पुस्तक समीक्षा : प्राचीन टीका शैली के पुनर्स्थापन का श्रेष्ठ कार्य है ‘समख्याति टीका’

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प्रो. श्रीयांश कुमार की अनूठी कृति है समण सुत्तं-‘समख्यातिसंस्कृतटीकोपेतम्’

डॉ. सुनील जैन, ललितपुर 

केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर के जैनदर्शन विभाग में आचार्य एवं संकाय प्रमुख, संस्कृत-प्राकृत भाषा के वरिष्ठ मनीषी प्रो. श्रीयांश कुमार सिंघई ने ‘समख्यातिसंस्कृतटीकोपेतम्’  टीका लिखकर बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया है। इस महत्वपूर्ण कृति का विगत दिनों लोकार्पण प्रो. श्रीनिवास जी बरखेड़ी, कुलपति केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय दिल्ली ने प्रो.गयाचरण त्रिपाठी, सुरेश जी सोनी, प्रो.बैद्यनाथ लाभ जी कुलपति नालन्दा बिहार विश्वविद्यालय नालंदा, प्रो.एसपी शर्मा एवं प्रो. जितेन्द्र भाई शाह जी के साथ किया है।
कृति का प्रकाशन परमपूज्य 108 आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के आशीर्वाद से परमपूज्य मुनि श्री प्रणम्यसागरजी महाराज के रजत जयंती वर्ष के अवसर पर किया गया है। कृति के प्रारंभ में परम पूज्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज का शुभाशीष प्रकाशित है। अपने आशीर्वचन में उन्होंने लिखा है- प्रस्तुत टीकाकार आगमों की गहराइयों को स्पर्श करने वाले मनीषी विद्वान्, प्रौढ़ वक्ता, कुशल स्याद्वाद विद्या अध्येता, अल्पवय में तत्त्वनिर्णय में ख्याति प्राप्त पण्डित प्रवर श्रीयांशकुमार जी सिंघई जयपुर ने टीका जगत् में सम्प्रति अभिनव नामांकन कर दिया है। प्राचीन टीका शैली के पुनर्स्थापन का श्रेष्ठ कार्य ‘समख्याति टीका’ है।
‘प्ररोचना’ प्रख्यात मनीषी एवं प्रोफेसर दयानंद भार्गव जयपुर ने संस्कृत में लिखी है। प्रस्तावना हिंदी के साथ ही अंग्रेजी में 50 पृष्ठों में लिखी गई है जो इस कृति को और अधिक पठनीय बनाती है। कवर पृष्ठ 2 पर समणसुतं के संकलनकर्ता परम पूज्य क्षुल्लक जिनेन्द्र “वर्णी” जी महाराज का परिचय दिया गया है, वहीं कवर पृष्ठ 3 पर कृति के संस्कृत टीकाकार प्रोफेसर श्रीयांशकुमारजी सिंघई का परिचय दिया गया है। प्रो. श्रीयांशकुमार जी ने अनेक पारिवारिक एवं अन्य समस्याओं को पार करते हुए पांच वर्ष में यह महत्वपूर्ण कार्य तत्परता, कर्मठता, निष्ठा के साथ संपादित कर दुनिया को यह अनूठी कृति दी है।
बताते चलें कि ‘समणसुतं’ प्राकृत वाङ्मय का एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें अनेक प्राकृत ग्रन्थों से चयनित 756 गाथा सूत्रों के संकलन से विषयवस्तु को प्रस्तुत किया गया है। ‘समण सुत्तं’ नामक इस अपूर्व ग्रंथ को किसी ने लिखा नहीं है तथापि इसमें ऋषियों-महर्षियों के उपदेश संकलित होकर जिस असरकारक एवं व्यवस्थित क्रम में प्रस्तुत हुए हैं, उससे ग्रंथ की गरिमा प्रामाणिक परिधि में अपार हो गई है।
लेखक प्रो. श्रीयांश ने ठीक ही लिखा है-दुःख विमुक्ति या आनन्दोपलब्धि के लिए यथार्थ पुरुषार्थ करने की चाह रखने वाले जिज्ञासु साधकों के लिए समणसुत्तं ग्रन्थ एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है ।

परम पूज्य श्री आचार्य विद्यासागरजी ने जैन गीता के रूप में समणसुत्त का हिन्द काव्यानुवाद करके इसके महत्त्व को उजागर किया है तो हिन्दी, अंग्रेजी आदि भाषाओं में अनुवाद के साथ इस ग्रन्थ का प्रकाश में आना भी इसे लोकप्रिय रचना के रूप में प्रस्थापित करता है। हालांकि, यह ग्रन्थ पठन – पाठन में वह महत्त्व नहीं पा सका है जो इसे मिलना चाहिए था।
समत्व की अवधारणा और साधना को ख्यापित करते हुए समणसुत्तं का सम्पूर्ण उपदेश बीजरूप में है, गाथा सूत्रों में समाहित है। जिसे समझकर हम अपने सम स्वभाव को जान सकते हैं। हमारी चेतना में सत्य- असत्य आदि के विवेक का सूत्रपात हो और हम अपनी आत्मा के शाश्वत सत्य को जानकर अपने समता स्वभाव को जानने के लिए आकर्षित एवं प्रयत्नशील हों- इस भावना से बीजभूत उपदेश के स्रोतस्वरूप समणसुत्तं ग्रन्थ की संस्कृत टीका का नामकरण ‘समख्याति’ शीर्षक से द्योतित किया गया है।
प्रस्तावना में प्रो. सिंघई ने यह भी लिखा है-आगम का अभ्यास और अभ्युत्थान की लगन के सहारे ही यह ‘समख्याति’ आपके हाथों में पहुंचा पा रहा हूं। मेरे प्रमाद से यदि कुछ अप्रिय लगे तो उसे आगम के आलोक में समझने का श्रम कीजिए और यदि त्रुटि है तो उसके प्रक्षालन हेतु मुझे सचेत करने का अनुग्रह भी अवश्य कीजिए।

कृति-समणसुतं- समख्यातिसंस्कृतटीकोपेतम्
टीकाकार एवं सम्पादन प्रो. श्रीयांश कुमार सिंघई
प्रथम संस्करण 2022  
ISBN 978-81-955706-6-9
मूल्य 700 रुपए, US $ 15
पृष्ठ-  496  
प्राप्ति स्थान - बी ब्लॉक, सूर्यनगर, तारों की कूट , टोंक रोड, जयपुर -302029
मोबाइल- 9057506919
मुद्रक देशना कम्प्यूटर्स, जयपुर
प्रकाशक: प्राच्यविद्या एवं जैन संस्कृति संरक्षण संस्थान, लाडनूं

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