प्रेम मकान को घर बनाता है और संवेदनाएं घर को मंदिर बना देती हैं – आचार्य अनुभव सागर जी

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samvednaay ghar ko mandir bana deti hai

लोग कहते हैं कि धर्मात्मा व्यक्ति मरकर स्वर्ग जाता है, जबकि वास्तविकता तो यह है कि धर्मात्मा व्यक्ति जहां भी जाता है वहां का वातावरण स्वयं ही स्वर्ग जैसा हो जाया करता है। धर्म वास्तव में ऐसा साधन है जो पतित को पावन बना देता है। आदमी बरसों मेहनत कर ईंट-पत्थर से मकान तैयार करता है। ईंट-पत्थर से मकान भले ही बन जाए, लेकिन उसे घर बनाना बहुत कठिन काम है। धर्म में वह ताकत है जो मकान को घर में, आदमी को इंसान में और यहां तक कि श्वान को देवता में परिवर्तित कर देती है।

परिवारजनों का आपसी प्रेम ईंट-पत्थर के मकान को घर बनाता है, जबकि आपस में एक-दूसरे की संवेदनाएं और भावनाएं समझना उस घर को मंदिर बना देता है। परिवार का वातावरण जितना पवित्र होगा, उस घर की संतान उतना ही अच्छा इंसान बनेगी।
घर को मंदिर बना लेने का प्रयास निम्न चार स्तम्भों पर आधारित है-

सामूहिक भोजन
सामूहिक भजन
सामूहिक भाषण
सामूहिक भ्रमण

ये चारों स्तम्भ एक परिवार को स्वस्थ समाज का महत्वपूर्ण घटक बना देते हैं। परिवार के सदस्यों को दिन में एक बार साथ बैठकर भोजन अवश्य करना चाहिए। साथ में किया हुआ भोजन हमें मिल बांटकर जीवनयापन के लिए तैयार करता है। एक दूसरे की पसंद-नापसंद से परिचित कराता है।

इसी तरह दिन में एक बार सामूहिक प्रार्थना भी अवश्य करनी चाहिए। यह सामूहिक प्रार्थना हमारे अंदर संवेनाएं जागृत करती है और जीवन के लक्ष्य के प्रति सचेत बनाती है।

इसी तरह सामूहिक भाषण यानी आपस में बातचीत, एक दूसरे से कहने-सुनने की प्रक्रिया भी जरूर करनी चाहिए। यह बातचीत हमारे व्यक्ति के विकास के लिए बहुत जरूरी है।

इनके अलावा सप्ताह या महीने में एक बार सामूहिक भ्रमण भी आवश्यक है। इससे एक-दूसरे की भावनाओं, प्रवृत्तियों आदि के बारे में जानने-समझने का बहुत अच्छा अवसर प्राप्त होता है।

ये चार पुरूषार्थ अवश्य ही घर-परिवार के वातावरण को मंगलमयी बनाने का समर्थ रखते हैं। यह क्रियाएं एक दूसरे के लिए तलवार बनने के बजाए स्वयं म्यान बन जाने की कला सिखाती हैं जो परिवार को एकजुट और घर को मंदिर बनाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विद्या है। परिवारों का प्रेम उसके सदस्यों के माध्यम से समाज में भी आदर्श का निर्माण करता है।

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