराज का दिन है कि आज वे ना होते तो जिन शासन की इतनी प्रभावना  ना होती। भद्र बाहु स्वामी को निमित्त ज्ञान था और उनके बाद आचार्य विमल सागर जी को ऐसा श्रुत ज्ञान था कि बैठे-बैठे आपका पूरा जीवन चरित्र बता देते थे। वे ऐटा जिले के कोसमा में जन्में। माता का नाम कटोरी देवी था। कटोरी ने सागर को जन्म दिया। उस सागर ने पूरे भारत में धूम मचा दी। उनके बचपन का नाम नेमीचद्रं था। चंद्र मतलब चंदाप्रभु। आचार्य विमल सागर के मन में सोनागिरी बसा था। नंगानंग की प्रतिमा का अनावरण आचार्य विमल सागर जी ने किया। सम्मदेशिखर जी में मंदिर भी उनकी ही देन हैं। जन्म के छह माह में ही मां का स्वर्गवास हो गया। बुआ दुर्गादेवी ने प्रण लिया कि मैं इस बालक का पालन-पोषण करूंगी। मुरैना में पढे भी और पढाया भी। शास्त्रों का ज्ञान भी लिया।
प्रतिदिन साइकिल से व्यापार करते थे। कोसमा से बीस किलोमीटर जाते थे। आचार्य शांतिसागर जी फिरोजाबाद पधारे। उनसे मिलने की इच्छा की। नंगे पैर निकल लिए। साथ में थोडी सी मक्का, मूंगफली के दाने डाल लिए। फिरोजाबाद पहुंच तो आचार्य शांतिसागर जी महाराज प्रवचन दे रहे थे। सबको नियम दे रहे थे।
उन्होंने आचार्य श्री से कहा कि जनेउ पहना दो। उन्होंने उन्हे सात मुनिराजों के पास भेज दिया। किसी ने पहनाई नहीं। वापस शांतिसागर के पास पहुंचे। वे परीक्षा ले रहे थे। इससे पता चलता है कि जनेउ पहनाने के संस्कार पहले से थे। जिस समय विद्याधर थे, वे देशभूशण जी महाराज के पास गए। आचार्य श्री बोले यह बालक भविष्य में जिन शासन की बहुत प्रभावना करेगा। उन्होंने सम्मेदशिखर जी यात्रा साइकिल से की। पूरे भारत की तीन बार वंदना की। णमोकार मंत्र की सिद्धी थी। आचार्य कल्पचंद्र सागर जी से शुद्ध जल का नियम और सात प्रतिमा ले ली। चारों अनुयोगों के पाठी थे। धीरे-धीरे दीक्षा मार्ग पर बढ रहे थे। आचार्य महावीरकीर्ति महाराज से बावनी में 1950 में दीक्षा ले ली।
सोनागिरी में आचर्य वीर सागर जी महाराज आचार्य, महावीरकीर्ति महाराज थे। जैसे ही पता चला वहां वीर सागरजी महाराज विराजमान हैं, उन्हें आनंद आ गया। वहां पहुंच कर महाराज के चरणों में वंदना की और कहा कि आप आचार्य परमेष्ठी हा,े दीक्षा दो। महावीरकीर्ति से कहा कि मेरे संस्कार दोनों महाराज करेंगे। इस तरह विमल में “वि“ हुआ वीर सागर जी का और “म“ हुआ महावीरकीर्तिजी का।
आचर्य विमल सागर वात्सलय के धनी थे। क्षुल्लक, आर्यिका सबके लिए वात्सलय था। उन्होने पूरे जीवन मे ंसाढे पांच हजार उपवास किए। निमित्त ज्ञान के धारी थे। आपका चेहरा देख कर पूरा इतिहास बता देते थे। जो बोल दिया वही सच हो गया। जिस श्रीफल मिला, वह करोडपति हो गया। सोनागिरी में छह चातुर्मास किए। सम्मेद शिखर जी में तीन चातुर्मास किए। लगभग सौ मुनि, आर्यिका, क्षुल्लक बनाए। उनके साथ ही आचार्य भरतसागर जी भी थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन उन्हें समर्पित कर दिया। जब जन्म जयती मनती थी तो पांव रखने की भी जगह नहीं होती थी। ऐसे विमलसागर जी के चरणों में हमारा शत-शत प्रणाम।

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