संस्कृति मंदिर – एक अनुकरणीय पहल – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज

label_importantमंथन पत्रिका

“विलासिता में डूबा जीवन उधार का,
शांति की चाह, लेकिन नाम नहीं विचार का,
पतन का कारण है अभाव संस्कार का”

आत्मा का शुद्धिकरण करने की क्रिया को संस्कार कहते हैं और संस्कारों की एक-एक बूंद से ही संस्कृति का जन्म होता है। पत्थर की एक मूर्ति संस्कारों के कारण भगवान बन जाती है।आत्मा का शुद्धिकरण विचार, आहार, रहन-सहन, ज्ञान, भाषा और धार्मिक क्रियाओं से होता है। इन सब के संग्रह का नाम ही संस्कृति है और इसे सहेज कर रखना, आने वाली पीढ़ी तक पहुंचना यह हमारी जिम्मेदारी है। इसी जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए संस्कृति मंदिर की परिकल्पना की गई है। एक ऐसा मंदिर, जहां आप अपनी संस्कृति को पहचान सकेंगे, जहां आपको अपनी संस्कृति के प्रति श्रद्धा, निष्ठा और समर्पण का ज्ञान मिलेगा, क्योंकि संस्कृति को पहचानने वाला ही अपनों से जुड़ता है, परिवार और समाज की परंपराओं को समझता है।

आज जिन कारणों से हमारे परिवार, समाज और देश का पतन हो रहा है उसका सबसे महत्वपूर्ण कारण है संस्कारों की कमी। संस्कारों की कमी व्यक्ति को विलासिता की ओर ले जा रही है। विलासिता से बचने का एक माध्यम संस्कृति मंदिर बनेगा। संस्कृति के साथ मंदिर शब्द देने के पीछे कारण यह है कि मंदिर एक पूजनीय शब्द है या यूं कहें कि जहां मन का द्वार खुले, वही मंदिर है।

संस्कृति मंदिर की योजना आचार्य श्री शांतिसागर महाराज की मुनि दीक्षा के शताब्दी वर्ष को समर्पित है। वैसे यह सोच एक-दो दिन की नहीं बल्कि पूरे तीन वर्ष की है लेकिन इसकी शुरुआत आचार्य शांतिसागर महाराज की मुनि दीक्षा शताब्दी वर्ष से होने जा रही है।

ऐसा होगा संस्कृति मंदिर

दर्शनशाला –
श्रावक का प्रथम कर्तव्य है जिनेन्द्र भगवान के दर्शन करना। जैन बनने की पहली सीढ़ी देव दर्शन है। यहीं से संस्कार और संस्कृति को समझने का मार्ग प्रारम्भ होता है। दर्शन किसका करें, कैसे करें, क्यों करें, इन सभी का समाधान यहां मिलेगा। दर्शन करने का फल क्या है, यह भी जानने को मिलेगा। यह सब पुस्तकों में नहीं, व्यावहारिक तौर पर बताया जाएगा।

पाठशाला –
जैन धर्म को समझने की यह पहली कक्षा है। यहां पर णमोकार मंत्र, तीर्थंकर, पाप, पुण्य, कषाय, अहिंसा-हिंसा आदि का पाठ पढ़ाया जाएगा। उन धार्मिक शब्दों से परिचित करवाया जाएगा, जो प्रतिदिन बोलने में आते हैं। यह सब पुस्तकों के साथ ऑडियो और वीडियो के साथ पढ़ाया जाएगा।

योगशाला –
शरीर को स्वस्थ रखने का साधन है योग। जैन धर्म में योग का वर्णन है। यह हमारी प्राचीन चिकित्सा पद्धति है। हम घर के काम करते-करते भी योग कर सकते हैं। यह कैसे किया जा सकता है इसके बारे में यहां सिखाया जाएगा। यह ऑडियो और वीडियो के माध्यम से भी सिखाया जाएगा।

ध्यानशाला –
तन, मन और वचन को स्थिर करने का साधन है ध्यान। इसका वर्णन जैन धर्म में विस्तार से किया है। यहां आप को बताया जाएगा कि ध्यान कैसे किया जाता है।

स्वाध्याय शाला-
आपके उठने-बैठने, सोने, खाने-पीने, चलने और बोलने का सही तरीका क्या है, आप अपने भीतर मानवता को कैसे जाग्रत कर सकते हैं, आत्म चिंतन में क्या चिंतन करना चाहिए, इन सब का ज्ञान यहां दिया जाएगा। यह भी व्यावहारिक रूप से ऑडियो, वीडियो के साथ सिखाया जाएगा।

आहारशाला-
मुनि, आर्यिका, क्षुल्लक, क्षुल्लिका और त्यागी को कैसे आहार दिया जाता है, ,कैसे शुद्धि करनी चाहिए, आहार की मर्यादा कैसी होनी चाहिए, आटा आदि साम्रगी का उपयोग कैसे करना चाहिए, यह सब यहां सिखाया जाएगा। कहानियों के माध्यम से आहारदान का फल बताया जाएगा।

संगीतशाला-
पूजन, पाठ, भक्ति, अभिषेक, किस धुन, राग से बोली जाती है, यह आपको ऑडियो, वीडियो के माध्यम से सिखाया जाएगा।

कर्मशाला-
यहां आपको भगवान आदिनाथ के बताए असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, शिल्प और विद्या, इन षट्कर्म के बारे में बताया जाएगा। कैसे आप अपना जीवन यापन कर सकते हैं, यह भी बताया जाएगा।

भाषाशाला-
उन शब्दों से परिचित करवाया जाएगा, जो धार्मिक हों, जिनका प्रयोग आपकी चर्या में होता हो। ऐसा होने से आपकी भाषा से पता चल सकेगा कि आप धार्मिक हैं क्योंकि व्यक्ति के चरित्र की पहचान उसकी भाषा से भी होती है।

प्रचार-प्रसार शाला-
आपकी जेब तक धार्मिक बातें पहुंचाई जाएंगी। धर्म के मूल सिद्धान्त को सहज-सरल और कम शब्दों में घर-घर तक पहुंचाने का काम प्रचार-प्रसार शाला के माध्यम से किया जाएगा। आपके जेहन को धार्मिक शब्द कोश से भरने का काम किया जाएगा। इसके लिए उपयोग किया जाएगा व्हाट्सएप, फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया का।

इतिहास शाला –
परिवार, समाज, देश के महापुरूषों का परिचय पुस्तकों व अन्य माध्यमों से यहां कराया जाएगा। यहां प्राचीन वस्तुयों का संग्रह होगा। पररम्पराओं, रीतिरिवाज आदि की जानकारी दी जाएगी।

ऐसे जुड़े संस्कृति मंदिर से-

  • 2 लाख रुपए देकर आजीवन ट्रस्टी बनें।
  • 25 हजार रुपए देकर आजीवन संरक्षक बनें।
  • 11 हजार रुपए देकर सदस्य बनें।
  • 2500 रुपए देकर श्रावक रत्न बनें।
  • दान का जीवन में बड़ा महत्व है, आप अपनी स्वेच्छा से कुछ भी दे सकते हैं।

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