प्रकृति का सम्मान करो, प्रकृति भी वैसा ही करेगीः मुनि श्री सुधासागर जी

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  • मुनि श्री के पाद प्रक्षालन की लगी श्रद्धालुओं में होड़
  • क्षेत्रपाल जी की धर्मसभा में हजारों श्रद्धालु जुटे

न्यूज़ सौजन्य- राजीव सिंघई मोनू

 

ललितपुर। धर्मप्राण नगरी में धर्म की बयार आ गई है। आचार्य श्री विघा सागर जी महाराज के आशीर्वाद एवं श्री दिगम्बर जैन समाज पंचायत समिति के नवदा भक्ति पूर्वक निवेदन से मुनि श्री सुधा सागर ससंघ के पावन वर्षा योग से नगर के श्रद्धालुगण श्री जैन मंदिर क्षेत्र पाल जी में सुबह, दोपहर और शाम मुनि श्री का मंगल सान्निध्य पा रहे हैं। जो भक्त आने से रह जाते हैं, वह विभिन्न जैन टीवी चैनलों पर मुनि श्री के अमृतमयी प्रवचनों का रस- स्वाद को आत्मसात कर रहे हैं।

नगर के अति प्राचीन श्री दिगम्बर जैन अतिशय जैन क्षेत्र, तीर्थोंदय श्री अभिनंदनोदय, क्षेत्रपाल जी की धर्मसभा में हजारों श्रद्धालुओं को सम्बोधित करते हुए निर्यापक मुनि श्री सुधा सागर जी महाराज ने कहा कि तुम प्रकृति का सम्मान करोगे तो प्रकृति तुम्हारा सम्मान करेगी। जल, वायु ,वनस्पति, पृथ्वी और अग्नि इनके उपयोग में आप उनके योगदान से उपभोग करते है तो इन्हें दूषित होने से बचाना भी हमारा प्रथम कर्तव्य है।

गुरुदेव कहते हैं- जैसे हमें अपने खून और दूध से दगा नहीं करना चाहिए वैसे ही पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति से भी दगा नहीं करना चाहिए। सदैव उनके सम्मान में अपना सब कुछ सौंप देना फिर जो तुम्हारे पास होगा, वह सब परमात्मा का दिया होगा। जो प्रकृति पर डाका डालते हैं, वह बर्बाद हुए बिना नहीं रहते हैं।
गुरुदेव कहते हैं कि किसी भी श्रावक को अपने गुरुदेव से आशीर्वाद मांगना नहीं हैं, वह तो सिर्फ मन, वचन और काय से सिर्फ नामोस्तु करें तो स्वतः ही गुरु का आशीर्वाद मिल जाएगा। क्योंकि गुरु अपना आशीर्वाद स्वतः अपने भक्तों को दे देते हैं। वैसे भी संत अपने भक्तों को सदैव आशीर्वाद देते हैं क्योंकि संत करुणामय हैं।
गुरुदेव आगे कहते हैं कि भगवान से कभी वरदान भी नहीं मांगना, क्योंकि भीख में मांगा गया वरदान भी बर्बादी के कगार पर ले जाता है। उन्होंने उदाहरण देते बताया कि रावण ने, कंस ने, हिरण्यकश्यप ने आदि भगवान से वरदान मांगा था लेकिन नीयत और पापकर्म का उदय था तो वही वरदान बर्बादी का कारण बना। अतः कभी भी वरदान एवं आशीर्वाद भीख में नहीं मांगना। वह आपके नेक नीयत के कर्म से स्वतः मिलता हैं। गुरुदेव कहते हैं कि सीमा से अधिक किसी भी वस्तु का इस्तेमाल नहीं करना, वह दुख का कारण बन सकता है। सच्चे भक्त को भगवान की भक्ति मजबूरी में नहीं, मजबूती के साथ करनी चाहिए। शौक और मजबूरी में किया गया धर्म और धार्मिक सभी क्रिया व्यर्थ है। जहां तुम धर्म और धार्मिक क्रियाओं को करते थक जाते हो, समझो कि यह क्रियान्वयन क्रम पाप का कारण बन रहा है। हर क्रिया, निष्काम भक्ति के साथ तो हर क्षण महसूस होगा कि श्रावक तन सार्थक है।

गुरुदेव ने आगे कहा कि हम आधुनिक तो गए हैं और इसकी दौड़ में हर हाल में अग्रणी हैं। लेकिन हर वैज्ञानिक उपकरण, जिसकी उम्र उम्मीद से कम होती है, लेकिन जितने समय उसका उपयोग करते हैं तो हम गुलाम हो जाते हैं। यही आदतें दुख और परेशानी का कारण बन विभिन्न अनचाहे रोगों को जन्म दे देती हैं। गुरुदेव ने कम शब्दों में दान देने के संदर्भ में बताया कि दान देते अगर एक दाना भी बचा है तो भी दान देने का क्रम क्रियान्वयन रखना।

पत्रकार रवि जैन चुनगी मुनि ने बताया कि श्री सुधा सागर जी, नगर गौरव मुनि श्री पूज्य सागर जी का आशीर्वाद नगर के श्रेष्ठी साधर्मी परिवार सुरेश जैन, आकाश जैन, कज्जी जैन, राम प्रकाश, संजीव जैन ममता स्पोर्टस, सिंघई मिली परिवार को मिला। सभी श्रद्धालुओं को मुनि श्री के मंगल पाद प्रक्षालन का सौभाग्य मिला। राज्यस्थान जैन क्षेत्र चमलेश्वर जी की कमेटी ने मुनि श्री का मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। बहार से आने वाले श्रद्धालुओं के आने का तांता लगा हुआ है। जैन पंचायत समिति ने सभी भक्तों और श्रद्धालुओं के लिए शुद्ध भोजन व्यवस्था की है। आलोक शास्त्री एवं जैन पंचायत अध्यक्ष अनिल अंचल के संयुक्त संचालक में मुनि श्री का जिज्ञासा समाधान आयोजन जारी है।

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