वंदन करते समय कुटिल भाव न रहेंः मुनि श्री शुद्ध सागर जी

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  • आगम को जानना आसान, पर स्वीकारना कठिन
  • धर्मसभा को जिनवाणी का ज्ञान करवाया श्रमण मुनि ने

रावतभाटा। मुनि श्री शुद्ध सागर जी महाराज का अमृतमय वर्षायोग धर्म नगरी रावतभाटा, चितौड़गढ़ में हो रहा है। प्रातःकाल प्रवचन की बेला में श्रमण मुनि श्री शुद्ध सागर जी महाराज ने धर्मसभा को जिनवाणी का ज्ञान करवाते हुए बताया कि जीव संसार में रहते हुए भी बंध से डरता है तथा वह इस बंध को छोड़कर निर्बंध होना चाहता है। बंध को छोड़ने के लिए वह वंदन करने जाता है परन्तु वह वहां भी बंध करके आता है।

महाराज श्री ने बताया कि व्यक्ति के भावों में ऐसी कुटिलता होती है कि जब वह वंदन भी करता है तो उन्हीं कुटिल (मान- माया) भाव के साथ ही करता है। व्यक्ति चाहता है कि सबकुछ उसके मन का हो। जबतक उसके मन का होता है, तब उसके लिए भगवन सब कुछ होता है परन्तु जबसे उसके मन का नहीं होता, उसके लिए भगवन भी झूठा हो जाता है। परन्तु “हे जीव, संसार में सबसे बड़ा झूठा व्यक्ति स्वयं है।” व्यक्ति को अपने परिनमन को सुधारने की आवश्कता है, इसमें भगवन को दोषी ठहराना उचित नहीं है।
मुनि श्री आगे कहते हैं कि जहां हमारे मन की होगी, वहां कल्याण नहीं होगा। जहां मन की नहीं होगी, वहीं हमारा कल्याण संभव है।

धर्मसभा में श्रोताओं को जन्म – मरण के बारे में समझाते हुए मुनि श्री कहते हैं कि जिस प्रकार विष्ठा के एक कीड़े को भी अपना जीवन प्रिय होता है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन से स्नेह होता है परन्तु संसार में व्यक्ति का स्वयं का कुछ नहीं होता है, वह तो केवल उसके नाममात्र का होता है। संसार का सबसे बड़ा झूठ यह है कि घर मेरा है, व्यक्ति अपने घर में कई परेशानियों को झेलता है फिर भी वह इससे दूर होना नहीं चाहता है, यह उसके बंध का कारण होता है।

सम्यकदृष्टि व मिथ्यादृष्टि जीव का लक्षण बताते हुए मुनि श्री कहते हैं कि मात्र भगवन का अभिषेक करने या महाराज जी को आहार देने से सम्यक दर्शन नहीं होता है। वस्तु को वस्तुतत्व नहीं स्वीकारोगे तब तक सम्यक दर्शन संभव नहीं है। घर में दुख है, बंधन है, यह बात समझे बिना सम्यक दर्शन संभव नहीं होता है।
मुनि श्री ने सभा में श्रोताओं से कहा कि आगम को जानना आसान है परन्तु उसे मानना/स्वीकारना कठिन होता है।

कुतर्क करने वालों की संसार में कमी नहीं
मुनि श्री ने कहा कि कुतर्क करने वालों की संसार में कमी नहीं है। व्यक्ति अपने जीवन में निज घर को भूल कर, पर घर में घुस रहा है यह उसके मिथ्या उदय का कारण है। मनुष्य का स्वभाव ज्ञान दर्शन होता है। स्वभाव को स्वीकारना होता है, उसमे तर्क नहीं लगाना होता है। मुनि श्री ने बताया कि मिथ्यादृष्टि जीव की बुद्धि मिथ्या मार्ग पर ही चलती है। उसकी बुद्धि तीनों काल में भी सम्यक मार्ग पर नहीं चलने वाली है। प्रत्येक व्यक्ति अपने भाग्य से ही सब पाता है और खोता है। यदि उसके भाग्य में होगा तो उसे प्राप्त होगा और यदि उसके भाग्य में नहीं होगा तो आया हुआ चला जाएगा। पर की और जाना व निज को भूलना यही मिथ्या ज्ञान होता है। कुतर्क लगाने वाला व्यक्ति कभी नहीं सुधरेगा इसलिए हमें खराब वस्तु को त्यागकर अच्छे को स्वीकारना प्रारम्भ करना होगा यही हमारे लिए कल्याण का मार्ग है।

इस धर्मसभा में रावतभाटा समाज के पुरुष, महिला, बालक,बालिकाएं व गुरुभक्त उपस्थित थे।

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