सत्साहित्य जीवन का आधार है

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• आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी के 50 वे स्वर्णिम जन्म दिवस पर आचार्यश्री पर केंद्रित पुस्तक पुण्यार्जक डॉ. विकास जैन को भेंट

• आध्यात्म की ज्योति को जनसामान्य में आचार्यश्री ने प्रवाहित किया

ललितपुर। आध्यात्मिक साहित्य सेवन में संयम, स्वास्थ्य मजबूत करने की अथाह शक्ति होती है।जैसा साहित्य हम पढ़ते हैं, वैसे ही विचार मन के भीतर चलते रहते हैं और उन्हीं से हमारा सारा व्यवहार प्रभावित होता है। वर्तमान विषम वातावरण में संत-साहित्य की उपादेयता बहुत है। अतः इस भीषण वर्तमान परिवेश में संतों की पीयूषवाणी जनसाधारण को सबल प्रदान कर सकती है। आज के मानव को परिज्ञान प्रदान कर, उसका पथप्रदर्शन कर, समाज को सशक्त, निर्दोष एवं कल्याणकारी मार्ग पर अग्रसर करना केवल संत साहित्य के सामाजिक आदर्शों के वरण से ही संभव है। ‘आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी का व्यक्तित्व-कृतित्व’ महत्वपूर्ण व पठनीय शोध कृति है। आचार्यश्री के अवदान को राष्ट्रीय विद्वानों ने अपने लेखों से रेखांकित किया है।
उक्त विचार नगर के सुप्रसिद्ध नवजात शिशु एवं बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. विकास जैन ने उनके परिवार के पुण्यार्जन से प्रकाशित कृति ‘ आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी का व्यक्तित्व-कृतित्व’ को कृति के संपादक डॉ. सुनील संचय से आचार्यश्री के 50वे जन्म दिवस पर प्राप्त करते हुए कहीं।
कृति के संपादक डॉ. सुनील संचय ललितपुर ने बताया कि उक्त कृति में पूज्य मुनि श्री सुप्रभसागर जी महाराज एवं परम पूज्य मुनि श्री प्रणतसागर जी महाराज के सान्निध्य में मड़ावरा में आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज व्यक्तित्व-कृतित्व विषय पर आयोजित राष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी में विद्वानों द्वारा प्रस्तुत शोधालेखों को प्रकाशित किया गया है। उक्त मुनिद्व्य का 2020 में ललितपुर में भी चातुर्मास हुआ था। हाल ही में प्रकाशित उक्त कृति के पुण्यार्जक बनने का सौभाग्य डॉ. विरधीचन्द्र जैन , लक्ष्मी जैन, चंद्रकुमार, हंसराज, दीपक जैन, मड़ावरा, डॉ विकास जैन ललितपुर, डॉ विशाल जैन परिवार ने प्राप्त किया है। आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी के 50वे जन्म दिवस 18 दिसम्बर के प्रसंग पर उक्त कृति -पुण्यार्जक डॉ. विकास जैन को भेंट की गई, जिसका सर्वप्रथम उन्होंने विमोचन किया। उक्त कृति का प्रकाशन उक्त मुनिद्व्य की प्रेरणा से किया गया है।
कृति में मुनि श्री प्रणत सागर जी, डॉ रमेश जैन दिल्ली, प्रोफेसर अशोक वाराणसी , डॉ नरेंद्र गाजियाबाद, प्राचार्य निहालचंद बीना, ब्र. जय निशांत टीकमगढ़, पंडित विनोद रजवांस, डॉ विमल जयपुर, डॉ महेंद्र मनुज इंदौर, डॉ सुशील मैनपुरी, राजेन्द्र महावीर सनावद, डॉ पंकज भोपाल, डॉ सुनील संचय, शीतल चंद्र ललितपुर, संतोष शास्त्री साढूमल, डॉ सुमत उदयपुर, डॉ आशीष वाराणसी, सुनील शास्त्री, डॉ निर्मल जैन, मयंक अलीगढ़ आदि के संगोष्ठी में प्रस्तुत शोधालेख प्रकाशित किए गए हैं। प्रारंभ में आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी व मुनि श्री सुप्रभसागर जी के आशीर्वचन इसके बाद संपादकीय प्रकाशित है।
श्रमण संस्कृति की गौरवशाली परंपरा में परम पूज्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी मुनिराज अपनी आगमोक्त चर्या और आध्यात्मिक चिंतन के द्वारा निरंतर आत्मसाधना व प्रभावना में संलग्न हैं। आप श्रमण परंपरा के विलक्षण और तपस्वी संत हैं। आपने समाज और संस्कृति को भी एक नई दिशा दिखाई है। आध्यात्मिक संत आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने आध्यात्म की धारा को जन-जन में प्रवाहित किया

समाचार सौजन्य- डॉ. सुनील संचय,ललितपुर

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