वाणी वीणा बनें, लाठी नहीं, एक फर्क वातावरण को बदल कर रख देता है – आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज

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न्यूज़ सौजन्य -राजेश दद्दू 

इंदौर। कई बार हमारी वाणी से बनती बात बिगड़ जाती है तो कई बार हाथ से निकली बात वाणी से बन भी जाती है इसी फर्क को आचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज ने रायपुर में अपने प्रवचन में बताया। आचार्य ने कहा कि हितकारी बोलो, सीमित बोलो और ऐसा बोलो जिससे धर्म और यश की वृद्धि हो। ऐसा ना बोलें जिससे धर्म का नाश हो और स्वयं के यश का नाश भी हो। घर में जाकर कह देना – वाणी वीणा बने, लाठी न बने। बाँस की एक लाठी बने तो लोगों की कमर तोड़ सकती है वही बाँस की एक बांसुरी बन जाए तो लोगों को संगीत सुनाने लग जाती है।
साथ ही आचार्य ने कहा कि कई बार चेहरा भी सब कह देता है। मायाचारी का चेहरा अलग ही झलकता है उसकी मधुर वाणी भी समझ में आ जाती है। व्यक्ति का हृदय पवित्र होता है तो उसका चेहरा ही बोल देता है कि वह करुणामयी है।

प्रवचन के मुख्य अंश –
– उपदेश देने के लिए जो उपदेश है, वह उपदेश ही नहीं है। जीवों पर करुणा करने के लिए जो उपदेश है, वह ही वास्तविक उपदेश है।
– हम प्रवक्ता है यह दिखाना प्रवचन नहीं है, जीवों पर करुणा रखकर बोलना, इसका नाम प्रवचन है।
– प्रवक्ता तो छप जाएगा, लोगों के कानों तक पहुँच जाएगा, लेकिन लोगों के हृदय तक नहीं पहुँचेगा।
– जिनशासन में भाषण वादियों की वंदना नहीं है, जिनशासन में उपदेशों की वंदना है।

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