श्री महावीरजी महामस्तकाभिषेक को सान्निध्य प्रदान करने आ रहे आचार्य श्री वर्धमान सागरजी का आज राजस्थान में मंगल प्रवेश

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जयपुर। करौली स्थित प्रसिद्ध अतिशय तीर्थक्षेत्र श्री महावीरजी में इस वर्ष नवम्बर में होने जा रहे पंचकल्याणक महोत्सव और महामस्तकाभिषेक को सान्निध्य प्रदान करने के लिए राष्ट्रसंत आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज का पूरे संघ के साथ मंगलवार को राजस्थान में मंगल प्रवेश होगा। वे भवानी मंडी से राजस्थान में प्रवेश करेंगे। आचार्य श्री के संघ में 8 मुनि, 1 5 आर्यिका और 2 क्षुल्लक शामिल हैं और वे भी साथ ही मंगल प्रवेश करेंगे। श्रीमहावीर जी तीर्थ क्षेत्र. कमेटी के पदाधिकारी, समाज के गणमान्य प्रतिनिधि और कई विशिष्ट लोग आचार्य श्री का स्वागत करेंगे।


श्री महावीरजी में भगवान महावीर की अतिशयकारी प्रतिमा का 24 वर्ष बाद महामस्तकाभिषेक होने जा रहा है। यह भव्य आयोजन 24 नवम्बर से शुरू होेगा। इसके तहत पहले 24 नवम्बर से पंचकल्याणक महोत्सव होगा और फिर चार दिसम्बर तक महामस्तकाभिषेक होंगे। इससे पहले 1998 में आचार्य श्री विद्यानंद जी महाराज के सान्निध्य में यह भव्य आयेाजन हुआ था।
इस बार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के सान्निध्य में यह भव्य आयोजन होगा। आचार्य श्री को अपना प्रथम गुरु माने वाले अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज ने बताया कि यह एक मंगल संयोग है कि श्री महावीरजी में ही 18 वर्ष की आयु में सन 1969 में आचार्य श्री की दीक्षा हुई थी। यह दीक्षा आचार्य श्री शांतिसागर महाराज की परम्परा के द्वितीय आचार्य श्री शिवसागर जी महाराज दीक्षा होना थी पर उनका समाधिमरण हो गया और फिर 1969 में ही इसी परम्परा के तृतीय पट्टाधीश आचार्य श्री धर्मसागर जी ने 24 फरवरी 1969 को आचार्य श्री को दीक्षा दी। उनके साथ 6 मुनि, 3 आर्यिका ,2 क्षुल्लक कुल 11 दीक्षा हुई थी।


आचार्य श्री अंतिम बार 1999 में महावीरजी में शांतिवीर नगर की पंचकल्याण में आए थे उसके बाद अब आ रहे है।
जैन धर्म के सबसे बडे आयोजन भगवान बाहुबली के महामस्तकाभिषेक में 1993, 2006 और 2018 तीन बार मुख्य सानिध्य प्रदान कर चुके हैं।

जन्म मध्य प्रदेश लेकिन राजस्थान से रहा है गहरा नाता

– जन्म- 18 सितंबर 1950 को जन्म सनावद मध्य प्रदेश
– जन्म का नाम -यशवंत
– माता मनोरमा देवी पिता कमलचंद जी पंचोलिया
– 1967 में सयंम मार्ग चल पडे।
– 1968 में राजस्थान के बागीदौरा में आचार्य श्री विमल सागर जी आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लिया।
– 1968 में ग्राम करावली राजस्थान में सर्व प्रथम आचार्य शिवसागर जी के दर्शन किए।
– 1968 में परम्परा के द्वितीय पट्टाधीश आचार्य शिव सागर जी के सान्निध्य में भीमपुर जिला डूंगरपुर राजस्थान में गृह त्याग कर संघ में प्रवेश।
– 21 मई 1969 को को जयपुर खानिया जी को मुनि वर्धमान सागर की आंखे चली गई उस समय उम्र 19 साल की थी। डॉक्टरों मना कर दिया आंखे नही आएंगी।
– खानिया जी मन्दिर में 72 घण्टेे तक भगवान चन्द्रप्रभ की मूर्ति के पास बैठकर शांति भक्ति का पाठ किया तो आंखे अपने आप वापस आ गई।
– 24 जून 1990 को पारसोला राजस्थान में आचार्य शांतिसागर महाराज की परम्परा का आचार्य पद मिला। पंचमपट्टाधीश बने।
– अब तक लगभग 89 दीक्षा दे चुके हैं। इनमें 32 मुनि, 33 आर्यिका, 1 एलक, 13 क्षुल्लक, 10 क्षुल्लिका है।
– अभी तक 12 राज्यों में विहार किया है।
– वहीं 53 चातुर्मास कर चुके है। इनमें से 29 चातुर्मास राजस्थान में किए हैं।

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