मदनगंज-किशनगढ़/रोगों से मुक्ति देता है नीम का एक पेड़, यहां तो 5 हजार पेड़ों की मिलती है छांव

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विकास टिंकर | मदनगंज-किशनगढ़

निंबार्क तीर्थ सलेमाबाद जाने वाले रास्ते पर सड़क के दोनों तरफ लगे नीम के घने वृक्ष श्रद्धालुओं को पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बने हुए है। करीब दस किलोमीटर के रास्ते में लगे यह नीम के वृक्ष निंबार्क तीर्थ के महात्म्य को बढ़ा रहे है।

खास बात यह है कि निंबार्क नाम नीम का वृक्ष और सूर्यदेव के अर्घ्य से मिलकर पड़ा है और खुद जगदपिता ब्रह्माजी ने नियमानंद से निंबार्क नाम दिया। इसीलिए इस मार्ग पर पांच हजार से ज्यादा नीम के पेड़ सड़क के दोनाें तरफ लगाए गए है ताकि प्राकृतिक वातावरण और हरियाली के बीच नीम के वृक्ष इस तीर्थनगरी की महिमा का बखान करते रहे। यहां से गुजरने पर खूबसूरत हरियाली और शानदार सड़क, साफ-सफाई को देखकर हर कोई अभिभूत हो जाता है।

श्रीजी महाराज के कहने पर वनमंत्री ने लगवाए थे वृक्ष

दस साल पहले सलेमाबाद में विशाल सम्मेलन हुआ था। उसमें देश विदेश से साधु संत, श्रद्धालु, भक्त लोग शामिल हुए थे। उस वक्त श्रीजी महाराज के भक्त तत्कालीन वनमंत्री लक्ष्मीनारायण दवे आर्शीर्वाद लेने पहुंचे। तब श्रीजी महाराज ने निंबार्क तीर्थ के रास्ते पर नीम के पेड़ लगाने के लिए कहा। दवे ने तुरंत इस पर काम शुरू किया और सड़क के दोनों तरफ वन विभाग के जरिये आठ हजार नीम के पौधे लगाए गए। निंबार्क पीठ की ओर से इन पौधों की सार संभाल और देखरेख की जाने लगी। खुद श्रीजी महाराज हर चार पांच दिन में इन पौधों की देखभाल करने जाते थे। उस वक्त रेंजर महेंद्र टांक ने भी नीम के पेड़ों के दोनों तरफ जालियां लगवाई ताकि मवेशी नुकसान नहीं पहुंचा सके। इन पेड़ों को बड़ा होने में करीब दो साल लग गए। आज सड़क के दोनों तरफ हजारों की तादाद में खड़े ये पेड़ सौंदर्य काे बढ़ावा दे रहे है।

नीम के वृक्ष पर कराए सूर्य के दर्शन, इसलिए कहलाया निंबार्कतीर्थ पीठ, भागवत के 16वें श्लोक में है उल्लेख

मेगा हाइवे से निंबार्क तीर्थ जाने वाले मार्ग पर दोनांे दिशाअों में लगे है नीम के घने वृक्ष।

निंबार्क पीठ की स्थापना 551 वर्ष पूर्व

जानकारी के अनुसार निंबार्क पीठ की स्थापना 551 वर्ष पूर्व परशुराम देवाचार्य महाराज ने की थी। जिनको स्वामी के नाम से भी जाना जाता है। यहां स्वामीजी ने तपस्या की थी। ऐसा माना जाता है कि मंदिर के दायी तरफ एक स्थान है जहां व्यक्ति की हर मनोकामना पूरी होती है। यह स्थान सिद्धपीठ कहलाता है। यहां हर साल भारी संख्या में देश विदेश से श्रद्धालु ठाकुर जी के दर्शन और श्रीजी से आर्शीर्वाद लेने पहुंचते है।

ब्रह्माजी ने ली परीक्षा, नियमानंद से पड़ा निंबार्क नाम

ब्रह्माजी को नियमानंद के सुदर्शन चक्र के अवतार होने की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जानकारी थी। ब्रह्माजी ने परीक्षा लेने के लिए दिवभोजी दंडी स्वामी का रूप धारण किया और शाम के समय नियमानंद के पास नीम के पेड़ के नीचे पहुंचे। वहां नियमानंद ने संयासी रूप में मौजूद ब्रह्माजी का स्वागत किया और प्रसाद लेने का आग्रह किया। लेकिन ब्रह्माजी ने सूर्यास्त होने की बात कहते हुए कि अब वे प्रसाद नहीं ले पाएंगे। इस पर नियमानंद ने सुदर्शन चक्र को आह्वान किया और नीम के वृक्ष में सूर्यदेव के दर्शन कराए। वृक्ष में सूर्यदेव का अर्घ्य चमक रहा था। प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने कहा कि आपने मुझे नीम के वृक्ष में सूर्यदेव के अर्घ्य के दर्शन कराए इसलिए आपका नाम नियमानंद नहीं निंबार्क होगा और पूरी दुनिया निंबार्क नाम से ही जानेगी।

10 किलोमीटर लंबे रास्ते पर हैं नीम के पेड़, मॉर्निंग वॉक पर ताजी हवा लेने आते हैं लोग

पेड़-पौधों शुद्ध हवा देते हैं। किशनगढ़ उपखंड में एक साथ इतने सारे बड़े पेड़ निंबार्क तीर्थ के अलावा कहीं देखने को नहीं मिलते। हनुमानगढ़ मेगा हाइवे से निंबार्क तीर्थ का रास्ता करीब दस किलोमीटर है। निंबार्क द्वार से नीम के घने वृक्ष और हरियाली शुरू हो जाती है। बीमार लोग ताजी हवा खाने के लिए इस रास्ते पर पेड़ों के नीचे जाते है। सुबह लोग मॉर्निंग वॉक के लिए भी जाते है। ताकि स्वस्थ रह सके। यहां नीम के अलावा भी कई पेड़-पौधें है और चारों ओर हरियाली है। शहर के लोगों का रुझान इस ओर बढ़ रहा है।

सुदर्शन चक्र के अवतार माने जाते हैं निंबार्क भगवान

पीठ की ओर से संचालित संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य विनोद दीक्षित के अनुसार श्रीमदभागवत के एकादश अध्याय के 16वें श्लोक के 42 वें श्लोक में इसकी वर्णन है। इसके अनुसार निंबार्क भगवान को सुदर्शन चक्र का अवतार माना जाता है। श्री नियमानंद अरूण ऋषि के पुत्र थे। उनका जन्म महाराष्ट्र के मूंगी पैठन में हुआ था। वहां से वह वृंदावन आ गए और गोवर्धन के के पास नीम के पेड़ के पीछे तपस्या करने लगे।
(साभार-https://bhaskar.com )

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