पीछी में सोने-चाँदी की राखियाँ, वीतरागता या शिथिलाचार? – भावलिंगी संत श्रमणाचार्य विमर्शसागर मुनि

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रक्षाबंधन पर्व पर विशेष……………….

रक्षाबंधन पर्व सिद्धांत की प्रयोगशाला में आचरण का शंखनाद है। जिनागम में सम्यक्त्वाचरण एवं संयमाचरण के जो सिद्धांत प्रतिपादित हैं, उनके परिप्रेक्ष्य में मुनि विष्णुकुमार और आचार्य अकंपनस्वामी आदि मुनिराज आचरण के प्रस्तोता हैं। सहज शुद्ध ज्ञायक भगवान आत्मा में गुप्त, शुद्ध चिदानन्द रस का पान करनेवाले परम वीतरागी, इन दिगम्बर संतों ने जिनागम कथित दृढ़ श्रद्धा, तप, त्यागमय आचरण को जगत् में प्रसिद्ध किया है।

जिनागमानुसार चर्या का पालन करने वाले आचार्य अकंपन स्वामी के संघ पर घोर उपसर्ग होता जानकर मुनिवर विष्णुकुमार ने अपनी श्रेष्ठ साधना के फल से प्राप्त विक्रिया ऋद्धि के द्वारा उपसर्ग निवारण कर जो परस्पर साधु वात्सल्य का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया, वही रक्षाबंधन पर्व के रूप में विख्यात हुआ है। वर्तमान में सम्पूर्ण श्रमणसंघ एवं श्रावकों के लिए अत्यन्त प्रेरणास्पद है।

रक्षाबंधन पर्व कैसे मनायें –

जैन शास्त्रों के अनुसार, रक्षाबंधन विशुद्ध धार्मिक पर्व है। इस दिन श्रमण संघ में आचार्य अकंपन स्वामी एवं विष्णुकुमार मुनिराज का गुणानुवाद हो। श्रमणाचार की चर्चा-वार्ता हो एवं सम्पूर्ण श्रमणसंघ समुदाय के प्रति वात्सल्य धर्म का पालन करने का संकल्प मुखरित हो। श्रावक समुदाय इस दिन नित्य पूजा अर्चा के साथ रक्षाबंधन पर्व की पूजा करे। धर्म एवं धर्मायतनों की रक्षा करने का संकल्प दुहरावें। संत, पंथ, जातिवाद की दीवारो में न बँधकर विष्णुकुमार मुनि के आचरण को आदर्श मानकर संतवाद-पंथवाद के भेदभाव को न रखकर जिनमुद्रा एवं जिनायतन की रक्षा का संकल्प करें। तभी कलाई पर बाँधी गई मंदिर की राखी सार्थक हो सकेगी। साथ ही पारिवारिक एवं सामाजिक रीतियों का यथोचित रीति से पालन करें। भाई-बहिन के पवित्र बंधन का रिश्ता ईमानदारी से निभायें।

रक्षाबंधन पर्व और शिथिलाचार

सकल परिग्रह के त्यागी निग्र्रंथ वीतरागी मुनि निश्चय-व्यवहार धर्म में स्थित होकर शुद्ध चारित्र एवं शुभचारित्र का पालन करते हैं। शाश्वत एवं घटनात्मक पर्व के दिनों में आत्मा को पवित्र करने वाली क्रियायें ही करते हैं किन्तु गृहस्थोचित अप्रशस्त क्रियायें नहीं करते। पारिवारिक एवं सामाजिक परंपराओं का निर्वाह नहीं करते अपितु जिनागमानुसार अपनी चर्या का निर्वाह पालन कर सुखी होते हैं।

किन्तु वर्तमान में श्रमण संघ गृहस्थोचित, पारिवारिक अप्रशस्त क्रियाओं में लीन होते जा रहे हैं। जिनागमानुसार चर्या की प्रतिज्ञा करने वाले साधु रक्षाबंधन पर्व के दिन वीतराग धर्म क्रिया को छोड़कर गृहस्थोचित सरागक्रिया में प्रसन्न हो रहे हैं। यह बड़ा आश्चर्य पैदा करता है।

तिल तुष मात्र परिग्रह से रहित, आत्मस्वभाव में रमणता की भावना करनेवाले निग्र्र्रंथ श्रमण की संयमोपकरण पिच्छिका में असंयमी गृहस्थ स्त्री-पुरूष लाखों रूपयों की बोली लगाकर सोने-चाँदी की प्रथम राखी बाँधने का धर्म विरूद्ध कार्य करते हैं। इस क्रिया से श्रमण का स्वरूप नष्ट होता है। साधुजन इस बंधन से अप्रशस्त सरागभाव को प्राप्त हो जाते हैं। साथ ही श्रावक भी महान पाप का बंध करते हैं।

भाई-बहन का पवित्र बंधन गृहस्थों में तो देखा जा सकता है किन्तु साधुपद में तो इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। साधुजन स्त्रीवर्ग में बहिन की दृष्टि तो रखते हैं किन्तु स्वयं भाई के बंधन में अथवा स्त्रीवर्ग को बहिन के बंधन में बाँध नहीं सकते। साधुजन, भैया-बहिन ऐसा वचन व्यवहार करते हुये भी बंधन रहित होते हैं यही साधना में विवेक है।

*वास्तव में वीतरागी साधु की पीछी में राखी बाँधना नियोजित एवं स्वीकृत शिथिलाचार है, इसका संबंध हीन संहनन से भी नहीं है। कदाचित् पंचमकाल में हीन संहनन होने से अपवाद मार्ग जो मूल स्वरूप को नष्ट नहीं करता, माना भी जा सकता हैं, किन्तु पीछी में राखी बाँधना-बँधवाना श्रमण स्वरूप का नाशक है।*

कोई कहे कि राखी तो गुरु-शिष्य के भाव से बाँधते हैं न कि भाई-बहिन के? समाधान यह है कि जिस क्रिया से वीतरागी गुरू की वीतरागधर्म रूप परिणति नष्ट होती हो ऐसी धर्मनाशक क्रिया शिष्य के भाव से कहाँ तक उचित है। अनुचित ही है। गुरू-शिष्य के बीच तो श्रद्धा का बंधन होता है। दोषात्मक क्रिया नहीं। वास्तव में मुनिव्रत के शुद्ध परिणाम कितने कठिन हैं इसके विषय में कवि ने कहा भी है –

उत्तम देष सुसंगति दुर्लभ, श्रावक कुल पाना।
दुर्लभ सम्यक् दुर्लभ संयम,पंचम गुण ठाना।।
दुर्लभ रत्नत्रय आराधन , दीक्षा का धरना।
दुर्लभ मुनिवर को व्रत पालन,शुद्ध भाव करना।।

अर्थात उत्तमदेष, सुसंगति, श्रावक कुल में जन्म, सम्यग्दर्षन, देष संयम रूप पंचम गुणस्थान, रत्नत्रय दीक्षा, चर्तुविध, आराधना, मुनिव्रत का निर्दोष पालन और व्रत पालन करते शुद्ध भाव की प्राप्ति क्रमशः अत्यन्त दुर्लभ है।

*आशा करता हूँ, चतुर्विध श्रमण संघ ख्याति-पूजा की भावना को छोड़कर निज वीतराग स्वभाव की रक्षा करेंगे और राखीरूपी महा परिग्रह के बढ़ते शिथिलाचार को अपनी चर्या में स्वीकार नहीं करेंगे।

(प्रस्तुति-अंकित जैन)

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