1008 श्री पार्श्वनाथ भगवान के मोक्ष कल्याणक दिवस पर वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी ने दी दो क्षुल्लिका दीक्षाएं

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श्रीमती धीसी देवी ठोलिया का नूतन नाम क्षुल्लिका श्री शांत मति जी तथा श्रीमती भगवानी जयपुरिया का नूतन नाम क्षुल्लिका श्री शील मति जी

न्यूज़ सौजन्य- राजेश पंचोलिया

श्रीमहावीरजी। प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांति सागर जी की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परम्परा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी वर्ष 2022 का वर्षायोग श्रीमहावीरजी अतिशय क्षेत्र में कर रहे हैं।

गुरुवार 4 अगस्त को श्रीमती धीसी देवी ठोलिया उम्र 79 वर्ष का नूतन नाम श्री शांत मति जी किया तथा श्रीमती भगवानी जयपुरिया सीकर को क्षुल्लिका दीक्षा दी गई। इनका नूतन नाम क्षुल्लिका श्री शील मति जी किया गया।
दोनों दीक्षार्थियों की शोभा यात्रा श्री वर्द्धमान सागर सभागार में पहुँची। यहाँ पर आचार्य श्री वर्द्धमान सागर चातुर्मास कमेटी तथा श्रीमहावीरजी महामस्तकाभिषेक समिति के संयुक्त तत्वावधान में दीक्षा समारोह कार्यक्रम आयोजित हुआ। सभागार में 1008 श्री पार्श्वनाथ भगवान के कृत्रिम टोंक का निर्माण रचना का अनावरण श्रीमती शोभादेवी, श्री गिरिराज जी, सुनील पदम, सुधीर पंसारी जयपुर ने किया
कार्यक्रम का मंगलाचरण संघस्थ बाल ब्रह्मचारिणी पूनम एवं दीप्ति दीदी ने किया। श्री पार्श्वनाथ भगवान के चित्र का अनावरण श्री बंशीधर जी पुरन मल जी परिवार सीकर द्वारा किया गया। दीप प्रज्जवलन श्री अशोक, सुनील, अनिल एवं सुधीर पाटनी जोबनेर तथा चातुर्मास कमेटी ने किया। श्री राजकुमार जी सेठी जयपुर अध्यक्ष आचार्य श्री वर्द्धमान सागर वर्षायोग समिति ने बताया कि 1008 श्री पारसनाथ भगवान का पूजन एवं निर्वाण लाडू पुण्यार्जक परिवार द्वारा चढ़ाया गया। श्रीमहावीरजी कमेटी द्वारा श्री अनुपम जी जैन एवं अतिथियों का स्वागत किया गया।


भगवान श्री महावीर स्वामी तथा प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांति सागर जी एवं पूर्वाचार्यों को विभिन्न नगरों से पधारे समाज द्वारा अर्ध्य समर्पित किया गया। सौभाग्यशाली परिवार की 5 महिलाओं द्वारा चोक पूरण की क्रिया की गई।

दीक्षार्थी श्रीमती धीसी देवी एवं श्रीमती भगवानी देवी ने आचार्य श्री से दीक्षा की याचना की तथा आचार्य श्री एवं समस्त साधुओं, दीदी, भैया, श्रावक- श्राविकाओं तथा समाज से क्षमा याचना की।


वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी के पंचामृत से चरण प्रक्षालन का सौभाग्य श्री प्रवीण अंकेश जोबनेर परिवार को मिला। वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री को शास्त्र भेंट के श्री माणक चंद जी, विनोद, आशीष जयपुरिया परिवार सीकर पुण्यार्जक रहे। आचार्य श्री का प्रवचन भी हुआ।


आचार्य श्री ने पंच मुष्ठी केश लोच किए गए तथा दीक्षा संस्कार मस्तक तथा हाथों पर किए गए। इसके बाद आचार्य श्री ने नामकरण किया। श्रीमती धीसी देवी जोबनेर का दीक्षा पश्चात नूतन नाम क्षुल्लिका श्री शांत मति जी किया गया। पुण्यार्जक परिवारों द्वारा नूतन क्षुल्लिका जी को पिच्छी कमंडल, शास्त्र एवं कपड़े दान किए गए।
इसी प्रकार श्रीमती भगवानी देवी जयपुरिया सीकर का दीक्षा उपरांत नूतन नाम क्षुल्लिका श्री शील मति जी किया गया। पुण्यार्जक जयपुरिया परिवार सीकर द्वारा पिच्छी कमंडल, शास्त्र एवं कपड़े भेंट किए गए।


यहां प्रभावनावर्धक जानकारी यह है कि आचार्य श्री के संघस्थ दीक्षित शिष्य श्री विशाल सागर जी की गृहस्थ अवस्था की श्रीमती धीसी देवी माता है तथा श्रीमती भगवानी देवी जयपुरिया आपकी सास हैं तथा संघस्थ श्री विचक्षण मति जी पूर्व अवस्था की पत्नी हैं।

श्रीमहावीरजी में पूर्व में हुई दीक्षाओं का इतिहास

श्रीमहावीरजी में पूर्व में हुए दीक्षा इतिहास का अवलोकन किया जाए तो आचार्य श्री शांति सागर जी की परम्परा में परमपूज्य आचार्य श्री देश भूषण जी गुरुदेव ने टिकैत नगर की बाल ब्रह्मचारिणी मैना जी को क्षुल्लिका दीक्षा संवत 2009 सन् 1952 में प्रदान की जो पूज्य गणनी आर्यिका श्री ज्ञान मति जी के रूप में विख्यात हैं।
द्वितीय पट्टाधीश आचार्य श्री शिव सागर जी ने भी 6 दीक्षाएं दी हैं जिसमें मुनि श्री श्रेयांस सागर जी, आर्यिका श्री अरह मति जी, आर्यिका श्री श्रेयांस मति जी, पुत्र माता तथा पत्नी तथा आर्यिका श्री कनक मति जी, आर्यिका श्री सुशील मति जी तथा क्षुल्लिका श्री कल्याण मति जी की दीक्षा संवत 2022 सनं 1967 को श्रीमहावीरजी में हुई हैं। संवत 2025 सन् 1969 में तृतीय पट्टाधीश आचार्य श्री धर्म सागर जी ने 11 दीक्षाएं दीं जिसमें वर्तमान के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी की भी मात्र 19 वर्ष की उम्र में सीधे मुनि दीक्षा हुई। आचार्य कल्प श्री श्रुत सागर जी ने भी सन् 1974 में मुनि श्री समता सागर जी को मुनि दीक्षा दी।

वैराग्यमय पलों से सभी हो उठे द्रवित
गुरुवार प्रातः 5 बजे दोनों दीक्षार्थियों के केश लोच हुए। वैराग्यमय पलों से सभी द्रवित हो उठे। परिजनों के दोनों नेत्रों में से एक नेत्र में खुशी के आंसू थे तो दूसरे नेत्र में दुख के आंसू भी थे। नेहा दीदी के भजनों से वातावरण वैराग्यमय हो गया। संघस्थ माताजी के अलावा आर्यिका श्री सरस्वती मति जी, आर्यिका श्री सृष्टि भूषण माताजी ने भी दीक्षार्थियों के केश लोचन किए। परिजनों एवं अन्य भक्त जिन्हें केश लोच झेलने का अवसर मिला, वह अपने को पुण्यशाली मान रहे हैं। दोनों दीक्षार्थियों के मंगल स्नान के बाद दोनों ने पंचामृत अभिषेक कर भगवान श्री पार्श्वनाथ जी को निर्वाण लाडू समर्पित किया।

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